डॉ. कमल के. प्यासा – ज़ीरकपुर ,मोहाली
सुना करते थे जब नाना-नानी से
अपने कस्बे (हज़ारों) की बात।
तंबाकू की मंडी, थे बताते
लगा दी गई थी जिसे भयानक आग,
मची भगदड़ कैसी थी…
देखी थी जिसने चहुं ओर भड़कती आग…
है सन-47 की यह बात!
फिर आती है याद…
मैं तो था माँ की गोदी में,
था कैमलपुर शहर का नाम।
दादा-दादी से खूब सुनते
उस खौफनाक मंज़र का हाल।
दादी दिखाती थीं ज़ख्म बरछी के,
जब-जब होती विभाजन की बात!
फिर आती है याद…
अपने को तो कुछ पता नहीं,
कैसे-कैसे पहुँचे…
क्या थे समय के हालात?
लेकिन सुना था माता-पिता से:
“प्यास में पीते जोहड़ से पानी,
पीछे से हुआ था अचानक प्रहार!”
मरते-मरते कैसे बचे थे,
माता रानी को करते थे याद!
फिर आती है याद…
हूक उठती है दिल में अब भी,
कैसा घर, कहाँ रहते थे?
क्या देख पाएँगे कभी उसे…?
ख्वाहिश दिल की दिल में रह गई,
हुए जब अस्सी के पार।
घूमे गलियाँ दिल्ली की सारी,
ठिकाना ढूँढ़ते और घर-बार!
फिर आती है याद…
नाना-नानी, दादा-दादी की
कही-सुनाई वे सारी बातें,
कैसे-कैसे, कहाँ से कहाँ पहुँचे…
आखिरी बार हिमाचल में!
आगजनी, खून-खराबे की बातें सुन-सुन,
देख ‘तमस’, ‘टोबा टेक सिंह’ और रेल की भारी भीड़…
हो जाती हैं यादें ताज़ा
रिश्ते-नातेदारों की…
फिर आती है याद…




