मुख्यमंत्री ने आज यहां कृषि विभाग की बैठक की अध्यक्षता करते हुए कहा कि सरकार विभाग को प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए हर संभव सहयोग प्रदान कर रही है। उन्होंने प्राकृतिक उत्पादों के विपणन के लिए कृषि विभाग में अलग मार्केटिंग विंग स्थापित करने तथा इन उत्पादों की डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिक्री की संभावनाएं तलाशने के निर्देश भी दिए।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में प्रदेश के 2,56,870 किसान 44,784.73 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। नई पहलों के चलते इस पद्धति को अपनाने वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है, यहां तक कि खेती छोड़ चुके किसान भी दोबारा कृषि की ओर लौट रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल देश का पहला राज्य है जिसने प्राकृतिक खेती से उत्पादित फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) निर्धारित किया है। इसके तहत गेहूं 80 रुपये प्रति किलोग्राम, मक्की 50 रुपये, कच्ची हल्दी 150 रुपये, पांगी घाटी की जौ 80 रुपये तथा अदरक 30 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदी जा रही है।
दुग्ध उत्पादन क्षेत्र पर बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि गाय के दूध का एमएसपी 32 रुपये से बढ़ाकर 61 रुपये प्रति लीटर तथा भैंस के दूध का 47 रुपये से बढ़ाकर 71 रुपये प्रति लीटर किया गया है। इस पहल से प्रदेश में दूध उत्पादन और सहकारी डेयरी प्रणाली से जुड़ने वाले किसानों की संख्या में वृद्धि हुई है। पिछले साढ़े तीन वर्षों में सरकार ने दूध उत्पादकों को 300 करोड़ रुपये का भुगतान किया है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाने के लिए लगातार कार्य कर रही है। प्राकृतिक खेती और डेयरी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए धन की कोई कमी नहीं आने दी जाएगी।
मुख्यमंत्री ने कृषि विभाग को कांगड़ा जिले के बड़ा भंगाल क्षेत्र को प्राकृतिक खेती पंचायत घोषित करने की प्रक्रिया शीघ्र पूरी करने के निर्देश दिए। साथ ही वहां उत्पादित राजमाह के लिए भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त करने की प्रक्रिया शुरू करने को भी कहा। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना प्राथमिकता में शामिल है।



