डॉ. कमल के. प्यासा – जीरकपुर (मोहाली)
15 अगस्त 1947 के दिन भारत पूर्ण रूप से अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होकर 3 भागों में बंट गया था अर्थात—भारत, पश्चिमी पाकिस्तान व पूर्वी पाकिस्तान। अबकी बार हम अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह स्वतंत्रता कैसे प्राप्त हुई थी? शायद आपको इसकी पूरी जानकारी नहीं होगी। इसके लिए बहुत जद्दोजहद हुई थी। न जाने कितनी गोदें सूनी हो गईं, कितनी बहनों और माताओं के सुहाग मिट गए! यह आजादी यूं ही बैठे-बैठे नहीं प्राप्त हुई, इसके लिए लाखों लोगों ने शहादत दी थी।
अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की ज्वाला देश के कोने-कोने में भड़क उठी थी, क्योंकि उनकी लूट-पाट व अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही चले जा रहे थे। फलस्वरूप बंगाल में सैनिक विद्रोह, चुआड़ विद्रोह, भूमिज विद्रोह व संथाल विद्रोह आदि एक के बाद एक होने लगे थे।
1857 में तो यह विद्रोह नासूर की भांति फूट पड़ा था। फिर ऐसे ही लगातार पंजाब में कूका विद्रोह के साथ 1915 में रासबिहारी बोस व शचींद्रनाथ सन्याल ने विशेष रूप से बंगाल के साथ-साथ बिहार, दिल्ली, राजपूताना व पंजाब से लेकर पेशावर तक कई छावनियां बना दी थीं। दूसरी ओर नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा आजाद हिंद फौज का गठन करके अपनी सरकार का चलन भी शुरू कर दिया गया था। देखते ही देखते देश के कोने-कोने से नौजवान क्रांतिकारी गतिविधियों में आगे आने लगे थे। इन्हीं में शामिल थे—सरदार ऊधम सिंह, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव व मदनलाल ढींगरा आदि। इस आलेख में केवल शहीद ऊधम सिंह की ही चर्चा की गई है (स्थान के अभाव के कारण), अन्य शहीदों की बात किसी अन्य आलेख में की जाएगी।
क्रांतिकारी शहीद ऊधम सिंह का जन्म पंजाब में सुनाम के उपली नामक गांव के एक गरीब किसान टहल सिंह व माता श्रीमती नारायण कौर के घर 26 दिसंबर 1899 को हुआ था। पिता टहल सिंह उपली गांव के रेलवे क्रॉसिंग पर चौकीदार की नौकरी करते थे। ऊधम सिंह का वास्तविक नाम शेर सिंह था व उनके बड़े भाई को साधु के नाम से जाना जाता था। बालक ऊधम अभी मात्र 3 वर्ष के ही थे कि उनकी माता नारायण कौर का निधन हो गया। वर्ष 1907 के अक्टूबर माह में दोनों भाई अपने पिता टहल सिंह के साथ अपने गांव उपली से पैदल ही अमृतसर के लिए चल दिए थे। रास्ते में ठंड, भूख व प्यास के कारण चलते-चलते थक कर पिता टहल सिंह गिर गए और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा, लेकिन उपचार के दौरान ही वहां उनकी मृत्यु हो गई। इस तरह कुछ दिन चाचा के पास रहने के पश्चात दोनों बच्चों को केंद्रीय खालसा अनाथालय में छोड़ दिया गया। अनाथालय के नियमानुसार साधु का नाम मुक्ता व शेर सिंह का नाम ऊधम सिंह रख दिया गया। दोनों भाइयों की शिक्षा-दीक्षा पुतलीघर के खालसा अनाथालय द्वारा ही चलती रही।
वर्ष 1918 में दसवीं पास करने के पश्चात ऊधम सिंह ने वर्ष 1919 में अनाथालय छोड़ दिया और नौकरी की तलाश करने लगे। प्रथम विश्व युद्ध के समय ऊधम सिंह ब्रिटिश भारतीय सेना की 32वें सिख पायनियर्स की श्रमिक इकाई में शामिल हो गए। इस इकाई में उनका कार्य इराक के तट क्षेत्र से बसरा तक रेल के आने-जाने को देखना होता था। लेकिन कम आयु के कारण उन्हें छह माह से पूर्व ही वापस पंजाब भेज दिया गया। वर्ष 1918 में वे दूसरी बार फिर सेना में भर्ती हुए और इस बार उन्हें बसरा तथा बगदाद भेजा गया, जहां वे बढ़ई के कार्य के साथ-साथ मशीनों व वाहनों की देख-रेख किया करते थे। एक वर्ष पश्चात (1919 में) वे वापस अमृतसर अपने अनाथालय पहुंच गए और अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में भाग लेने लगे।
10 अप्रैल 1919 के दिन जब डॉक्टर सत्यपाल, सैफुद्दीन किचलू व कई स्थानीय नेताओं को रॉलेट एक्ट के अधीन गिरफ्तार कर लिया गया, तो अंग्रेज सैनिकों द्वारा वहां एकत्र हुई भीड़ पर गोलियां बरसाई गईं। परिणामस्वरूप वहां दंगे शुरू हो गए।
इस घटना के बाद अंग्रेजों की फजीहत का बदला लेने के लिए 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी के दिन) जब जलियांवाला बाग में 20 हजार से अधिक निहत्थे लोग शांतिपूर्वक विरोध कर रहे थे, और सरदार ऊधम सिंह अपने अनाथालय के साथियों के साथ लोगों को पानी पिलाने की सेवा में व्यस्त थे, तब कर्नल रेजीनॉल्ड डायर ने सैनिकों सहित बाग के सभी प्रवेश द्वारों को बंद करवाकर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। सैकड़ों लोग मारे गए और कई जान बचाने के लिए कुएं में कूद गए। सरदार ऊधम सिंह निहत्थे लोगों पर हुए उस खूनी प्रहार को देखकर सिहर उठे और उन्होंने अंग्रेजों से इसका बदला लेने की ठान ली।
इसके बाद वे खुलकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और वर्ष 1924 में गदर पार्टी से जुड़कर विदेशों में रह रहे भारतीयों को संगठित करने लगे। वर्ष 1927 में वे (सरदार भगत सिंह के निर्देशानुसार) अपने साथियों के साथ हथियार लेकर भारत लौटे, तो उन्हें बिना लाइसेंस हथियार व गदर पार्टी से संबंधित साहित्य रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी पुस्तक ‘गदर दी गूंज’ जब्त कर ली गई और उन्हें 5 साल जेल की सजा हुई।
जेल से रिहा होने के बाद भी उन पर नजर रखी जाने लगी, लेकिन वे कश्मीर के रास्ते अंग्रेजों को चकमा देकर जर्मनी और फिर 1934 में लंदन पहुंच गए। वहां उन्होंने इंजीनियर की नौकरी की और पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर को सजा देने की योजना बनाने लगे। 13 मार्च 1940 को कैक्सटन हॉल में भाषण समाप्त होते ही ऊधम सिंह ने माइकल ओ’डायर पर गोलियां चला दीं, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। ऊधम सिंह को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया।
31 जुलाई 1940 को पेंटनविले जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। जेल में रहने के दौरान उन्होंने अपना नाम ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ बताया, जो धार्मिक एकता का प्रतीक था।
वर्ष 1974 में ज्ञानी जैल सिंह जी के प्रयासों से शहीद ऊधम सिंह के अवशेष भारत लाए गए और उनकी अस्थियों को गंगा में प्रवाहित किया गया। उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया गया और वर्ष 1995 में उत्तराखंड के एक जिले का नाम ‘उधम सिंह नगर’ रखा गया।
आज हम स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं, लेकिन हमें इन कुर्बानियों को कभी नहीं भूलना चाहिए। स्वतंत्रता दिवस की इस पावन बेला पर सभी क्रांतिकारी शहीदों को शत-शत नमन एवं स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई।



