जिधर देखूं तू ही तू – रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह – नालागढ़

सर्वभूतेषु येनैकमव्ययं भावमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥

उपरोक्त श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 18वें अध्याय का 20वाँ श्लोक है, जिसका अर्थ है—वह ज्ञान, जिसमें मनुष्य सभी प्राणियों में एक ही अविभाज्य, अविनाशी ईश्वर को देखता है, उसे सात्त्विक ज्ञान कहा जाता है।

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥

यह श्लोक भी श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय का 29वाँ श्लोक है, जिसका अर्थ है—योग में लगा हुआ व्यक्ति (योगी) सभी प्राणियों में समभाव देखता है और सभी प्राणियों में एक ही आत्मा के दर्शन करता है।

इस प्रकार गीता हमें सिखाती है कि किसी मनुष्य के बाहरी रंग-रूप को न देखकर उसके भीतर स्थित परमात्मा के अंश को देखें, जो सभी में एक समान है। प्रत्येक प्राणी में एक ही आत्मा या परमात्मा का वास है—इसका एक बहुत ही सुंदर प्रसंग सिख इतिहास में ‘भाई कन्हैया जी’ के जीवन से मिलता है।

गुरु गोविंद सिंह जी का भव्य दरबार सजा हुआ था। मंत्री-संत्री सुंदर वस्त्र धारण कर गुरु जी के सामने नतमस्तक होकर दरबार की कार्यवाही कर रहे थे। दरबार पूरी तरह से आम जनता से भरा हुआ था और गुरु जी आम जनता के शिकवे-शिकायतें सुनकर उनका निवारण कर रहे थे। इतने में कुछ सिख सैनिक लगभग दौड़ते हुए दरबार में आए और औपचारिक अभिवादन के बाद गुरु जी से शिकायत करने लगे। सभी एक स्वर में बोले, “हे सच्चे पातशाह जी! हम लोग युद्धक्षेत्र में अपना खून बहाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं और इधर आपका सेवक कन्हैया उन्हें पानी पिलाकर जीवनदान दे देता है। गुरु जी, ऐसे कैसे चलेगा? कन्हैया का कार्य रणक्षेत्र में घायल हुए सिख सैनिकों को पानी पिलाने का है, मगर कन्हैया तो घायल शत्रुओं को भी पानी पिला रहा है, जो पानी पीकर हम पर ही वार करते हैं।”

सैनिकों की शिकायत सुनने के बाद भाई कन्हैया जी को तलब किया गया। वे तुरंत दोनों हाथ जोड़कर दरबार में हाजिर हुए और आते ही गुरु चरणों में नतमस्तक हो गए। गुरु जी ने थोड़ा गंभीर होकर कन्हैया जी से पूछा, “कन्हैया जी, तुम्हारी शिकायत आई है। सुना है तुम रणक्षेत्र में शत्रु-सैनिकों को भी पानी पिलाते हो, क्या यह बात सही है?”

कन्हैया जी ने सिर झुकाते हुए बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया, “हाँ सच्चे पातशाह, यह बात बिल्कुल सत्य है।”

गुरु जी ने फिर पूछा, “ऐसा क्यों, कन्हैया जी?”

कन्हैया जी की आँखें भर आई। उन्होंने रुँधे हुए कंठ से कहा, “गुरु जी, मैं तो आपकी आज्ञानुसार सिर्फ घायल सैनिकों को पानी पिलाता हूँ। मैं यह कभी नहीं देखता कि घायल सैनिक सिख है या शत्रु। मुझे तो सब के सब घायल एक से लगते हैं और सब में तेरा ही रूप नज़र आता है।”

गुरु गोविंद सिंह जी ने तुरंत कन्हैया जी को उठाया, अपने गले से लगा लिया और मुस्कुराते हुए बोले, “कन्हैया जी, आपने सचमुच मेरी शिक्षाओं को अच्छे से समझा है।” उन्होंने कन्हैया जी को एक मरहम की डिबिया भी दी और बोले, “आज के बाद तुम्हें घायल सैनिकों को न केवल पानी पिलाना है, अपितु मरहम भी लगाना है।”

इस घटना के बाद कन्हैया जी इतिहास में ‘भाई कन्हैया जी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए, जिनके नाम पर आज भारतवर्ष में अनेकों चैरिटेबल तथा समाजसेवी संस्थाएँ स्थापित हैं, जो निष्काम भाव से मानवता की भलाई के लिए काम कर रही हैं।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि भाई कन्हैया जी ने मानवता की भलाई के लिए जो सिद्धांत वर्ष 1704 में स्थापित किया, कालांतर में सन् 1859 में सोल्फेरिनो (Solferino) की लड़ाई के बाद 1863 में जिनेवा के हेनरी ड्यूनेंट (जो एक स्विस व्यवसायी थे) ने युद्ध में घायल सैनिकों की निष्पक्ष मदद करने के लिए ‘रेड क्रॉस’ की स्थापना की। इसे वैश्विक समर्थन मिला और यह संस्था आज भी निष्काम भाव से युद्ध में घायल सैनिकों की भलाई के लिए काम कर रही है। ‘रेड क्रॉस’ का मानवीय सिद्धांत भी कमोबेश श्रीमद्भगवद्गीता, गुरु गोविंद सिंह जी तथा भाई कन्हैया जी के सिद्धांतों का ही विस्तार है।

रात्रि भोज – रणजोध सिंह

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