उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर निर्मित होने वाली 422 मेगावाट की किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना (लागत ₹15,624 करोड़) के कार्यान्वयन के लिए नई दिल्ली में छह राज्यों—हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान—के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल तथा हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू सहित सभी संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू के निरंतर प्रयासों के चलते पिछले आठ वर्षों से चला आ रहा वित्तीय लागत का गतिरोध समाप्त हो गया। केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में केंद्र सरकार ने सैद्धांतिक रूप से सहमति व्यक्त की कि हिमाचल के हिस्से के बिजली घटक पर आने वाला लगभग ₹2,000 करोड़ का वित्तीय भार अब जलापूर्ति से लाभान्वित होने वाले राज्यों—दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा द्वारा वहन किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य के सीमित संसाधनों को ध्यान में रखते हुए पूर्व सरकार द्वारा ₹800 करोड़ का अंशदान देने के निर्णय को खारिज कर प्रदेश के हितों की रक्षा की गई। उन्होंने तर्क दिया कि जब जल घटक के लिए केंद्र सरकार 90 प्रतिशत अनुदान देती है, तो बिजली घटक के लिए ऐसा न होना अनुचित था, विशेषकर तब जब परियोजना के कारण हिमाचल के स्थानीय लोग विस्थापित होंगे और राज्य को ही सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
इस ऐतिहासिक समझौते के तहत परियोजना के निर्माण के बाद हिमाचल प्रदेश को बिजली घटक से प्रतिवर्ष 1,000 मिलियन यूनिट बिजली मिलेगी, जिससे राज्य के राजस्व में सालाना ₹1,000 करोड़ से अधिक की बढ़ोतरी होगी। मुख्यमंत्री ने इसे जलविद्युत परियोजनाओं में राज्य के वैधानिक अधिकारों को हासिल करने की दिशा में एक बड़ी जीत बताया।
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