रणजोध सिंह – नालागढ़ वैसे तो मैं भी सच बोलना चाहता हूँ मगर मुश्किल ये है, जिंदा भी रहना चाहता हूँ! ये पत्थरों का शहर है और मैं आइनों का व्यापारी! इस शहर में आईनें बेचना चाहता हूँ! वो हर पांच साल बाद कितने इत्मिनान से खाता है झूठी कसमे| जाने क्यों उसके हर … Continue reading चाहत, कविता – रणजोध सिंह
Copy and paste this URL into your WordPress site to embed
Copy and paste this code into your site to embed