बीना दास : एक गुमनाम क्रांतिकारी वीरांगना – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – जीरकपुर, मोहाली

भौतिक वाद के इस युग में, बने रहना व अपनी उपस्थिति बनाए रखना, एक भारी चुनौती का काम है। आज का समस्त बाजार, प्रचार प्रसार, विज्ञापन प्रधान, वाकपाटूता और अपने मुंह मियां मिट्ठू वाला ही तो है। जो भी इन कलात्मक गतिविधियों को नहीं जानता या इनसे दूर रहता है, वह हमेशा हमेशा के लिए गर्त की गहराइयों में खो जाता है। और उसे भूले बिसरों में ही गिना जाने लगता है।

ऐसे ही हमारी एक गुमनाम क्रांतिकारी वीरांगना बीना दास भी है और थीं। जी हां उसे अपनी शोहरत व इतनी बड़ी दी गई कुर्बानी पर रति भर भी गुमान नहीं था, फलस्वरूप उसने अपनी समस्त जिंदगी ही गुमनाम रह कर व साधारण से आश्रम में व्यतीत करके, यूं ही न जाने कैसे अपने शरीर को कैसे त्याग दिया और किसी को कोई खबर तक नहीं हुई! ऐसी पुण्य व महान आत्म को शत शत नमन। आज आत्म प्रचार प्रसार में रील पहले बन जाती है और फिर बड़े ही ताम झांम के साथ पैसों व भेंट को दिखाते हुए वीडियो/फोटो दिखाई जाती है अपने मुंह मियां मिट्ठू के कसीदे पढ़े जाते हैं, यही आज का चलन भी तो है। लेकिन कर्म करने वाले फल को नहीं देखते, उन्हें तो बस कर्म ही करने होते हैं, बीना दास की तरह बिना किसी मोह व लालच के।

वीरांगना बीना दास का जन्म माता सरला दास व पिता बेनी माधव दास (ब्रह्म समाजी परिवार) के यहां 24 अगस्त 1911 को बंगाल के कृष्णा नगर में हुआ था। पिता बेनी माधव उस समय के एक प्रसिद्ध अध्यापक थे, जिन्होंने नेता जी सुभाष चंद्र बोस को भी पढ़ाया था। माता सरला दास खुद एक योग्य सामाजिक कार्यकर्ता थीं व निराश्रित महिलाओं के लिए हमेशा अपनी सेवाएं देती रहती थीं। ऐसा भी पता चला है कि बीना दास का समस्त परिवार ही क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ा था, फिर भला बीना कैसे पीछे रह सकती थी।

सेंट जान डोसेसन गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल के समय से ही, बीना दास महिला अर्ध क्रांतिकारी संगठन संघ की सदस्या थी और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगी थी। वर्ष 1928 में जिस समय साईमन कमिशन आया था तो उसके विरोध में भी बीना दास सबसे आगे थी। स्कूली शिक्षा के पश्चात वह कलकत्ता विश्विद्यालय में बी.ए. करने के लिए दाखिल हो गई। 6 फरवरी 1932 को जिस समय बीना दास एक ओर अपनी बी.ए. की उपाधि लेने जा रही थी, और उसी दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में गवर्नर स्टेनली जैक्सन अभी मंच से बोलने ही वाले थे कि बीना दास ने उस पर पिस्टल तान कर गोली चला दी, लेकिन स्टेनली जैक्सन पिस्टल को देख कर कुछ हिल गए और निशाना चूक जाने से बच निकले। तभी उधर से लेफ्टिनेंट कर्नल सुहरावर्दी ने मंच पर पहुंच कर बीना दास को अपने एक हाथ से उसके कॉलर को पकड़ कर गर्दन दबा दी और दूसरे हाथ से उसके पिस्टल वाले हाथ को पकड़ कर उसकी (पिस्टल) दिशा ऊपर की ओर कर दी। बीना दास ने वैसे ही पिस्टल को पकड़े हुए, गोलियों को दागना तब तक चालू रखा जब तक कि सभी गोलियां दागी नहीं गई। बचाव हो गया था और उसने पांचों गोलियां चला कर पिस्टल नीचे गिरा दी थी। बीना दास की, ब्रिटिश सरकार के लिए उस समय एक बड़ी चुनौती थी। तभी उसे पकड़ कर जेल में बंद कर दिया गया। बाद में मुकदमा चला के उसे नौ वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई। वर्ष 1937 में जिस समय बंगाल में कांग्रेस की सरकार बनी तो बीना दास को रिहा कर दिया गया। आगे फिर वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय बीना को फिर से गिरफ्तार करके तीन वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया था। लेकिन फिर भी वह, हर क्रांतिकारी गतिविधि में आगे ही रहती थी। स्वतंत्रता के पश्चात बीना दास समाज सेवा के साथ साथ राजनीति में भी भाग लेने लगीं थी। वर्ष 1947 में ही बीना दास युगांतर समूह के एक भारतीय नौजवान (स्वतंत्रता कार्यकर्ता, अपने मित्र) ज्योतिष चंद्र भौमिक से विवाह के बंधन में बंध गई। वर्ष 1946 – 1947 में बंगाल प्रांत विधान सभा की सदस्य रहीं व 1947 – 1951 में पश्चिम बंगाल प्रांत की सदस्य रहीं। बीना दास की कर्मठता, समाजसेवा और क्रांतिकारी बलिदानों के देखते हुए उसे वर्ष 1960 में पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया गया। वह एक अच्छी साहित्यकार भी थीं। उसकी लिखी दो बंगला कृतियां श्रृंखल झंकार और पितृ धन, आत्म कथाएं विशेष महत्व रखती हैं।

देश सेवा व धर्म कर्म से जुड़ी बीना दास, अपने पति ज्योतिष चंद्र भौमिक के दुखद मृत्यु के पश्चात वह कोलकाता छोड़ कर, ऋषिकेश चली आईं और यहीं एक छोटे से आश्रम में रहने लगी, उसे अपने क्रांतिकारी बलिदान, राजनीतिक पदों व पद्म श्री जैसे विशेष सम्मान का रति भर भी गुमान नहीं था। उसने तो से स्वतंत्रता सेनानी पेंशन तक को लेने से इनकार कर दिया था और अपने गुजरे के लिए शिक्षिका के रूप में कार्य करने लगी थी।

लेकिन ये किसे मालूम था कि निष्काम भाव से देश हित व जन हित में व्यस्त रहने वाली वह महान क्रांतिकारी वीरांगना बीना दास, एक दिन ऐसे ही गुमनामी के रूप में ही उठ कर चली जाएगी। स्वतंत्रता सेनानी प्रोफेसर सत्यव्रत घोष के अनुसार उसकी पार्थिव देह को दिनांक 26 दिसंबर, 1986 को छिन्न भिन्न अवस्था में रास्ते के एक ओर पड़ा देखा गया थाऔर फिर कई दिनों के पश्चात ही पक्का हो पाया था कि पार्थिव देह उसकी ही थी! निष्काम भाव से किए उसके कर्म, बिना किसी लाग लपेट, बिना किसी लालच और भेद भाव के, आज भी उसकी गुमनामी सेवा भाव को प्रकट करते है। सादर नमन उसके माता पिता व उस महान गुमनाम क्रांतिकारी वीरांगना बीना दास को!

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