वैसे तो समस्त हिंदुस्तान अपनी प्राचीन संस्कृति, त्योहारों, उत्सवों व तरह तरह के पर्वों के लिए विशेष पहचान रखता है। इन्हीं में से एक त्योहार रूपी पर्व हमारी लोहड़ी भी आ जाती है जो कि उत्तर भारत में विशेष रूप से (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरांचल व हिमाचल आदि राज्यों) बड़े ही उत्साह व धूम धाम से मनाई जाती है। पंजाबियों में तो इस त्योहार का विशेष महत्व रहता है, वह भी उन परिवारों में जहां नई बहू का प्रवेश या नवजात शिशु का जन्म हुआ होता है। ऐसे परिवारों में तो इस त्योहार का बड़े ही विशेष रूप से आयोजन किया जाता है। कई जगह लोहड़ी की अगली सुबह अर्थात मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी विशेष रूप से तैयार करके सभी परिवार के सदस्यों, सगे संबंधियों व मित्रों के साथ खाई जाती है। वैसे अन्य राज्यों में भी इस त्योहार को अपनी अपनी बोली व भाषा में अलग अलग नामों से पुकारते हुए इसे अपने अपने ढंग से मनाया जाता है। जिससे सांस्कृतिक विभिन्नता के साथ ही साथ आपसी एकता और सौहार्द स्पष्ट दिखाई देता है।
लोहड़ी का यह त्योहार पौष मास के अंतिम दिन व मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व ही रहता है, जो कि 13 या 14 जनवरी के दिन आता है। इसे (लोहड़ी को) मनाने के पीछे, घर पर रबी की नई फसल का आगमन व अगली फसल की तैयारी तथा मौसम में बदलाव की खुशी, रहती है। लेकिन इसकी ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि की ओर देखें तो पता चलता है कि कुछ पौराणिक कथा साहित्य भी इससे संबंधित हैं, जैसे कि एक पौराणिक कथा जो कि देवी शक्ति पार्वती व भगवान शिव से संबंधित है, जिसमें एक महा यज्ञ में पिता दक्ष प्रजापति द्वारा अपनी बेटी पार्वती व दामाद को आमंत्रित नहीं किया गया था, लेकिन बेटी पार्वती अपने पिता के यज्ञ में शामिल होने चली गई और उसे वहां यक्ष प्रजापति ने बुरा भला कहते हुए प्रताड़ित भी किया, जिस पर देवी पार्वती ने वहीं यज्ञ वेदी में आत्मदाह कर लिया था। देवी के आत्मदाह की याद में, तभी से लोहड़ी की प्रथा का यह चलन माना जाता है।
एक दूसरी पौराणिक कथा के अनुसार, जब राजा कंस द्वारा अपने भांजे भगवान कृष्ण को मारने के लिए राक्षसी लोहिता को गोकल पूरी में भेजा गया था, तो तब भगवान कृष्ण ने उस राक्षसी लोहिता का खेल खेल में ही वध कर डाला था और उसी दिन मकर संक्रांति भी थी, इसलिए तभी से, इसे खुशी के रूप में लोहड़ी जला कर मनाया जाने लगा है।
इसी त्योहार के संबंध में यदि मध्यकाल की बात करें तो इतिहास के पन्ने पलटने व लोक गीतों से पता चलता है कि अकबर के समय में एक नौजवान क्रांतिकारी ने अकबर के विरुद्ध ही बगावत कर दी थी, जिसका नाम दूला भट्टी था। उसका जन्म सैंडल बार (जिसे आज कल पिंडी भाटियां के नाम से जाना जाता है और पाकिस्तान में है) में वर्ष 1547 में हुआ था। और उसके पिता व दादा को मुगल शासक ने मरवाया था, इसी लिए दूला भट्टी ने मुगल शासक अकबर के विरुद्ध विद्रोह किया था। वैसे वह बड़ा ही नेक दिल व समाज सेवक राजपूत मुसलमान था। उस समय गरीबों की बहु बेटियों पर धनिक व शासकों की बुरी नजरें रहती थीं, जिसके खिलाफ दूला भट्टी ने ही आवाज उठाते हुए शासक के विरुद्ध बगावत की थी। इतना ही नहीं उसने दो गरीब परिवार की लड़कियों अर्थात सुंदरी व मुंदरी की शादी करवा कर, बेटियों की तरह ही विदा किया था। तभी से
सुन्दर मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो, दूला भट्टी वाला हो ,
नामक लोक गीत लोहड़ी के साथ चला आ रहा है।
लोहड़ी के कई तरह के लोक गीत हैं, जिनमें लड़कियों के अलग व लड़कों के अलग रहते हैं और ये सभी गीत अलग अलग प्रांतों के अपनी अपनी तरह अलग बोल लिए होते हैं, हां पड़ोसी प्रांतों के कुछ लोक गीत एक जैसे भी सुने जाते हैं। लोहड़ी लोक गीतों का गायन लोहड़ी से 15 – 20 दिन पूर्व ही बच्चों द्वारा घर घर व दुकानों पर जा कर किया जाता है। लोहड़ी गीत गायन की यह परम्परा बहुत ही प्राचीन है। लोहड़ी गीत गाने के बदले में बच्चों को मिले पैसे, लकड़ियां व उपले आदि सबको इकट्ठे करके लोहड़ी के दिन ही बच्चों द्वारा उन्हें जला कर खुशी खुशी लोहड़ी जलाई जाती हैं। लोहड़ी वाले दिन तो बच्चों को लकड़ियों और उपलों के साथ ही साथ प्रसाद के रूप में रेवाड़ी, गच्चक, मक्की के भुजे दाने व मूंगफलियां भी दी जाती हैं।
इसी दिन हर गली, मोहल्ले व सोसाइटी में बढ़ चढ़ कर लोहड़ी को मानते हुए लोगों को देखा जा सकता है।
जिसमें किसी चौराहे, खुले स्थान या पार्क में बड़ा सा लकड़ियों व उपलों का ढेर लगा कर उसके चारों ओर लोग शामिल हो कर अलाव जला देते है। क्योंकि इस दिन सूर्य देवता, अग्नि देवता और आदि शक्ति की पूजा की जाती है। इसी लिए अग्नि प्रज्वलित करने के पश्चात विधिवत रूप से लोहड़ी का पूजन करके अग्नि में रेवाड़ी, मुंगफली, गच्चक, तिल, गुड और भुनी मक्की के दाने डाले जाते हैं और फिर उसी जलते अलाव की प्रदक्षिणा की जाती है, घर के बड़ों के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद शुभ माना जाता है।
क्योंकि इस दिन से, दिन बढ़ने शुरू हो जाते हैं, ठंडक घटने लगती है तथा राते घटने लगती हैं, इसी लिए पंजाब में लोहड़ी के दिन अग्नि में रेवाड़ी व तिल का भोग डालते हुए बुजुर्गों द्वारा कहते सुना जा सकते हैं,
” तिल सढ़े, पाप झड़े
राताँ निकियां, दिन वडे चढ़े।”
अर्थात तिलहन जैसी सामग्री के जलने (आग में अर्पित) से पापों का नाश होता है, वहीं इस सब के साथ साथ लोहड़ी वाले दिन से ही राते छोटी व दिन बड़े होने लगते हैं।
देश में मनाए जाने वाले सभी तीज, त्यौहार और पर्व आदि राष्ट्रीय एकता के ही प्रतीक हैं, जिनसे आपसी सौहार्द, मेल मिलाप व निकटता आती है, दूरियां कम होने लगती हैं, और मन मुटाव खत्म हो जाते हैं। लोहड़ी का पर्व रूपी यह त्योहार भी अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ साथ, सभी जगह अपने अपने ढंग से मनाया जाता है व भिन्न भिन्न नामों से पहचान रखता है। लेकिन फिर भी सांस्कृतिक व भाषा बोली की अनेकता में भी, एकता की लौ नजर आ ही जाती है।



