प्राचीन साहित्य रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण व मार्कण्डेय पुराण में कुल्लू रियासत को ‘कुलांत पीठ’ या ‘कुलूत’ नाम दिया गया है। रियासत की स्थापना प्रथम या द्वितीय शताब्दी में राजा विहंगमणि पाल द्वारा की गई थी और पहली राजधानी जगतसुख व फिर नग्गर को बनाया गया था। बाद में राजा जगत सिंह (1637-1672 ईस्वी) द्वारा सुल्तानपुर (कुल्लू) को राजधानी बनाया गया।
वर्ष 1839 ईस्वी में कुल्लू पर सिखों का अधिकार हो गया, लेकिन वर्ष 1846 के एंग्लो-सिख युद्ध के पश्चात यह क्षेत्र ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो गया। स्वतंत्रता के पश्चात कुल्लू पंजाब का हिस्सा बन गया जो नवंबर 1966 तक रहा, और बाद में इसे हिमाचल प्रदेश में शामिल कर दिया गया।
वैसे तो कुल्लू से संबंधित बहुत से सिक्के प्राप्त हुए हैं, लेकिन जो प्राचीनतम मुख्य सिक्का प्राप्त हुआ है, उसका विवरण कुछ इस प्रकार है:
राजा वीरयश के तांबे के इस सिक्के पर ब्राह्मी व खरोष्ठी लिपि में “राज्ञ कुलूतस्य वीरयशस्य” लिखा मिलता है तथा सिक्के पर बने चित्रों में स्वास्तिक, त्रिरत्न, नंदी व चैत्य आदि देखे जा सकते हैं। आकार में ये सिक्के गोलाकार, वर्गाकार व आयताकार रूप में मिले हैं।
कुल्लू से संबंध रखने वाले बहुत से सिक्के लाहौर से आगे (उत्तरी पंजाब), उत्तर-पश्चिम के तक्षशिला, कांगड़ा, नग्गर व जगतसुख आदि क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं। इनमें से कई तांबे व चांदी के सिक्के आज भी ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन में देखे जा सकते हैं।
चांदी के सिक्कों के एक ओर ब्राह्मी व दूसरी ओर खरोष्ठी लिपि में प्राकृत-मिश्रित संस्कृत में शासक का नाम लिखा मिलता है। इन नामों में वीरयश के अतिरिक्त विप्रकीर्ति व राजा चंडेश्वर के नाम भी देखे गए हैं।
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तांबे के छोटे सिक्के: भार 0.25 – 0.60 ग्राम
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तांबे के बड़े सिक्के: भार 2.00 – 2.50 ग्राम
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वीरयश के चांदी के सिक्के: भार 1.30 – 2.20 ग्राम
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सिक्कों का व्यास: लगभग 1.80 सेमी. (या मिमी.)



