हिमाचल : पाषाण अभिलेख, संदर्भ मण्डी – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – मण्डी

मण्डी का इतिहास बंगाल से आये सेन वंश के शासकों से शुरू होता है| सेन भाईयों में साहू सेन ने सुकेत और बाहू  सेन ने कुल्लू के मगलौर पहुँच कर अपना राज काज शरू करना चाह, लेकिन बाहू सेन के बेटे बान सेन ने मण्डी के समीप, भटोली नामक स्थान (पुरानी मण्डी के ऊपर की ऒर) का चयन करके, उसे राजधानी बना कर राज्य करने लगा| बान सेन के  वंशजों द्वारा भटोली में  दिलवार सेन तक शासन चलता रहा l 1527 ईस्वी में राजा अजबर सेन ने भटोली से ब्यास नदी के बाएँ किनारे, मण्डी नगर बसा कर इसे अपनी राजधानी  बना लिया था l

ऐतिहासिक और  सांस्कृतिक शहर मण्डी, प्रदेश भर में अपने  प्राचीन मंदिरों, लोक देवी देवताओं व तीज त्योहारों के लिए विशेष पहचान रखता है| प्राचीन मंदिरों के अधिक होने के कारण ही इसे छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है| यहाँ से मिलने वाले ऐतिहासिक पाषाण अभिलेखों में शामिल है :

खरोष्ठी, ब्राह्मी, शारदा व टांकारी लिपि के, कई प्रकार के अभिलेख जो की  चट्टानों, शिलाओं, पाषाण प्रतिमाओं, पाषाण थामों, दीवारों, लकड़ी व बरसेलों (स्मृति शिलाओं) पर ऊकेरे मिल जाते हैँ|  बरसेले तो मण्डी के विशेष प्रकार के अभिलेख हैँ, जिनसे मण्डी के सेन शासकों की, अनेकों गतिविधियों की जानकारी मिल जाती है| बरसेलों के बारे में आगे विस्तार से  निम्न जानकारी  दी गई है |

मण्डी क्षेत्र से मिलने वाले पाषाण अभिलेख :

1.बरसेला अभिलेख राजा सूरज सेन l

अभिलेख श्रेणी : पाषाण l

अभिलेख   प्रकार : शिलालेख l

अभिलेख काल : 17वीं शताब्दी l

अभिलेख लिपि : टांकरी, बोली मांड्याली (पहड़ी नागरी )l

अभिलेख प्राप्ति स्थान : मंगवाई सुकेती खड्ड किनारे, नज़दीक विश्वकर्मा मंदिर, मण्डी l

अभिलेख (बरसेला) विवरण :

1बरसेला राजा सूरज सेन:

ऊंचाई/लम्बाई= 12 फुट 6 इंच

चौड़ाई= 1 फुट 11 इंच

मोटाई= 7.5 इंच

बनावट में  बरसेले का शीर्ष ,अर्ध चाप की तरह गोलाई (गुंबद समान) लिए हुए फूलों से अलंकृत है।नीचे बनी आयत में राजा को बैठी मुद्रा में दिखाया गया है। राजा के आगे शिवलिंग रखा देखा जा सकता है। राजा के पीछे की ओर दोनों तरफ एक एक सेवक को चंवर व रुमाल लिए दिखाया गया है। नीचे की दो आयतों में, एक में सती होने वाली पांच रानियां तथा दूसरी आयात में पांच ख्वासियों को कुछ गोल वस्तु को पकड़े दोनों जगह दिखाया गया है। आगे दोनों आयतों के नीचे चार अन्य आयते दिखाई गई हैं और हर आयत में सात सात रखैलों को हाथ जोड़े दिखाया गया है। इस बरसेले के अनुसार लिखे अभिलेख की रचना निम्न तरह से है:

संवत 40,राजा सुरग लोक जो

बरदया फागन परा : 15

सूरज सेन शुक्हाली  पंच्चमी तीथी

अभिलेख का हिंदी रूपांतर :

संवत 40 (1664 ई0) को राजा सूरज सेन

फागुन के 15 वें दिन की सुदी तिथि को स्वर्ग सिधार गए।

 

2.बरसेला राजा श्याम सेन

अभिलेख श्रेणी : पाषाण l

अभिलेख प्रकार : शिलालेख  l

अभिलेख काल : 17वीं शताब्दी l

अभिलेख लिपि : टांकारी, भाषा मांड्यासली l

अभिलेख प्राप्ति स्थान : मंगवाई, मण्डी l

अभिलेख विवरण :

लम्बाई(ऊंचाई)= 12 फुट 6इंच के लगभग।

चौड़ाई : 1फुट 11 इंच

मोटाई :8  इंच

बनावट में यह बरसेला भी राजा सूरज सेन के बरसेले की तरह ही है। शीर्ष भाग उसी तरह गोलाई लिए व फूलों से अलंकृत है। इसमें भी पहली आयत में राजा को बैठी मुद्रा में शिवलिंग के साथ दिखाया गया हैऔर दोनों ओर वैसे ही सेवकों को भी दिखाया गया है। राजा से नीचे वाली आयत में दो पैहरेदारों को खड़े देखा जा सकता है। पैहरेदारों से नीचे अगली आयत में एक घोड़े को, फिर नीचे आयत में फूल व अंतिम सबसे नीचे वाली आयत में हाथी पर बैठे सवार को दिखाया गया है।

इस बरसेले में अभिलेख इस प्रकार से लिखा है:

संवत 55

राजा सुरग लोक जो होय

सोज परा:12

श्याम सेन सुरग लोक जो होये

रानी 5 खवासी 2

रखैल  37

अभिलेख का हिंदी रूपांतर : राजा श्याम  सेन संवत 55 (1679 ई0) को स्वर्ग सिधार गए। आसोज़ के 12 वें दिन श्याम सेन स्वर्ग सिधार गए इनके साथ श्री रानियां 5, ख्वांसियां 2  तथा 37  रखैलें सती हुईं।

3.बरसेला राजा सिद्ध सेन

अभिलेख श्रेणी : पाषाण l

अभिलेख प्रकार : शिल्सलेख l

अभिलेख काल : 18 वीं शताब्दी l

अभिलेख लिपि : टांकरी, बोली मांड्याली l

प्राप्ति स्थान : मंगवाई, मण्डी l

अभिलेख विवरण : लम्बाई (ऊंचाई) :12फुट 6इंच

चौड़ाई : 1फुट 11 इंच

मोटाई : 7.5 इंच

इस बरसेले की रचना भी पूर्व वर्णित बेरसेले जैसी ही है। राजा की वैसे ही बैठी मुद्रा शिवलिंग के साथ व घोड़े को भी वैसे ही दिखाया गया है। लेकिन घोड़े से नीचे वाली आयत में, इधर तोते के जोड़े को आम खाते दिखाया गया है। सबसे नीचे वैसे ही हाथी को अपने सवार के साथ दिखाया है।

शिलालेख का अभीलेख बरसेले में इस तरह से लिखा गया है:

संव : 3री काती परा:8

देवान सिद्ध सेन सुरग लोक जो गये

अभिलेख का हिंदी रूपांतर:

राजा सिद्ध सेन संवत के तीसरे वर्ष (1727ई0) कार्तिक मास के आठवें दिन स्वर्ग सिधार गए।

4.बरसेला राजा ज़ालिम सेन l

अभिलेख  श्रेणी : पाषाण l

अभिलेख प्रकार : शिलालेख l

अभिलेख काल :19 वीं शताब्दीl

अभिलेख लिपि : टांकारी, बोली मांड्याली l

अभिलेख प्राप्ति स्थान : मंगवाई, मण्डी l

अभिलेख विवरण:

लम्बाई(ऊंचाई):12 फुट 4इंच के लगभग।

चौड़ाई :2फुट 3 इंच l

मोटाई: 7.5 इंच l

इस बरसेले की बनावट भी अन्य बरसेलों की तरह ही है। अन्य  बरसेलों से, इसमें जो अंतर देखा गया वह, राजा की बैठी मुद्रा के पश्चात नीचे वाली आयत में रानी के आगे शिवलिंग दिखाया गया है। रानी के दोनों ओर भी, राजा की तरह एक एक दासी तो चंवर के साथ दिखाया गया है। रानी के नीचे की ओर तीन पंक्तियों में ख्वासियों को हाथ जोड़ के बैठे दिखाया गया है। इन ख्वासियों का बैठने का क्रम कुछ इस तरह का दिखाया गया है, पहली व दूसरी पंक्ति में 3, व अंतिम पंक्ति में 4 ख्वांसियों को बैठी मुद्रा में दिखाया गया है। सबसे नीचे वाली आयत, जो कि ख्वांसियों के ठीक नीचे आती है में एक घोड़े को दिखाया गया है। इस बरसेले के अभिलेख की पंक्तियां कुछ इस प्रकार से लिखी देखी गयीं हैं:

महाराज जालम सेन 14 री पोस = परा 17

देव लोक जो ब _दया रानी

2 खवासी 3  रखेली 17

शहर मण्डी  स्टेट हुई।

बरसेले के अभिलेख का हिंदी रूपांतर:

महाराजा जालम सेन 14 वें वर्ष (1838 ई0) के

पौष मास के 17वें दिन देव लोक को सिधार गए

इनके साथ रानियां  2,ख्वासियां 3

रखैल 17

मण्डी स्टेट शहर में सती हुईं।

इसी तरह के चार अन्य बरसेले भी देखे जा सकते हैं, लेकिन उनके लेख कुछ स्पष्ट नहीं हैं। शेष बनावट सजावट एक जैसी ही है। लेकिन चारों में सती होने वाली दासियों की संख्या अलग अलग है, जैसे कि एक में चारों पंक्तियों में चार चार दासियों को बैठे दिखाया गया है। एक अन्य में पांच पंक्तियों में 23 को अर्थात पहली दो पंक्तियों में 4_4(8), अगली 3 पंक्तियों में 15 अर्थात 5_5 और फिर सबसे नीचे वैसे ही शक्ति का प्रतीक घोड़ा दिखाया गया है। एक बरसेले में 19 दासियां दूसरे में 35 दासियों को दिखा कर, अंत में घोड़े को वैसे ही दिखाया गया है।

अभिलेखों वाले बड़े बरसेलों के अतिरिक्त कुछ छोटे भी अभिलेखों वाले बरसेले यहीं देखे गए हैं जो कि संख्या में यही कोई 20 के करीब हैं और इन सभी में भी ,किसी में राजा को तो किसी में रानी तो बैठी मुद्रा में दिखाया गया है।किसी में राजा रानी दोनों को बैठे तो किसी में खड़े दिखाया गया हैऔर कहीं राजा को शिवलिंग पर जल अर्पित करते दिखाया गया है।छोटे बरसेले लम्बाई (ऊंचाई )में 16 इंच से ले कर 5 फुट तक ,चौड़ाई में 8.5 इंच से ले कर 19 इंच तक तथा मोटाई में 3.5 इंच से ले कर,4इंच तक के देखे गए हैं।

5.सलाणू / सलारी अभिलेख

अभिलेख श्रेणी : पाषाण l

अभिलेख प्रकार :चट्टान अभिलेख l

अभिलेख काल : 4थी -5वीं  शताब्दीl

अभिलेख लिपि : ब्राह्मी l

अभिलेख प्राप्ति स्थान : बाली चौकी के समीप सलाणू, सालरी नाला के साथ, मण्डी l

अभिलेख विवरण :अति प्राचीन पुरातत्विक महत्व का यह सलाणू अभिलेख (जो की हाथी के,पेट के आकर जैसी) बड़ी सी चट्टान पर तीन पंक्तियों में ब्राह्मी लिपि में उकेरा गया हैl इन पंक्तियों को पहली बार विद्वान शास्त्री हीरा नन्द ने पढ़ा था, जिसका उल्लेख उनके शोध पत्र *हिस्टोरिकल डोकुमेंट्स  ऑफ़ कुल्लू *में किया गया है l शास्त्री हीरा नन्द के अनुसार अभिलेख में उस समय के शासक राजा चंदेश्वर हस्तिन व उसके नपिता ईश्वर हस्तिन द्वारा विजय का उल्लेख हैl पिता पुत्र ने रज्जीबल को हराकर संलिपुरी नामक नगर की स्थापना की थी l शायद संलिपुरी यही सालरी ही न हो,,,! तीन पंक्तियों के इस अभिलेख के दाईं ऒर एक 20 सैं.मी. लम्बी  त्रिशूल की आकृति भी बनी है और 4 सैं .मी. की एक छोटी की कुल्हाड़ी नीचे की ऒर बनी देखी जा सकती है, ये दोनों  शस्त्र शैव व वैष्णव धर्म की ऒर संकेत करते हैँ l शास्त्री हीरा नन्द ने अभिलेख का काल चौथी शताब्दी बताया है l इसी  अभिलेख का उल्लेख विद्वान पी. एल. वोगल ने भी अपनी पुस्तक में किया है l

  1. अभिलेख त्रिलोकी नाथ मंदिर l

अभिलेख श्रेणी : पाषाण l

अभिलेख प्रकार : शिलालेख l

अभिलेख काल : 16 वीं शताब्दी l

अभिलेख लिपि : शारदा l

अभिलेख प्राप्ति स्थान : पुरानी मण्डी, मण्डी l

अभिलेख विवरण : 1520 ईस्वी में राजा अजबर सेन के काल में बना यह मंदिर पुरानी मण्डी में व्यास नदी के बाएँ किनारे पंचवक्त्र  ठीक सामने ऊपर की ऒर पड़ता है l मंदिर का निर्माण राजा अजबर सेन की रानी सुल्ताना देवी द्वारा 1520 ईस्वी मे करवाया गया था, जिसकी जानकारी इसी शिलालेख से, मंदिर के अन्य विवरण के साथ मिलती है, जो कि शारदा लिपि में लिखी है l यह शिलालेख  मंदिर के गर्भ गृह के बाहर अंतराल की दीवार स्तम्भ पर जड़ा हुआ है l

7.अभिलेख पंचवक़्त्र महादेव l

अभिलेख श्रेणी : पाषाण l

अभिलेख प्रकार : पाषाण स्तम्भ अभिलेख l

अभिलेख काल :16 वीं शताब्दी l

अभिलेख लिपि : शारदा l

अभिलेख प्राप्ति स्थान : पंचवक्त्र मंदिर, व्यास सुकेती संगम स्थल, मण्डीl

अभिलेख विवरण : मण्डी के व्यास सुकेती संगम तट पर स्थित पंचवक्त्र महादेव मंदिर का यह अभिलेख, मंदिर के सभा मण्डल के आगे के स्तम्भ पर जो कि गर्भ  गृह के सामने पड़ता है, पर उकेरा गया है। अभिलेख की चारों पंक्तियां शारदा लिपि में देखी जा सकती हैँ l इस मंदिर का निर्माण राजा अजबर सेन द्वारा 16 वीं  शताब्दी में करवया गया था, बाद में मंदिर का जीर्णोद्वार, प्रसिद्ध मंदिर निर्माता राजा सिद्धसेन द्वारा 1684- 1727 ईस्वी के मध्य करवाया था l आज कल यह मंदिर भी त्रिलोकी नाथ मंदिर की तरह भरतीय पुरातत्व विभाग के अधीन हैl

  1. अभिलेख मंदिर चुंजयाला l

अभिलेख श्रेणी : पाषाण l

अभिलेख प्रकार :शिलालेख l

अभिलेख काल : 19 वीं शताब्दी l

अभिलेख लिपि : टांकारी l

अभिलेख प्राप्ति स्थान : मंदिर चुंजयाला गढ़, थाची, मण्डी l

अभिलेख विवरण : पहाड़ी शैली का यह मंदिर, मण्डी के थाची नामक गांव से लग भाग डेढ़ -दो किलो मीटर ऊपर की ऒर, चुंज याला गढ़ के पास बना है l छोटे से मंदिर के गर्भ गृह के आगे बने (छोटे से बरामदानुमा) अंतराल के प्रवेश आधार पर अभिलेख का उल्टा शिलापट्ट लगा है, जिस पर चार पाँच पंक्तियों का टांकारी में लिखा अभिलेख देखा जा सकता है l अभिलेख में मंदिर के निर्माण सम्बन्धी जानकारी के साथ बनाने वालों के बारे में भी बताया गया है l यह शिलालेख यही कोई अढ़ायी -तीन सौ वर्ष प्राचीन लगता है l

  1. अभिलेख मंदिर भुवनेश्वरी मंदिर l

अभिलेख श्रेणी :पाषाण l

अभिलेख प्रकार :पाषाण दीवार अभिलेख l

अभिलेख काल : 19-20 वीं शताब्दी l

अभिलेख लिपि : देवनागरी संस्कृत l

अभिलेख प्राप्ति स्थान : देवी भुवनेश्वरी मंदिर, स्टेट बैंक के पीछे, मण्डी l

अभिलेख विवरण : गुम्बद शैली का देवी भुवनेश्वरी मंदिर, मण्डी के केंद्र चौहाट्टा-सेरी बाज़ार में, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के पीछे की ऒर पड़ता है l इस मंदिर का निर्माण मण्डी के राजा भवानी सेन (1866-1912) के काल में किया गया बताया जाता है l गुम्बद शैली के इसी मंदिर की दाँई ऒर की (बाहरी दीवाल के अंदर की ऒर) दीवाल पर संस्कृत के 13 अभिलेख लिखें थे, जिनमें शिक्षात्मक श्लोक राजा भवानी सेन द्वारा उस समय के अपने विद्वान पुरोहित जय देव उपाध्यय से लिखवा कर मंदिर की दीवार पर उकेरवाये थेl लेकिन आस पास के निर्माण से दीवार टूट जाने से अब ये संस्कृत के श्लोको वाले अभिलेख भी नहीं रहेl फिर संस्कृत का चलन भी मध्य काल तक रहा और संस्कृत के स्थान पर इधर भी क्षेत्रीय बोलियों का चलन शुरू हो गया लेकिन ऐतिहासिक तथ्य, तथ्य ही रहते हैँ, मिटते नहींl

  1. अभिलेख तुंगा देवी मंदिर l

अभिलेख श्रेणी : पाषाण l

अभिलेख प्रकार : पाषाण पिंडी अभिलेख l

अभिलेख काल : 17 वीं शताब्दी l

अभिलेख लिपि : टांकारी l अभिलेख प्राप्ति स्थान : तुंगा देवी मंदिर, जवालापुर, मण्डी l

अभिलेख विवरण : पहाड़ी शैली का तुंगा देवी मंदिर, मण्डी के पनारसा कस्बे से ऊपर की ऒर जवालापुर के समीप पड़ता हैl इसी मंदिर में स्थापित देवी माता तुंगा पिंडी पर टांकारी लिपि में अभिलेख देखा गया है, जिसकी बड़ी ही सूझ बुझ से ली (सफ़ेद कागज़ को पिंडी पर लपेट कर), छाप ले ली और बड़ा ही सुन्दर प्रिंट प्राप्त हुआ था, क्योंकि पिंडी बकरे के, खून से सनी थी। प्रतिलिपि मुझे डॉ. लक्ष्मण ने दिखाई थी l

टांकारी लिपि में मंदिर व पिंडी सम्बंधित जानकारी लिखी है, जो कि एक ही पंक्ति में है l यह अभिलेब लग भाग 300 वर्ष पुराना लगता हैl

हिमाचल : पाषाण अभिलेख, संदर्भ चंबा – डॉ. कमल के. प्यासा

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