यौधेय का शाब्दिक अर्थ यौद्धा, वीर या युद्ध करने वाले के रूप में लिया जाता है। इस समुदाय के इन्हीं गुणों के कारण ही इन्हें यौधेय के नाम से जाना जाने लगा। ये प्राचीन भारत के शक्तिशाली, वीर व स्वाभिमानी क्षत्रिय गणराज्य के संस्थापक थे, जिसकी जानकारी हमें पाणिनि की अष्टाध्यायी, महाभारत व पुराणों से भी प्राप्त होती है। इनका गणराज्य पंजाब व हरियाणा से लेकर आगे राजस्थान के गंगानगर व हनुमानगढ़ तक फैला था, जो कि ईस्वी पूर्व की अंतिम शताब्दी में स्थापित हुआ बताया जाता है। इनका यह गणराज्य क्षेत्र यौधेय प्रदेश के नाम से जाना जाता था।
अपनी वीरता व निपुणता के कारण ही यौधेय बड़े-बड़े साम्राज्यों व आक्रमणकारियों का मुकाबला करते हुए अपने स्वतंत्र गणराज्य को यथावत बनाए रखने में सफल रहे। मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की सहायता से इन्हें अपने अधीन कर लिया था, लेकिन शीघ्र ही मौर्य साम्राज्य का पतन यौधेयों के लिए वरदान साबित हुआ और ये फिर से मजबूत गणतंत्र स्थापित करने में सफल हो गए। आगे दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व में इनका सामना इंडो-स्किथियनों (शकों) व कुषाणों से हुआ, लेकिन बाद में शकों को इनकी शक्ति माननी पड़ी। यह सारा वृत्तांत रुद्रदामन प्रथम के जूनागढ़ अभिलेख में मिलता है। इसी प्रकार समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में यौधेयों द्वारा अधीनता स्वीकार करने वाले गणराज्य का उल्लेख मिलता है।
इनके द्वारा चलाए गए चांदी व तांबे के सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि में “कार्तिकेय (स्कन्द) व यौधेयानां जय” लिखा मिलता है। ब्राह्मी लिपि के अभिलेख के अतिरिक्त बोधि वृक्ष, चैत्य, नंदिपाद व कौमारी देवी का चित्रण भी इन्हीं सिक्कों पर मिलता है।
प्राप्त यौधेय सिक्कों का विवरण सहित जानकारी:
- सिक्के की धातु = तांबा।
आकार = गोलाकार।
व्यास = 1.50 से. मी.
मोटाई = 0.05 से. मी.
भार = 1.780 ग्राम।
काल = 2 शत. ई. पूर्व से 4 ई. शताब्दी तक।
लिपि = ब्राह्मी।
प्राप्ति स्थान = चक्कर, मण्डी।
संग्रहकर्ता = स्व.चंद्र मणि कश्यप, मण्डी।
सिक्के का विवरण = इस सिक्के के एक ओर शिव परिवार के षड्मुख भगवान कार्तिक स्वामी को खड़ी मुद्रा में दिखाया गया है, जिन्होंने हाथ में भाला पकड़ा हुआ है और दूसरे हाथ को कमर पर रखा है। सिक्के के इसी ओर ब्राह्मी लिपि में “भगवत्स्य सामिन ब्राह्मणयादेवस्य कुमारस्य” लिखा है, लेकिन लेख इतना स्पष्ट नहीं है। सिक्के की दूसरी ओर षड्मुखी देवी को खड़ी मुद्रा में दिखाया गया है, साथ ही षट्छत्र (छह चापों वाली छतरी) के साथ पहाड़ी दिखाई गई है। देवी के बाईं ओर नंदीपाद तथा दाईं ओर एक वृक्ष की आकृति दिखाई गई है।
2. सिक्के की धातु = तांबा।
आकार = गोलाकार।
व्यास = 1.70 से. मी.
मोटाई = 0.50 से. मी.
भार = 1.900 ग्राम।
काल = 2 शत. ई. पूर्व से 4 ई. शताब्दी तक।
लिपि = ब्राह्मी।
प्राप्ति स्थान = चक्कर, मण्डी।
संग्रहकर्ता = स्व. चंद्र मणि कश्यप, मण्डी।
सिक्के का विवरण = इस सिक्के में भी ऊपर वर्णित सिक्के की तरह ही आकृतियाँ व अभिलेख देखा गया है, शेष अंतर केवल व्यास और भार में ही है।
3. सिक्के की धातु = तांबा।
आकार = गोलाकार।
व्यास = 1.40 से. मी.
मोटाई = 0.05 से. मी.
भार = 1.00 ग्राम।
काल = 2 शत. ई. पूर्व से 4 ईस्वी शताब्दी तक।
प्राप्ति स्थान = चक्कर, मण्डी।
संग्रहकर्ता = स्व. चंद्र मणि कश्यप, मण्डी।
सिक्के का विवरण = इस सिक्के के भी दोनों ओर पूर्व वर्णित सिक्कों की तरह ही चित्रण व लेख अंकित है, शेष अंतर केवल सिक्के के व्यास और भार का ही है।
वैसे तो यौधेयों के सोने-चांदी के सिक्कों के मिलने की कोई विशेष जानकारी नहीं है, यदि कहीं मिले भी हैं तो बहुत ही कम संख्या में, क्योंकि इनका उपयोग भी उस समय बड़े-बड़े व्यापारिक कार्यों में ही किया जाता था। विद्वान एलन ने अपने वर्णन में चांदी के सिक्कों की जानकारी देते हुए बताया है कि यौधेयों के चांदी के सिक्कों के एक ओर कार्तिकेय को भाला लिए दिखाया गया है और चारों ओर ब्राह्मी लिपि में “भगवत स्वामिनो ब्राह्मणय यौधेय” लिखा मिलता है। सिक्के की दूसरी ओर षट्तल छतरी के साथ पहाड़ी के ऊपर की ओर नंदीपद दिखाया गया है। बीच में षड्मुखी आकृति का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में तथा बायाँ हाथ कमर पर रखा देखा जा सकता है। बाईं ओर एक गमले में चार शाखाओं वाला पौधा भी दर्शाया गया है। बाद के ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी वाले सिक्के में दक्षिण की ओर मुख किए नंदी के चारों ओर “यौधेयाना बहुधान्यके” ब्राह्मी में लिखा मिलता है। सिक्के की दूसरी ओर दक्षिण की ओर मुख किए हाथी को दर्शाया गया है, तथा ऊपर पताका व नीचे वक्र रेखा रूपी नदी दिखाई गई है।




