सजा (लघुकथा) – रणजोध सिंह

Date:

Share post:

रणजोध सिंह के द्वारा लिखी गई एक प्रसिद्ध कहानीरणजोध सिंह – नालागढ़

अध्यापन प्रोफेशन में होने के कारण नित्यान्द जी अक्सर ट्रैफिक रूल्स की न केवल वकालत करते थे, अपितु विधिवत रूप से उनका पालन भी करते थे| यहाँ तक कि कार पार्किंग करते समय भी वे उचित स्थान देखकर बड़े सलीके से गाड़ी पार्क करते थे, ताकि उनकी वजह से किसी को असुविधा न हो तथा आसपास की गाड़िया आसानी से निकल सकें|

उस दिन उन्हें महाविद्यालय के एक जरूरी काम से एस.डी.एम. ऑफिस जाना था| इस कार्य हेतु वह और उनका एक प्रोफेसर दोस्त जैसे ही पार्किंग में गए तो देखा, उनकी कार के ठीक सामने कुछ ना-समझ लोगों ने अपनी गाड़ियां इस तरह से लगा दी थी कि उनकी कार हिल भी नहीं सकती थी| काम अति महत्वपूर्ण था और उनके पास समय कम था| मित्र ने सुझाव दिया कि बेहतर होगा कि वे लोग स्कूटर से ही चले जाएं| वैसे भी एस.डी.एम. ऑफिस महाविद्यालय से एक-आध किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं था| यद्यपि शहर की बढ़ती हुई ट्रैफिक को देखकर नित्यान्द जी ने कई वर्ष पहले से ही टू व्हीलर का इस्तेमाल छोड़ दिया था, मगर गर्मी के मौसम में उनकी पैदल चलने की हिम्मत नहीं हुई| समय की गरिमा का सम्मान करते हुए और गर्मी से बचने के लिए न चाहते हुए भी उन्होंने अपने दोस्त का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और वे दोनों स्कूटर पर बैठकर अपने गंतव्य के लिए निकल पड़े|

अभी वे कॉलेज गेट से निकालकर सड़क पर ही पहुंचे थे, तो देखा कि उनका एक अन्य सहयोगी पैदल ही सड़क पर जा रहा था| मित्र ने स्कूटर रोक लिया और सह्रदयता दिखाते हुए उससे भी स्कूटर पर बिठा लिया| नित्यान्द जी मन ही मन बहुत क्रोधित हुए पर प्रत्यक्ष रूप से कोई विरोध नहीं कर सके| उनके कॉलेज से कोई 200 कदम की दूरी पर कुछ पुलिसकर्मी पहले से ही नाका लगाकर खड़े थे| स्कूटर पर तीन सवारियों को देखकर उन्होंने स्कूटर रुकवा लिया, जैसे ही एक पुलिस वाले की नज़र नित्यान्द जी पर पड़ी, उसने उनके पैर छुए और हँसते हुए अन्य पुलिसकर्मियों से बोला, “अरे! ये तो अपने गुरूजी हैं, अब इन्हें क्या कहें, इन्हें जाने दो|” शायद वह पुलिस वाला कभी उनका विद्यार्थी रहा होगा या उन्हें अच्छी तरह से जानता होगा| और इधर नित्यान्द जी को काटो तो खून नहीं| उनके लिए उसके यह शब्द किसी मौत की सजा से कम नहीं थे|

वे तुरंत स्कूटर से उतर चुपचाप तेज़–तेज़ कदमों से अपने गंतव्य के लिए पैदल ही चल पड़े, मगर पुलिस कर्मी के ये शब्द अब भी उनका पीछा कर रहे थे, “अरे! ये तो अपने गुरूजी हैं, अब इन्हें क्या कहें, इन्हें जाने दो|”

माय लविंग फैमिली – रणजोध सिंह

Sponsored

Daily News Bulletin

Nurturing Creativity – Keekli Charitable Trust, Shimla

Related articles

Today, 25 Oct 2026 : International Artist Day

Celebrated globally every year on October 25 to mark the birth anniversary of iconic Spanish painter Pablo Picasso...

MNRE Powers Up Special Campaign 6.0 with Rapid Target Completion

The Ministry of New & Renewable Energy (MNRE) is driving a major workplace transformation under DARPG's Special Campaign...

NITI Aayog Urges States to Adopt Model Tenancy Act

Delivering the valedictory address at the 2nd National Urban Conclave, Rajiv Gauba, Member, NITI Aayog, called for a...

रामायण महाकाव्य के रचनाकार : ऋषि बाल्मिकी

डॉ. कमल के. प्यासा - मंडी जी हां, रत्नाकर नाम से जाना जाने वाला यही व्यक्ति प्रसिद्ध ऋषि व...