1 नवंबर 1966 को पंजाब पुनर्गठन के अंतर्गत कांगड़ा, हमीरपुर, ऊना, कुल्लू और लाहौल-स्पीति जैसे विविध क्षेत्रों के विलय के साथ ही हिमाचल प्रदेश के वर्तमान स्वरूप की नींव रखी गई थी। इस ऐतिहासिक मील के पत्थर की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए भाषा एवं संस्कृति विभाग द्वारा प्रतिवर्ष 1 नवंबर को ‘पहाड़ी दिवस’ के रूप में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस वर्ष भी राज्य व जिला स्तर पर कई रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। विभाग के अतिरिक्त निदेशक के अनुसार, राज्य स्तरीय मुख्य समारोह 1 नवंबर, 2026 को शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थिएटर में दो विशेष सत्रों में आयोजित होगा।
समारोह के प्रथम सत्र का शुभारंभ प्रातः 10:30 बजे कॉन्फ्रेंस हॉल में राज्य स्तरीय पहाड़ी कवि सम्मेलन के साथ होगा, जहाँ प्रदेश भर के नामी साहित्यकार अपनी मौलिक पहाड़ी रचनाओं की छटा बिखेरेंगे। इसके बाद, दोपहर 1:00 बजे मुक्ताकाश मंच पर द्वितीय सत्र का आयोजन किया जाएगा, जिसमें प्रदेश की दुर्लभ लोक गाथाओं और पारंपरिक गायन शैलियों—जैसे कुल्लू (निरमंड) का छाड़ी गायन, चंबा का मुसादा गायन, भरमौर की लोक रामायण, सिरमौर का भारतो गायन और शिमला का बरलाज गायन—की मनमोहक प्रस्तुतियां देखने को मिलेंगी।
इस गरिमामय आयोजन का मुख्य ध्येय हिमाचल की समृद्ध पहाड़ी भाषा, लोक साहित्य और प्राचीन कलाओं का संरक्षण एवं संवर्धन करना है। भाषा एवं संस्कृति विभाग इस वार्षिक आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी भाषाई धरोहर, सांस्कृतिक जड़ों और पारंपरिक लोक कलाओं से जोड़े रखने का एक निरंतर प्रयास कर रहा है।


