हिमाचल : पाषाण अभिलेख, संदर्भ सिरमौर – डॉ. कमल के. प्यासा

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सिरमौर राज्य की स्थापना 1139 ईस्वी में जैसलमेर के राजा शालीवाहन द्वितीय के पुत्र रसालू द्वारा (सिरमौरी ताल को राजधानी बना कर) स्थापित की गई थी। 1195 ईस्वी में राजा शुभांशु ने सिरमौरी ताल से, राजधानी को बदल कर राजबन को अपनी राजधानी बना लिया था। बाद में राजा उदय प्रकाश द्वारा, राजबन से कालसी को राजधानी बनाया गया। 1621ईस्वी में राजा कर्म प्रकाश द्वारा कालसी के स्थान पर राजधानी नाहन को बना दिया गया। देखा जाये तो 1911 से 1933 तक के समय में, जिस समय महाराजा अमर प्रकाश का शासन था, बहुत से विकास के कार्य किये गए, जिनमें सड़कों, गलियों, जल प्रबंधन व पुस्तकालय आदि का निर्माण मुख्य रुप में आ जाता है। स्वतंत्रता के पश्चात, 1948 में नाहन रियासत भी भारत गणराज्य का हिस्सा बन गई। आज नाहन का सिरमौर जिला, अपने (सुकेती) प्रागैतिहासिक क्षेत्र के लिया ही नहीं जाना जाता बल्कि रेणुका, पौंटा साहिब, त्रिलोकपुर देवी बाला सुंदरी मंदिर, चूड़ धार और यहाँ से मिलने वाले अति प्राचीन अवशेषों व शिलालेखों में भी अपना विशेष स्थान रखता है। सिरमौर से मिलने वाले अभिलेखों के अंतर्गत आ जाते कुछ निम्नलिखित अभिलेख:

1.सिरमौरी ताल अभिलेख।

अभिलेख श्रेणी : पाषाण ।

अभिलेख प्रकार : शिलालेख।

अभिलेख काल : 8वीं- 10वीं शताब्दी।

अभिलेख लिपि : ब्राह्मी ।

अभिलेख प्राप्ति स्थान : सिरमौरी ताल, राजबन सिरमौर।

अभिलेख विवरण : ब्राह्मी लिपि का यह अभिलेख सिरमौरी ताल के राजबन स्कूल से खुदाई में मिला था। आज कल सिरमौर यह अभिलेख, त्रिलोक पुर संग्रहालय में सुरक्षित है। इस अभिलेख से सिरमौर के शासकों की उपलब्धियों आदि की जानकारी मिलती है।

2.कालसी अभिलेख।

अभिलेख श्रेणी : पाषाण।

अभिलेख प्रकार : चट्टान अभिलेख।

अभिलेख काल : 3री

शताब्दी ईस्वी पूर्व।

अभिलेख लिपि : ब्राह्मी, भाषा प्राकृत व पाली।

अभिलेख प्राप्ति स्थान : यमुना व टोंस नदी संगम के समीप, सुरुघना कालसी, सिरमौर।

अभिलेख विवरण : यमुना टोंस संगम के कालसी, (आरम्भ में सिरमौर की राजधानी थी) सुरुघना से मिले सम्राट अशोक (253ईस्वी पूर्व) के ये 14अभिलेख जिनमें अशोक की विजयों, युद्ध त्याग, धर्म की नीति,अहिंसा, मनुष्यों व जीवों पर दया करने की चर्चा की गई है। अभिलेख 13 से तो, पांच यूनानी शासकों के नाम भी मिलते हैं, जिन्हें सम्राट अशोक ने पछाड़ा था। ये सभी अभिलेख एक बड़ी सी चट्टान (10 फुट X 8 फुट) का बहुत स्थान घेरे हैं। अभिलेखों के ऊपर की ओर एक हाथी की उकेरी आकृति के साथ *गजेतम*लिखा देखा जा सकता है। इस अभिलेख की सबसे पहले खोज, 1850 ईस्वी में विद्वान कनिंघम द्वारा की गई थी। अभिलेखों वाला यह समस्त क्षेत्र अब भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। शेष सिरमौर का सकेती क्षेत्र अपने प्राचीन जीवाश्म अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है और उसे भी प्रागैतिहासिक क्षेत्र के रूप में संरक्षित कर रखा गया है।

हिमाचल : पाषाण अभिलेख, सन्दर्भ कांगड़ा – डॉ. कमल के.प्यासा

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