पिता- एक कल्पतरु – रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह – नालागढ़

बच्चों की मुस्कान की खातिर

अपनी मुस्कान भुलाता है

बच्चें रखता राजा जैसे

खुद भिखारी लगता है

वह और नहीं कोई यारों

यकीनन,

बच्चों का पिता होता है|

 

बन हिमालय बच्चों संग

आडिग खड़ा रहता है

उनके संग केवल हंसता है

पर तनहाई में रोता है

यकीनन,

वह और नहीं कोई यारों

बच्चों का पिता होता है|

 

बच्चों के आगे बढ़ने पर

सबसे ज्यादा खुश होता है

उनकी हर सफलता पर

जो लड्डू बांट के आता है

यकीनन,

वह और नहीं कोई यारों

बच्चों का पिता होता है|

 

पिता है तो बच्चों की आंखों में

जिंदा ढेरों सपने हैं

पिता है तो मेले के

सब खिलौने अपने हैं

बनकर कल्पतरु घर में ढेरों खुशियां लाता है

यकीनन,

वह और नहीं कोई यारों

बच्चों का पिता होता है|

 

बाहर से कठोर अंदर से मखमल होता है

बच्चों को सर्कस का शेर नहीं

जंगल का शेर बनाता है

जिसके कारण गर्म हवा का कोई झोंका

बच्चों को छू तक नहीं पाता है

यकीनन,

वह और नहीं कोई यारों

बच्चों का पिता होता है|

चाहत, कविता – रणजोध सिंह

Daily News Bulletin

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