चाहत, कविता – रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह – नालागढ़

वैसे तो

मैं भी सच बोलना चाहता हूँ

मगर मुश्किल ये है,

जिंदा भी रहना चाहता हूँ!

ये पत्थरों का शहर है

और मैं आइनों का व्यापारी!

इस शहर में

आईनें बेचना चाहता हूँ!

 

वो हर पांच साल बाद

कितने इत्मिनान से खाता है

झूठी कसमे|

जाने क्यों उसके हर झूठ पर

यकीन करना चाहता हूँ!

अव्वल दर्जे का संगदिल

है सनम मेरा

पर दिल के जख्मों का ईलाज

मैं भी कहा चाहता हूँ|

 

वैसे तो

स्टाफ रूम में बैठकर

सदैव नारी शक्ति का पक्ष लेता हूँ|

‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’

का नारा भी,

बुलंद आवाज में, बुलंद करता हूँ|

ये अलग बात है

अपने घर देवी आने पर,

भ्रूण हत्या करवाता हूँ|

 

सुना है कफ़न की जेब नहीं होती

मगर फिर भी फटी जेब

रफ़ू करवाना चाहता हूँ|

तुम्हारी तरह मैं भी

देश पर मर मिटने वालों का

मसीहा बनना चाहता हूँ|

मगर भगत सिंह मेरे घर में नहीं

तेरे घर में पैदा हो

ऐसा दिल से चाहता हूँ|

एडजस्टमेंट, लघुकथा – रणजोध सिंह

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