अतिथि देवो भव: (लघुकथा) – रणजोध सिंह

रणजोध सिंह – नालागढ़ गोधूलि का समय था। त्रिपाठी जी ने बहुत धीरे से सुगंधा अपार्टमेंट की डोर वैल बजा दी। – कौन है ?  किसी ने अंदर से बड़े मधुर स्वर में पूछा था। फिर थोड़ा सा गेट खोल कर एक सुव्यवस्तिथ महिला जो उनके ही कॉलेज में एक वरिष्ठ प्राध्यापक थी, उनके सामने … Continue reading अतिथि देवो भव: (लघुकथा) – रणजोध सिंह