अतिथि देवो भव: (लघुकथा) – रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह – नालागढ़

गोधूलि का समय था। त्रिपाठी जी ने बहुत धीरे से सुगंधा अपार्टमेंट की डोर वैल बजा दी। – कौन है ?  किसी ने अंदर से बड़े मधुर स्वर में पूछा था। फिर थोड़ा सा गेट खोल कर एक सुव्यवस्तिथ महिला जो उनके ही कॉलेज में एक वरिष्ठ प्राध्यापक थी, उनके सामने गेट के बीचोबीच ऐसे खड़े हो गई मानो हवा के झोंके को भी अंदर नहीं जाने देगी। उन्हें देखते ही बोली – अरे ! त्रिपाठी जी आप है …… कैसे हो?….. बहुत दिन बाद नज़र आये और सुनाओ तुम्हारे डिपार्टमेंट के क्या हाल है?  उसने गेट पर खड़े-खड़े एक ही सांस में कई प्रश्न एक साथ पूछ डाले। उन्होंने विनम्रता से कहा – मैं ठीक हूँ,  गुप्ता जी का घर कौन सा है? जरा बता देंगी तो बड़ी मेहरबानी होगी। – अरे ! गुप्ता जी…… जो बैंक मैनेजर है,  मेरे ही किरायेदार है। ऊपर वाले माले में रहते है। ये साथ वाला गेट किरायेदारों का ही है, लेकिन आज तो वे घर पर नहीं है……… शायद आउट ऑफ़ स्टेशन है।  कोई और सेवा हो तो बताओ। त्रिपाठी जी ने उसे धन्यवाद दिया और मुस्कुरा कर आगे बढ़ने लगे|

इससे पहले कि वह आगे बढ़ते, वह शिकायत भरे अंदाज में बोली – अरे ! त्रिपाठी जी, आप भी क्या इधर-उधर घूमते रहते हो,  कभी हमे भी आतिथ्य-धर्म का अवसर दीजिए। अब बारी त्रिपाठी जी की थी, उन्होंने भी हाज़िरजवाबी दिखाते हुए कहा,  – कभी क्यों, अभी क्यों नहीं ?  इस वक्त मैं आपके घर के दरवाजे पर ही तो खड़ा हूँ| इतना सुनते ही  महिला का चेहरा  पीला पड़ गया,  परन्तु चेहरे पर गज़ब मुस्कान लाते  हुए बोली, – अतिथि देवो भवः ! प्लीज आइए  सर | परन्तु उसके चेहरे के भावों ने उसकी जुबान का साथ नहीं दिया। त्रिपाठी जी ने परिस्तिथि संभालते हुए तुरंत कहा  –  अरे मैडम जी मैं तो मज़ाक कर रहा था,  अभी थोड़ा जल्दी में हूँ, फिर कभी आऊंगा।  इतना कह कर वे मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए और महिला ने चैन की एक गहरी सांस ली।

पति-परमेश्वर (कहानी) – रणजोध सिंह

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