इंसानियत अभी बरकरार है – डॉ. कमल के.प्यासा

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डॉ. कमल के.प्यासा – मण्डी

अब की बार जीरकपुर पहुंचने पर एच आर टी सी के चालक ने हमें ठीक मेट्रो के सामने डिवाइडर वाले फुटपाथ पर (जो कि बीकानेर वाले के बिल्कुल आगे ही पड़ता है) उतार दिया था। श्रीमती ने बेटी को पहुँचने के बारे सूचित कर दिया था। गाड़ी न होने के कारण, बेटी कैब के लिए फोन कर रही थी। मैंने सोचा कैब न जाने कब पहुंचे, सामने ऑटो खड़े थे मैं फुटपाथ से उतर कर सामने ऑटो वाले से पूछने चला गया, लेकिन ऑटो वालों ने यू टर्न होने के कारण माया गार्डन के लिए इनकार कर दिया। मैं अभी पूछ कर मुड़ ही रहा था कि मुझे अचानक जोर से हिट करके एक ऑटो निकल गया और धक्का लगने से मैं बेसुध हो, धड़ाम से सड़क के बाईं ओर खड़े ऑटो के आगे गिर गया। पास खड़े जूस वाले दौड़े दौड़े आए और उन्होंने उस हिट करने वाले ऑटो चालक को गालियां देते हुए मुझे पकड़ कर उठा दिया। अचानक झटका लगने से मेरा सिर चकरा गया था। सिर और टांग पर कुछ दर्द सा मेहसूस हो रहा था। वो दोनों भलेमानस मेरे से पूछे जा रहे थे, “अंकल जी कहीं चोट तो नहीं आई,?”

मेरा दायां हाथ और सिर जमीन पर जोर से टकराए थे, मैंने हाथ को झाड़ते हुए देखा खून बह रहा था। जूस वाले ने मेरे रूमाल से खून देख लिया था और वह उस ऑटो चालक को गालियां लेते हुए बोल रहा था, ” देखो तो कितना बदतमीज़ निकला, एक तो रोंग साइड से आया और फिर रुका भी नहीं, भाग गया,!” उसका दूसरा साथी भी कुछ कह रहा था, “मैं तो उसके पीछे भागा भी, लेकिन शातिर डर के मारे भाग गया।”

उसके दूसरे साथी ने जल्दी से कुर्सी को मेरी ओर करते हुए कहा, “अंकल जी इधर बैठो मैं इस पर कपड़ा बांध देता हूं,!” मैं हाथ पर रुमाल बांधते हुए कहने लगा, नहीं नहीं कोई बात नहीं, कृपया सामने मेरी पत्नी खड़ी है, उसे इधर ले आएं।” “आप बैठे अंकल जी हम उन्हें ले आते हैं।”

मेरा सिर अभी भी चक्करा रहा था। रुमाल को हाथ में बस पकड़ ही रखा था। उन्होंने ने सड़क के फुटपाथ पर खड़ी मेरी पत्नी को एक हाथ से पकड़ कर उतारा और साथ में बैग को उठा कर ले आए और उन्हें भी पास बैठने के लिए कुर्सी दे दी। “अंकल जी आपने जाना कहां है,?” “बस इधर ही वी आई पी रोड माया गार्डन ही जाना था, कैब अभी आई नहीं थी, ऑटो वाले से पूछ ही रहा था।” “हम अभी कर देते हैं कैब अंकल, चिंता मत करो, पट्टी करवा लेना घाव ज्याद लग रहा है,  आंटी जी”।

वो बोल रहे थे और इतने में कैब आ गई। उन्होंने हमें कैब में बैठा बैग भी रख दिया। कैब चल पड़ी, हमने धन्यवाद के साथ दोनों को बाय बाय की और निकल गए। तभी बैठे हुवे पत्नी पूछने लगी, “आपके पहचान के थे, क्या, ये लोग,?” “नहीं तो,!” “तो आपको जानते होगें,  कितनी अच्छी तरह से उन्होंने कुर्सियां ला कर बैठाया और प्यार से पानी भी पिलाया, कौन किसी को ऐसे पूछता है,?”

“अरे नहीं, ये तो यहीं जूस की दुकान वाले थे, इन्होंने ने ही तो मुझे गिरते ही उठाया था, भला हो इनका।” “सच ये तो बड़े ही भले लोग थे, उस परमात्मा के भेजे फरिश्ते ही थे ये, परमात्मा सुखी रखे इन्हें व इनके परिवार को।” पत्नी अब उन्हीं के बारे बोले जा रही थी और ऐसे ही हम अब अपनी सोसाइटी माया गार्डन पहुंच गए थे।

मैंने पत्नी से फिर कहा, कोई किसी का कितना भी बुरा कर ले, लूट, खसूट, मार, दहाड़, कर ले लेकिन ऊपर वाला सब देखता है और जो होना है, हो कर ही रहता है लाख बुरा हो कोई, उसकी नजर से नहीं बच सकता। इसी लिए तो भाग दौड़ और मार दहाड़ के मध्य इंसानियत अभी भी बरकरार है।

हिमाचल : पाषाण अभिलेख, संदर्भ किन्नौर – डॉ. कमल के. प्यासा

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