“शिलै दी दौं” धर्मपाल भारद्वाज का पहाड़ी संग्रह है, जिसे महासुवी (सधोची) बोली में ठेठ पहाड़ी भावात्मकता के साथ व्याख्यायित किया गया है।
पहाड़ी काव्य संग्रह में सतलुज घाटी के देव समुदाय के प्राकट्य, परंपराओं और पर्वों का सजीव चित्रण करने के साथ-साथ अनेक सामाजिक व सांस्कृतिक विषयों को निरूपित किया गया है। इनके कविता संग्रह का आरंभ “म्हारो हिमाचल” नामक कविता से होता है, जिसमें प्रदेश के नैसर्गिक सौंदर्य और यहां के हिममंडित पर्वत शिखर, सदानीरा नदियों व रम्य वनराशि का वर्णन है:
रौंगा-रौंगा री चिंउखूरी फौजा
कुफू भाषदा न्यारा;
जौ आ म्हारो हिमाचौला न्यारा।
पहाड़ी काव्य संग्रह की कविता “और्ज आ महामाई” में कवि ने देवी से आत्मसंतोष से रहने व हर स्थिति में समभाव का भाव प्रस्तुत किया है, जो जीवन का अमृत तत्व है, जैसे:
केबि कुंगशी केबड़ी चैऊं
जैणु बौक्त आ खाणा लै टेऊं
केबि टालि लाए जुगति रोंऊं
केबि शिमले सूट मुं सेऊं।
मेले इस पर्वतीय समाज के जीवन-प्राण रहे हैं, जिनमें लोकसंस्कृति के रंगों व रिश्तों की मिठास से दुष्कर जीवन भी सरल व सहज हो जाता है। ननखरी क्षेत्र के प्रसिद्ध “दुधबाहड़ियों मेड़ौ” कविता में मेलों का पारंपरिक स्वरूप व संस्कृति का सुंदर निरूपण किया गया है:
बौरह-तेरैह षाढ़े ज़ाऊ धारा दि
दुधबाहड़ियो मेड़ौ
आए जातरै, नैई आइ ता
बूरा लागणु तेरौ।
कवि ने कविताओं के माध्यम से सतलुज घाटी की देव परंपराओं व देवसमुदायों के जीवनवृत्त को शब्दों में पिरोकर, गेय बनाकर चिरकालिक बनाया है। कुमारसैन क्षेत्र के देवाधिपति कोटेश्वर महादेव का गीत देव प्राकट्य, परंपराओं और आराधन की अतिरेकता से कालजयी हो उठा है:
हाटकोटि का तुम्बी दि आऔ
कचेड़ी खेगसुए माये सबाहौ
केति रूप रौचि इंदा लै आऔ
खमारशणैं कुल देउ बणाऔ।
“चान्णि राच हुंदि दरैउ” कविता में कवि ने कोटगढ़ की अप्रतिम प्राकृतिक सुषमा को गीत में सजाकर प्रस्तुत किया है, जिसमें जीवन के संताप व ताप को प्राकृतिक सौंदर्य से विस्मृत करने का आग्रह है:
चान्णि राच हुंदि दरैउ
दुई घौड़ि तू इंदि बेशि लै
मौना रो दुखड़ौ दौस् तू झूरिये
जिउ तू हौड़कौ आपणौ करि लै।
अर्थात्—
चांदनी रात है, नीचे बहता दरिया है
दो घड़ी तू यहां बैठ ले।
मन में जो दुख है, बता
अपना जी हल्का कर।
कवि लोकपरंपराओं को गीतों में संयोजित कर गीत का सांस्कृतिक श्रृंगार करने में सफल हुए हैं, जिससे गीत मिट्टी से जुड़कर लोक के मर्म को स्पर्श कर गए हैं। शिवरात्रि पर्व पर आधारित “शबातर” गीत महादेव के प्रति आत्मीयता व अंतरंगता को लिए हुए है, जैसे:
बौरत् पुज्यो परशाद पाऔ
ब्रह्मखाड़ै राच्दा राच् भैआऔ।
आंचड़ी गीतै ठामरू लाओ
पार हिकनी का पाउणौ आऔ।
सेगु दाई अर्थात् सेगु बहन का महासुवी गीतों में चित्रण शाश्वत हो चला है। मन की मिठास से भरा यह पात्र कविता संग्रह में एक गीत की नायिका बनकर मनस पटल पर दुख-दैन्य का संबोधन बन गई है, जैसे:
दौन्वा दि हांडदा शान्दवि
सेगु दाईये शान्दवि।
शुकदै नाड़ू तौपदै ताड़ू
छैंईं लोड़ा किदि बागुरि।
देव चतुर्मुख कोटगढ़ के अधिष्ठाता देव हैं, जो बुशहर रियासत के राजा के राज्याभिषेक में पगड़ी बांधने का अधिकार रखते हैं। फाग मेला बुशहर का वसंतोत्सव है, जहां फाग मेले में बुशहर, शिमला व कुल्लू के बाहरी सराज के देवी-देवता सम्मिलित होते हैं। इसी पृष्ठभूमि पर आधारित “फागा लै चालौ चौतरमुख” गीत में देव की फाग मेले में देवयात्रा का वर्णन द्रष्टव्य है:
ढाई पग चालौ फागौ राजौ चौतरमुखा।
रामपुरै गूंजदौ मैलणो बाजौ चौतरमुखा॥
“म्हारो तिरंगौ” गीत में तीनों रंगों के महत्व व महिमा को प्रेरक भावों व प्रतीकों से संयोजित किया गया है:
शुक्लौ रौंग आ सौभी सणैंई
सुख, सकून, राम चैईं
गऊ माता म्हारै लोग पूजदै
दूधा, घिवा रि ताकद चैईं।
शिमला का रिज मैदान प्रदेश का राजनीतिक व सांस्कृतिक मंच है, इसी पृष्ठभूमि को गीत में व्यंजित किया गया है:
शिमला रिजा गाये पाणि नाटी।
जौ आ म्हारे देवा भूमिये माटि॥
ऊंचौ आ शौआ फुटो तरंगौ
मात्मा टोऐ टेकियो रौंदौ।
गिरजौ लाट रो छूटि गौ इंदी
हणुबीर गाशा देखदौ रौंदौ।
मेले हमारे रिश्तों को ताजगी व सुदृढ़ता प्रदान करते हैं। दुधबाहली का सुप्रसिद्ध देवोत्सव गीत आपसी मेल-जोल का प्रतीक है जिसे “दुधबाहड़ी दि” गीत में उद्घाटित किया गया है:
रौंगबरौंगि छौतरी लाइयो
दुधबाहड़ी लै डेइ
लोग पूछा आखि आखि का जौ कौरि चेइ।
अर्थात्—
रंग-बिरंगी छतरी लगाकर
दुधबाहली को गई
लोग पूछैं आंखों-आखों में
यह किसकी बेटी है।
ननखरी के खणाहण में कोटगढ़ के अधिष्ठाता देव चतुर्मुख के भाई जिशर देव प्रतिष्ठित हैं। “जिशर चालौ फागा लै” में देव जिशर की फाग मेला यात्रा में देवपथ का वर्णन स्थापित देव विधान को इंगित करता है:
छाछि धार भुटिए कैंचि
हुंदि खाड्ड आ भैरिए बौंदि।
नोगड़ी टौपि राईंपुरा लै
जिशर चालौ फागा लै।
अयोध्या में राम मंदिर की प्रतिष्ठा पर कवि ने गीत “म्हारो राम, म्हारि अजोध्या” में इस घटना के ऐतिहासिक स्वरूप को वर्णित कर अवसर को कालजयी बना दिया है:
पांज् हुऔ बौर्षो फासलौ
ऐबै हुौ तेरि जागा रो फैसलौ
आपणैं मौंदरै राम विराजौ
राम कौरा जुण ऐशरौ।
रामपुर की फाग को कवि ने गीत के माध्यम से मेले के सजीव चित्रण से यहां की संस्कृति को जीवंत किया है।
नारकंडा के उतुंग शिखर हाटू पर विराजित हाटू कालका का वर्णन अनेक मिथकों को जोड़े हुए है। यहां मंदोदरी व फिर पांडवों के आगमन की कथाएं प्रचलित हैं। कविता “हाटुए माई” में यही भाव संप्रेषित किया गया है:
रावण राणि मंदोदरि आइ
हाटु टेकरिये पुजि माई
माये मौंदरा धीशा कैलाशा
तेरि किरति चिउंखु भाषा।
कोटगढ़ क्षेत्र के नाग शिरोमणि खाचली नाग के सम्मान में आयोजित तानुजुब्बल मेले की पारंपरिकता को सजीवता से “मांजे जेठै गई का डिहणु” गीत में अंकित किया है:
देउ ढाल कौरा खाचड़ी नागा लै
हाथ जोड़ि खौड़ा देउलू साथ् कै….
बरसात में कोटगढ़ क्षेत्र में हुई भीषण तबाही में कवि ने “बादड़ा पौरू डेउ तू इंदा” गीत के माध्यम से चिंता जताई है, कैसे 2023 में सड़कें, मकान व खेत भराकर बह गए:
ला बादड़ा पौरू डेु इंदा
सौड़कै एसि ता ढौढ़ि ढौढ़ि गेई
तीनैं आणु किंदा
बादड़ा पोरू डेु तू इंदा।
“किलै रोशुऔ इन्दर देवा” गीत में भी बरसात की आपदा को निरूपित किया गया है।
माघ महीने की संक्रांति सतलुज घाटी की प्रमुख संक्रांतियों में एक है। गीत “माघे साजिये बधाइ” के माध्यम से इस महीने किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठान व लोकपरंपरा का सुंदर वर्णन किया गया है:
माघे साजिए कादशि लागि
खिचड़ी खाई कि नैई?
माश् चाउड़े दान कौरी
फाई फौशी गेइ तौंई।
कविता “लौई” में रामपुर बुशहर के लवी व्यापारिक मेले के महत्व व लोक के मेल-मिलन का विशद वर्णन निहित है:
बिलासपुरियै कुड़वै बोटियै
छलोड़ी कदरोड़ी सागा सी खाओ..
“गेंदिये फूल” कविता में दीपावली पर द्वारों पर फूलों के वंदनवार का पारंपरिक वर्णन है। पंचायत प्रधान के लिए लोगों की आकांक्षाओं का यथार्थ वर्णन निहित है। “होड़िये रौंग” में वैष्णव भक्ति का रंग द्रष्टव्य है। “श्राद्धा मांई” में पितरों के निमित्त श्राद्ध-तर्पण का संदेश है। 2023 में ननखरी के खड़ाहण गांव में बरसात की त्रासदी मर्मस्पर्शी है। “माये बन्दन” में राष्ट्रगीत का पहाड़ी कविता में भावान्तर भावोत्पादक है।
शिक्षक दिवस पर कविता के माध्यम से गुरुओं के प्रति सम्मान का भाव निहित है। “बशैओ साजौ” में लोष्ठा गांव में देव चतुर्मुख के सानिध्य में ठिरशु मेले का सजीव चित्रण है:
आज पाकदै पटाण्डै गणाणि
जुण ऐबै बि चाणदै जाणि…
खणाणो ठिरशु मेले में पारंपरिकता व देवानुष्ठान का सजीव अंकन है। काव्य संग्रह की शीर्षक कविता “शिलै दि दौं” में प्रकृति के रूपों का निरूपण है:
शिलै दि दैं जैणु कि आज्को मौ
औसर कौरा सूले सूले तेरि सौं
समग्रतः “शिलैं दि दौं” धर्म प्रकाश भारद्वाज का महासुवीं बोली में संवेदनाओं का ऐसा संग्रह है, जिसमें स्थानीय देवों व परंपराओं का चित्रण है, प्रकृति की पीड़ा का संताप और बदलते परिवेश का सूक्ष्म अवलोकन व तद्जनित अप्रिय दृश्यों का छायांकन भी है। भारद्वाज जी का पहाड़ी बोली का यह संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है।


