वीर क्रांतिकारी शहीद रामप्रसाद बिस्मिल – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – मण्डी

ब्रिटिश साम्राज्य की प्रताड़ना अब देश के लोगों की सहन शक्ति से बाहर होती जा रही थी। आखिर 10 मई ,1857 को यह आंतरिक पीड़ा, मेरठ के एक सैनिक मंगल पांडे द्वारा (चर्बी वाले कारतूसों को लेकर) भारी विरोध के साथ ऐसी फूटी, जिससे फौज के सिपाही और आम लोग भी भड़क उठे तथा सिलसिलेवार यह क्रम आगे से आगे बढ़ता ही चला गया। क्रांतिकारी नौजवान जान की परवाह न करते हुए आगे आने लगे। विद्रोह की आवाजें देश के कोने कोने से उठने लगीं। कई तरह के आंदोलन व बहिष्कार शुरू हो गए। क्योंकि कारतूसों में सूअर की चर्बी हिन्दुओं व मुसलमानों दोनों के लिए अपमानजनक थी। फिर देश के सभी शासक भी तो अंग्रेजों की नीतियों से नाराज़ थे। उद्योग धंधों के समाप्त हो जाने से, किसानों व गरीबों का शोषण भी जोरों पर था, इस तरह इन सभी कारणों के फलस्वरूप, विरोध की ज्वाला तो भड़कनी ही थी।

1857 की जागरूकता और लोगों के उत्साह को देखते हुए, अंग्रेज चौकन्ने हो गए और उन्होंने भारतीयों पर कई तरह के नए नए प्रतिबंध लगा दिए व जनता के विशेष प्रतिनिधियों पर संदेह करते हुए उन पर नजर रखनी शुरू कर दी। जिससे देश के कोने कोने में कई एक गुप्त क्रांतिकारी संस्थाओं के गठन होने शुरू हो गए थे। विदेशों में भी क्रांतिकारी गतिविधियां जोरों पर होने लगीं थी। नौजवान बढ़चढ़ के आगे आने लगे थे और क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कार्य करता नरम व गरम दल में बंट गए, जिससे आपस में टकराव भी बीच बीच में चलते रहते थे।

क्रांतिकारी गतिविधियों में हमारे ये नौजवान साथी मरने मारने तक को तैयार रहते थे। तभी तो कई एक नौजवान 20_25 वर्ष की उम्र में ही इस स्वतंत्रता संग्राम में हंसते हंसते फंसी पर लटक गए और उन्होंने उफ़ तक नहीं की। आज के इस आलेख में ऐसे ही एक वीर शायर शहीद की चर्चा आपकी सेवा में प्रस्तुत है।

जी हां, उस शहीद क्रांतिकारी साहित्यकार का नाम था राम प्रसाद बिस्मिल। वैसे तो हमारे इस स्वतंत्रता संग्राम में न जाने कितने ही वीरों ने अपनी जान की आहुति हंसते हंसते दी है, पर इन सभी वीरों ने देश की खातिर अपने अपने अंदाज व अपने ही ढंग से कुछ नया कर्म करके सभी को चकित भी किया था। किसी ने ललकारते हुए अपना काम किया, किसी ने उन्हीं की धरती पर जवाब दिया, किसी ने धमाकों से उनको जगा के, तो किसी ने अपना घर बार त्याग कर अपना मकसद हासिल किया। इधर राम प्रसाद बिस्मिल ने अमीरों व सरकारी खजाने को लूट कर, स्वतंत्रता संग्राम में अपने काम को कैसे अंजाम दिया, देखते है :-

बिस्मिल नाम के तखल्लुस वाले, रामप्रसाद का जन्म का नाम राम प्रसाद ही था। उपनामों में वह बिस्मिल,राम व अज्ञात जैसे नामों से भी परिचित था। राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म ब्राह्मण परिवार की माता मूलमति व पिता मुरलीधर के यहां उत्तर प्रदेश के शाहजहां पुर के खिरनी मुहल्ले में 11जून, 1897 को शुक्रवार के (ज्येष्ठ शुक्ल की निर्जला एकादशी) दिन हुआ था। इससे पहले भी एक पुत्र ने जन्म लिया था लेकिन वह शीघ्र ही चल बसा था। कुल मिला कर इसके पिता की 9 संताने हुई थीं, (5 पुत्रियां व 4 पुत्र) जिनमें से 2 पुत्रियां व 2 पुत्र चल बसे थे। शुरू में रामप्रसाद बिस्मिल की पढ़ाई में रुचि नहीं थी, इसलिए इसकी पिता से अक्सर पिटाई होती रहती थी। पढ़ाई में ध्यान न देने के कारण ही इसे कई गंदी आदतें पड़ गईं थीं और पिता के पैसे भी चुराने लगा था साथ ही साथ उपन्यास खरीद कर भी पढ़ता था। सिगरेट पीने व भांग लेने की लत भी लग गई थी। एक दिन वह चोरी करते हुए पकड़ा गया, जिस पर पिता द्वारा खूब पिटाई की गई, सारी कॉपियां व उपन्यास फाड़ कर फेंक दिए गए। लेकिन इसकी चोरी की आदत वैसे ही बनी रही। जब उर्दू की पाठशाला में पास नहीं हो पाया तो फिर इसने अंग्रेजी पढ़ना शुरू कर दिया था। ब्राह्मण परिवार पर तरस खाते हुए, पड़ोस में रहने वाले किसी पंडित ने इसमें पूजा पाठ की रुचि पैदा कर दी, जिससे इस पर पंडित जी व देव कृपा का इतना प्रभाव पड़ गया कि इसमें पूजा पाठ के साथ ही साथ ब्रह्मचर्य में भी रुचि हो गई और फिर ब्रह्मचर्य के नियमों का भी पालन करने लगा। अब इसकी बुरी आदतें भी धीरे धीरे छूटने लगीं थीं। पढ़ाई में भी अब दिल लगने लगा रहा था और अंग्रेजी की पढ़ाई में भी सफल हो गया था। इस प्रकार रामप्रसाद में भारी बदलाव आ गया था। फिर जब आर्य समाज के मुंशी इंद्र जीत के संपर्क में आया तो, इसने दयानंद सरस्वती का सत्यार्थ प्रकाश पढ़ना शुरू कर दिया, जिससे इसकी विचारधारा ही बदल गई। उस समय जब ये आठवीं में ही था, तो स्वामी सोमदेव जी के आर्य समाज में पधारने पर, मुंशी इंद्रजीत द्वारा इसको उनकी सेवा के लिए लगा दिया। जिस पर स्वामी सोमदेव देव जी के साथ इसकी सत्यार्थ प्रकाश व राजनीतिक विषयों पर खुल कर चर्चा होने से, इसमें देश के प्रति विशेष लगाव पैदा हो गया। इसी के परिणाम स्वरूप ही वर्ष 1916 में कांग्रेस अधिवेशन के समय रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा ही (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की लखनऊ वाली शोभा यात्रा का आयोजन) भारी संख्या में युवकों को इकट्ठा करके किया था। इसी मध्य जब इसका परिचय केशव बलिराम हेडगवार, सोमदेव शर्मा व मुकुंदी लाल आदि से हो गया तो, इसकी “अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास” नामक पुस्तक का प्रकाशन, नागरी साहित्य पुस्तकालय कानपुर द्वारा वर्ष 1916 में कुर्मी प्रेस लखनऊ से करवा दिया गया। लेकिन पुस्तक को छपते ही उसे जब्त कर लिया गया। इसी पुस्तक को सरफरोशी की तमन्ना नाम के, ग्रंथावली के भाग में संकलित किया गया है और इसे तीन मूर्ति भवन पुस्तकालय दिल्ली के साथ अन्य पुस्तकालयों में भी देखा जा सकता है।

वर्ष 1915 में, जिस समय भाई परमानंद जी की फांसी की जानकारी रामप्रसाद बिस्मिल को हुई, तो तभी से इसने ब्रिटिश साम्राज्य से बदला लेने व सबक सिखाने की ठान ली और इसके लिए इसने अपने साथ दूसरे युवकों को भी जोड़ना शुरू कर दिया था। क्योंकि इसको स्वामी सोमदेव जी का पूरा समर्थन व संरक्षण मिला हुआ था। तभी तो इसने पंडित गेंदा लाल दीक्षित के नेतृत्व में *मातृवेदी *के नाम से एक संगठन भी बना लिया था। लेकिन संगठन को चलाने के लिए पैसों की जरूरत थी, जिसके लिए प्रथम जून, 1918 और फिर सितंबर 1918 में इनके द्वारा डाके डाले गए, जिससे पुलिस सतर्क हो गई और छापे पड़ने लगे थे। फिर पैसों के लिए ही दिल्ली के लाल किले के समीप 26 से 31 दिसंबर तक इनके द्वारा पुस्तकें बेची जाने लगीं। जिसकी जानकारी पुलिस को हो गई और जब वहां छापा पड़ा तो उसे रामप्रसाद बिस्मिल ने ही अपनी सूझ बुझ से संभाल लिया और पुस्तकें भी जब्त होने से बच गईं। लेकिन दिल्ली व आगरा के मध्य इसकी लूट की योजना सफल नहीं हो पाई पुलिस ने इन्हें घेर लिया जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल यमुना नदी में कूद कर लापता हो गया और दो वर्ष तक भूमिगत ही रहा। दीक्षित को उसके अन्य साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। एक नवंबर 1919 को इस मैनपुरी षडयंत्र का फैसला सुनाया गया, जिसके अनुसार मुकुंदी लाल के अलावा शेष सभी को क्षमा मांगने पर छोड़ दिया गया।

भूमिगत रहने के दो वर्ष पश्चात रामप्रसाद बिस्मिल शाहजहांपुर की भारत सिल्क मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी में प्रबंधक के रूप में कार्यरत रहा और फिर साड़ियों का कारोबार करने लगा। इसके पश्चात इसे कांग्रेस जिला समिति द्वारा लेखा परीक्षक के रूप में रख कर, सितंबर 1920 को कलकत्ता में (कांग्रेस के, इधर शाहजहांपुर कांग्रेस कमेटी से) अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त कर दिए गया। कलकत्ता में इसी मध्य इसकी मुलाकात लाला लाजपत राय जी से हो गई और लाला जी इसके द्वारा लिखित पुस्तकों से बहुत प्रभावित हुए। इसे आगे के कार्य के लिए कई दूसरे प्रकाशकों से इसका परिचय करवा दिया गया। तभी वर्ष 1922 में उमा दत्त शर्मा द्वारा इसकी पुस्तक कैथेराइन प्रकाशित की गई। वर्ष 1921 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन के समय पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव पर, रामप्रसाद बिस्मिल द्वारा मौलाना हरसव मोहनी का खूब समर्थन किया व महात्मा गांधी जी के असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को पारित करवा के ही दम लिया था। तभी तो बिस्मिल युवाओं में हमेशा ही चर्चित रहे और असहयोग आंदोलन में, शाहजहांपुर की विशेष भूमिका इसी के ही कारण रही थी।

लेकिन वर्ष 1922 में जब महात्मा गांधी द्वारा चौरी चौरा कांड के पश्चात, असहयोग आंदोलन वापिस ले लिया तो रामप्रसाद बिस्मिल व अन्य नौजवान क्रांतिकारियों द्वारा डट कर विरोध किया गया और यहीं से दो विचार धाराएं फूट पड़ीं, अर्थात उदार वादी व विद्रोही विचार धारा।

वर्ष 1923 में जिस समय पंडित मोती लाल नेहरू व देश बंधु चितरंजन दास द्वारा स्वराज पार्टी का गठन किया गया तो, समय के अनुसार इन नौजवानों द्वारा भी रेवोल्यूशनरी पार्टी (एच0 आर 0ए0) का गठन कर दिया गया। जब इसकी जानकारी विदेश में बैठे प्रसिद्ध क्रांतिकारी लाला हरदयाल को मिली तो उसने पत्र लिख कर रामप्रसाद बिस्मिल को सलाह दी कि वह शतीन्द्रनाथ सान्याल व यदु गोपाल मुखर्जी से मिल कर पार्टी का संविधान तैयार कर ले। और इस तरह पार्टी का संविधान तैयार कर लिया गया। 3अक्टूबर, 1924 को एच. आर. ए. की कार्यकारणी की बैठक का आयोजन कानपुर में किया गया। बैठक में शचींद्र नाथ, योगेश चंद्र व रामप्रसाद बिस्मिल प्रमुख थे। बैठक में पार्टी का प्रमुख रामप्रसाद बिस्मिल को ही बनाया गया। पार्टी को सुचारू रुप से चलाने के लिए (पैसों का प्रबंध) पहला डाका रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रिसमस के दिन 25 दिसंबर, 1924 की रात को बमरौली में डाला गया। 1 जून, 1925 को एक 4 पृष्ठ का पैम्फलेट रूपी पार्टी का इस्तिहार रेवोल्यूशनरी शीर्षक से रामप्रसाद बिस्मिल ने विजय कुमार के छद्म नाम से निकाल कर देश के प्रमुख क्रांतिकारियों के पास भेज दिये।पैम्फलेट में देश में किए जाने वाले बदलाव की विस्तार से जानकारी दी गई थी।

जब इस संबंध में अंग्रेज़ सरकार को जानकारी मिली तो पैम्फलेट लिखने वाले की खोजबीन बंगाल में की जाने लगी और शचींद्रनाथ सान्याल को बांकुरा से घोषणा पत्रों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। हावड़ा से योगेश चंद्र चैटर्जी को भी एच. आर. ए. की संविधान प्रतियों के साथ गिरफ्तार कर किया गया। इतना सब कुछ हो जाने से अब उत्तर प्रदेश के साथ ही साथ बंगाल का सारा कार्यभार भी रामप्रसाद बिस्मिल के कंधों पर आ गया था। साथ ही दोनों जगह का काम चलने को पैसा भी जरूरी था। जिसके लिए पहले 7 मार्च, 1925 को बिचपुरी में और 24 मई, 1925 को द्वारका पुर में डाका डाला गया, दोनों जगह एक एक आदमी की जान भी चली गई और पैसा भी कुछ खास इकट्ठा नहीं हुआ। इससे बिस्मिल को बड़ी निराशा हुई और आगे से इसने किसी भी धनी व्यक्ति के यहां डाका न डालने का प्रण कर लिया तथा सरकारी पैसे को लूटने के बारे सोच विचार करने लगा। शीघ्र ही 9 अगस्त, 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने ही नेतृत्व में 10 लोगों (अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लहड़ी, चंद्र शेखर आजाद, शचींद्रनाथ बक्शी, मन्मथ नाथ गुप्त, मुकुंदी लाल, केशव चक्रवती, मुरारी शर्मा व बनवारी लाल) को लिया था। ये सभी 8 डाउन सहारनपुर लखनऊ पैसेंजर में चढ़ गए। ज्योंहि गाड़ी काकोरी में रुक कर चली तो, इन्होंने चैन खींच कर उसे रोक दिया और गार्ड के डिब्बे में जा पहुंचे। जल्दी से खजाने की पेटी को नीचे गिरा कर व पैसे लुट कर भाग निकले। लेकिन अपनी एक चादर घटना स्थल पर भूल जाने के कारण जल्दी ही 26 सितंबर, 1925 को कुछ लोग पकड़ में आ गए। चंद्र शेखर आजाद, मुरारी शर्मा (छद्म नाम), केशव चक्रवती (छद्म नाम), अशफाक उल्ला खां व शचींद्रनाथ बक्शी पुलिस के हाथ नहीं लगे इसलिए इन्हें छोड़ कर, शेष सभी पर अभियोग चला कर 5 साल की कैद से लेकर फांसी तक की सजा सुनाई गई। 16 व्यक्तियों को सबूत के अभाव में छोड़ दिया गया। बनारसी लाल पुलिस की मार से टूट गया, जिसे रामप्रसाद बिस्मिल के खिलाफ गवाह बना दिया गया। इन सभी क्रांतिकारियों को लखनऊ जेल की बैरक नंबर 11 में रखा गया और वहीं हजरत गंज में एक अस्थाई अदालत बना दी गई। बाद में फरार हुए अशफाक उल्ला खां व शचींद्रनाथ बक्शी को भी गिरफ्तार कर लिया गया, जिसमें 13 जुलाई, 1927 को अशफाक उल्ला खां को फांसी व शचींद्रनाथ बक्शी को उम्र कैद की सजा सुनाई गई। जब कि चीफ कोर्ट में सभी क्रांतिकारियों (सिवाय शचींद्रनाथ सान्याल,भूपेंद्रनाथ सान्याल व बनवारी लाल के) ने अपील भी की थी, जिसका कुछ नहीं बना और 22अगस्त, 1927 के फैसले के अनुसार रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र नाथ लहड़ी व अशफाक उल्ला खां को आजीवन कारावास के साथ साथ फांसी की सजा भी सुनाई गई, वही ठाकुर रोशन सिंह को 10 साल की कैद व फांसी की सजा सुनाई गई। चीफ कोर्ट के इस फैसले से सारे देश में हा हा कार मच गया। सजा कम करने के लिए गवर्नर विलियम मोरिस को प्रार्थना पत्र लिखा गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इसके पश्चात शिमला में सेंट्रल काउंसिल के 78 सदस्यों की ओर एक आवेदन तात्कालिक वायसराय व गवर्नर जनरल एडवर्ड फ्रेडरिक वुड को दिया गया। इस आवेदन में मदन मोहन मालवीया, मुहम्मद अली जिन्ना, एन. जी. केसकर, लाला लाजपत राय व गोविंद वल्लभ पंत का भी निवेदन था। लेकिन इसे भी खारिज कर दिया गया और इसके पश्चात मदन मोहन मालवीया पांच प्रतिनिधियों के साथ खुद मिले भी पर फिर भी कुछ नहीं हुआ। अंत में मामला इंग्लैंड के न्यायधीश व सम्राट के वैधानिक सलाहकारों के यहां पहुंचा, जिस पर षडयंत्र के आयोजक रामप्रसाद बिस्मिल के प्रति बहुत कुछ कहा गया और क्षमा करने से साफ इनकार कर दिया गया। इस प्रकार प्रिवी कौंसिल से भी क्षमा याचना खारिज कर दी गई।

आखिर 18 दिसंबर, 1927 को इस महान वीर देश भक्त, शायर, कवि व साहित्यक (बिस्मिल) ने अपनी माता से अंतिम मिलन के पश्चात सोमवार, 19 दिसंबर, 1927 को सुबह 6.30 पर गोरखपुर जेल में ही (रामप्रसाद बिस्मिल को) फांसी दे दी गई। रामप्रसाद बिस्मिल का साहित्य व जीवनी पढ़ने से हमें बहुत कुछ नई नई उस समय की जानकारियां, क्रांतिकारियों की विचारधारा व जीवन यापन का पता चलता है। उन्होंने बहुत कुछ लिखा है, जिसमें गीत, गजल, कविता, संस्मरण व अनुवाद आदि आ जाते हैं। अधिकतर लेखन उन्होंने अपने भूमिगत काल में ही किया था। रामप्रसाद बिस्मिल के लेखन में शामिल हैं, क्रांतिकारी उपन्यास बोल्शिविको की करतूत, अरविंद घोष की पुस्तक यौगिक साधना का हिंदी अनुवाद, ग्रेंडमदर ऑफ रशियन रिवॉल्यूशन का हिंदी अनुवाद कैथराइन नाम से, मन की लहर कविता संग्रह, वैदिक धर्म और सामाजिक क्रांति का अनुवाद, अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास, मेरी मां व गीत सरफरोशी की तमन्ना, भी इनका बताया जाता है, जो कि मौलिक रूप में बिस्मिल अज़ीमाबादी का है। इस तरह बहुत कुछ उनका लिखा देखा जा सकता है। तभी तो सरदार भगत सिंह बिस्मिल की शहादत से, प्रभावित हो कर कुछ अधिक व कट्टर ब्रिटिश साम्राज्य के दुश्मन हो गए थे और उन्होंने भी हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ कर उसे नए नाम से हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया था।

10, गणेश चतुर्थी – डॉ. कमल के. प्यासा

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