रणजोध सिंह – नालागढ़ बच्चों की मुस्कान की खातिर अपनी मुस्कान भुलाता है बच्चें रखता राजा जैसे खुद भिखारी लगता है वह और नहीं कोई यारों यकीनन, बच्चों का पिता होता है| बन हिमालय बच्चों संग आडिग खड़ा रहता है उनके संग केवल हंसता है पर तनहाई में रोता है यकीनन, वह और नहीं … Continue reading पिता- एक कल्पतरु – रणजोध सिंह
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