बदनाम पानी – डॉ. कमल के. प्यासा

डॉ. कमल के. प्यासा – मण्डी हां, मैं ही हूं बदनाम बदनसीब, सबकी प्यास मिटाता बरसता बहता , बेचारा पानी ! मेरा खुद का वाजूद नहीं, रंग, रूप, गंध आकर नहीं मर्म, मैल, खोट नहीं, जैसा जहां समाता आकार अपना बिसर जाता ! धो धो मिटाता पापों को बदनाम बदनसीब मैं बेचारा पानी ! बरसता … Continue reading बदनाम पानी – डॉ. कमल के. प्यासा