हिमाचल प्रदेश का एक ऐसा जिला भी है जो ठण्डे रेगिस्तान के नाम से जाना जाता है, अर्थात जिला लाहौल स्पीति ।
जी हाँ, इसकी आबादी कम व भूगोलिक क्षेत्र बहुत बड़ा है, जलवायु ठण्डी होने के कारण ही यहाँ कड़ाके की ठण्ड पड़ती है लेकिन वर्षा बहुत ही कम होती है ।
मैं बात कर रहा हूं इसी लाहौल व स्पीति की। यहाँ के अभिलेखों की जानकारी से पूर्व थोड़ा सा इस क्षेत्र का परिचय जरुरी है। लाहौल और स्पीति दोनों ही अलग अलग व विपरीत दिशा के क्षेत्र हैँ, पर दोनों क्षेत्रों में बौद्ध धर्म व तिब्बतीयन संस्कृति की बहुलता देखी गई है।
शरू में दोनों ही क्षेत्रों पर बाहरी हस्ताक्षेप रहा है। लाहौल का क्षेत्र एक लम्बे अंतराल तक एक ऒर लद्दाख व दूसरी ऒर कुल्लू के शासकों के मध्य विवाद बना रहा और आखिर 17 वीं शताब्दी में कुल्लू के अधीन आ गया। दूसरी ऒर स्पीति पर तिब्बत का प्रभाव था, जिसके साथ इसके व्यपारिक, धार्मिक व सांस्कृतिक सम्बन्ध भी थे।
बाद में इन दोनों क्षेत्रों पर कुछ कुल्लू के जागीरदारों ने अपना अधिकार जमा लिया था। 1846 ईस्वी के एंग्लो सिख युद्ध के पश्चात, जब कांगड़ा अंग्रेज़ों ने जीत लिया तो कुल्लू के ये दोनों क्षेत्र भी अंग्रेज़ों के अधिकार में आ गए थे। क्योंकि 1846 ईस्वी से 1940 ईस्वी तक ये दोनों क्षेत्र कांगड़ा ज़िले में ही पड़ते थे। 1941 ईस्वी में दोनों को अलग अलग उप तहसील बना दिया गया। प्रथम जून, 1960 को लाहौल और स्पीति, को मिला कर एक ही जिला बना दिया गया और ज़िले का मुख्यालय कैलांग रखा गया। 1966 ईस्वी में जब पंजाब का पुनर्गठन किया गया तो कांगड़ा के साथ ये सभी क्षेत्र हिमाचल में आ गए। लाहौल और स्पीति दोनों ही धर्म और सांस्कृतिक दृष्ठि से बौद्ध धर्म प्रभावित हैँ। आज ज़िले के दोनों क्षेत्र अपने बौद्ध धर्म व संस्कृति के साथ साथ प्राचीन मठों (गोंम्पोँ) व क्षेत्र की प्रसिद्ध झीलों (चंद्रताल,सूरजताल) के लिए अपना विशेष स्थान बनाये हैँ।
1.अभिलेख त्रिलोक नाथ मंदिर।
अभिलेख श्रेणी :पाषण।
अभिलेख प्रकार :शिलालेख।
अभिलेख काल : 10 वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : शारदा, भाषा संस्कृत।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : त्रिलोक नाथ मंदिर, उधयपुर, लाहौल।
अभिलेख विवरण : लाहौल, उदय पुर के समीप चंद्रभागा नदी के बांये सिरे पर शिखर शैली के बने त्रिलोक नाथ मंदिर जिसे टुंडा विहार के नाम से भी जाना जाता था, के गर्भ गृह की दीवार पर स्थापित शारदा लिपि में उत्कीर्ण संस्कृत के अभिलेख को आज भी पढ़ा जा सकता है। अभिलेख के अनुसार मंदिर का निर्माण 10 वीं शताब्दी में, क्षेत्र के राणा दीवानज़रां द्वारा करवाया गया था, जिसमें महा योगी चरपट नाथ के समर्थन से राजा चम्बा, साहिल वर्मन ने भीअपना सहयोग दिया था। अभिलेख में ही राणा दीवानजरां को मंदिर का संस्थापक व पुजारी बताया गया है।
- अभिलेख कारदंग गोंम्पा
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार :शिलालेख।
अभिलेख काल :12 वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : तिब्बती भोटी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : कारदंग गोंम्पा के समीप बाहर चित्रित पत्थर चट्टानों पर।
अभिलेख विवरण :कारदंग गोंम्पा जो कि कैलांग से डेढ़ दो किलोमीटर ऊपर की ऒर, भागा नदी के दाएं व रांगचा के नीचे कि ऒर स्थित है, का निर्माण 12 वीं शताब्दी का बताया जाता है। गोंम्पा का जीर्णोद्धार वर्ष 1912 में लामा नोरबू रिंपोछे द्वारा करवाया गया था फरैंक की पुस्तक “वेस्टरेंन तिब्बत, ” के इतिहास के अनुसार ये शिलालेख बहुत ही प्राचीन हैँ और 12 वीं शताब्दी से सम्बंधित है तथा गोंम्पा डुकप्पा काग्यु (रेड हैट ) सम्प्रदाय से सम्बंधित है। अभिलेखों से सामाजिक, धार्मिक, चित्रित “ॐ मणि पद्मे हूं “मन्त्रों व अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ साथ गोंम्पा के चित्रों, बौद्ध देवताओं व प्रशासन की जानकारी भी मिलती है।
- अभिलेख शिशुर गोंम्पा।
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार : शिलालेख।
अभिलेख काल : 17 वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : तिब्बती भोटी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : शिशुर गोंम्पा, शांशर गांव कैलांग।
अभिलेख विवरण : शिशुर गोंम्पा भागा नदी के बाएँ किनारे उस पार कैलांग से लग भग दो किलोमीटर दूरी पर स्थित है, इस गोंम्पा के स्थापना जाँस्कर के लामा देवा ग्यात्सो द्वारा की गई थी और यह गोंम्पा भी डुकप्पा काग्यु (रेड हैट) सम्प्रदाय से सम्बंधित है। गोंम्पा का शिलालेख गोंम्पा के अंदर ही स्थापित बताया जाता है, जिसमें बताया गया है कि देवा ग्यात्सो उम्र भर यही रहा था साथ में यह भी जानकारी दी गई है कि उस समय की यहाँ परम्पराएं व संस्कृति कैसी थीं।
- अभिलेख तिनान।
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार : चट्टान अभिलेख।
अभिलेख काल : 11 वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : तिब्बती भोटी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : गोंदला राजकीय वरिष्ठ माध्य्मिक पाठशाला परिसर।
अभिलेख विवरण : तिनान का यह अभिलेख गोंदला के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला के परिसर में एक विशाल चट्टान पर उत्कर्ण है, इसमें तीन विशाल बौद्ध आकृतियाँ भी दिखाई हुई हैँ, माध्य वाली आकृति सबसे लम्बी है और इसे कमल पर खड़ी मुद्रा में दिखाया गया है जो कि मैत्रेय बुद्ध की प्रतीत होती है, जब कि दूसरी आकृति के हाथ में कमल फूल ले रखा है। पास ही 17 वीं शताब्दी का प्राचीन किला बना है जिसे कुल्लू के राजा मान सिंह (1688-1719, ईस्वी) द्वारा अपनी लाहौल विजय पर बनवाया था। ऐसा भी बताया जाता है कि 8 वीं शताब्दी में यह स्थान बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार का बहुत बड़ा केंद्र था, जिसे यहाँ के ठाकुरों का सiमर्थन प्राप्त था।
- अभिलेख गुंगथांग या गुंगशांग।
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार :पाषण दीवार अभिलेख।
अभिलेख काल : 8 वीं -10 वीं शताब्दी के मध्य।
अभिलेख लिपि : प्राचीन तिब्बती।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : तुपछिलिंग गांव, गुरु घण्टाल के निकट की पहाड़ी पर।
अभिलेख विवरण : गुंगथांग जो कि उस समय पश्चिम तिब्बत (गुंगे व पुरंग) मेंआने वाला क्षेत्र का हुआ करता था, से प्राप्त अभिलेख की लिपि पुरानी तिब्बती है। यह प्राचीन लिपि ब्राह्मी से प्रभावित प्रतीत होती है व उचेन शैली का प्रारंभिक रूप देखती है, जिसका प्रयोग उस समय बुद्ध धर्म के प्रचार के लिए किया जाता था। इस तरह अभिलेख से उस समय के राजाओं, शासकों व अन्य अधिकारीयों आदि की जानकारियों के साथ साथ कला संस्कृति, बौद्ध धर्म के प्रभाव, धार्मिक विधि विधान व बौद्ध मठों के निर्माण की जानकारी भी मिलती है।
- अभिलेख लालुँग रवेर खांग (सेर खांग) ।
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार : चट्टान लेख व शिलालेख।
अभिलेख काल : 10 वीं – 11वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : तिब्बती भोटी l
अभिलेख प्राप्ति स्थान : लालुँग मठ (सेर खांग गोल्डन टैम्पल), लालुँग गांव, स्पीति।
अभिलेख विवरण : लालुंग मठ जिसे गोल्डन टैम्पल के नाम से भी जाना जाता है, का निर्माण 10 वीं शताब्दी के अंत में एक बौद्ध अनुवादक रिनचेन जाँगपो द्वारा करवाया गया था। अभिलेख, जो कि निकट की चट्टान पर उकेरा हुवा है से मठ की स्थापना, स्थापना करता की जानकारी , दान देने वालों के साथ साथ बुद्ध धर्म के सन्देश व पवित्र मन्त्र “ॐ मणि पद्मे हूँ ” भी लिखा हुआ है।
- ताबो अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार : गुहा रॉक कट अभिलेख।
अभिलेख काल : 10 वीं शताब्दी के आस पास।
अभिलेख लिपि : तिब्बती भोटी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : स्पीति के ताबो मठ के समीप वाली गुफा में स्थित हैँ।
अभिलेख विवरण : स्पीति के ताबो मठ का निर्माण राजा यशेयो – ओ के समय, 996 ईस्वी में किया बताया जाता है। मठ का जीर्णोद्धार इनके भतीजे जांगच्यूब द्वारा 1042 ईस्वी में करवाया गया था। यही सारी जानकारी गुहा अभिलेख में दी गई है। अभिलेख में दान देने वालों, महायान के बौद्ध धर्म की शिक्षाएं, मठों के निर्माण, भीति चित्रों, जातक कथाओं, वज्रयान परम्परानुसार चित्रित मंडलो की व्याख्या व बौद्ध भिक्षुओं को मठों को किसी भी प्रकार से हानि न पहुंचने के आदेश भी दे रखे हैँ। दूसरे अभिलेखों में भी कई प्रकार के निर्देश व 1837 ईस्वी में विधानसभा पर हुए हमले का भी उल्लेख किया गया है। इतना ही नहीं अभिलेख के साथ साथ कई एक जीव जंतुओं की आकृतियां व धार्मिक चिन्ह (सूर्य, सतूप, स्वस्तिक व ॐ मणि पदमे हूँ) मन्त्र आदि भी ऊकेरे हुए देखे गए हैँ। इन सभी कला कृतियों व प्रमाणों से भारतीय व तिब्बती संस्कृति के गहरे संबंधों की झलक मिल जाती है। ऐतिहासिक धरोहर के इस संस्थान व रॉक कट गुहा अभिलेखों आदि सभी को, भारत सरकार के पुरातत्व विभाग की देख रेख में देखा जा सकता है।
8.अभिलेख समदो।
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार : चट्टान अभिलेख व शिलालेख रूप में।
अभिलेख काल : 6वीं – 10 वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : ब्राह्मी, तिब्बती (भोटी) , भाषा संस्कृत।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : समदो, लद्दाख सीमा के साथ का गांव।
अभिलेख विवरण : समदो जो किसी समय तिब्बत, मानसलू व बूढ़ी गड़की घाटी के मध्य व्यापार का मार्ग हुआ करता था। समदो के इन तीनों रास्तों से जुड़ाव के कारण, इस पर सबसे अधिक प्रभाव तिब्बत का ही था, इसी लिए अभिलेख अधिकतर तिब्बती ब्राह्मी के संस्कृत भाषा में देखे गए हैँ। अभिलेखों में “ॐ मणि पदमे हूँ “मन्त्र, सूत्र व मूल बुद्ध धर्म के सिद्धांतों के साथ तीर्थ यात्रियों, व्यपारियों, दान देने वालों
- अभिलेख मृकुला देवी मंदिर।
अभिलेख श्रेणी : काष्ठ।
अभिलेख प्रकार : काष्ठ स्तम्भ अभिलेख।
अभिलेख काल : 8 वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : शारदा।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : मृकुला देवी मंदिर द्वार के दाँई ऒर।
अभिलेख विवरण : 11 वीं -12 वीं शताब्दी के पुर्निर्मित (उदय पुर, लाहौल) देवी मृकुला मंदिर, जिसे पाण्डवों द्वारा बनाया बताया जाता है, और लकड़ी की कारीगरी में अपनी विशेष पहचान रखता है। मंदिर के प्रवेश द्वार के दाँई ऒर लकड़ी के स्तम्भ पर ऊकेरे गए शारदा लिपि के इसी अभिलेख में, निर्माण करता राजा ललिता दित्य (कश्मीर के शासकों) व रानी दिद्दा का भी उल्लेख मिलता है। मंदिर में लकड़ी का किया अद्भुत कार्य कश्मीरी कला व संस्कृति को प्रदर्शित करता है।
10.लारी अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार : चट्टान व शिला अभिलेख।
अभिलेख काल : 11 वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : तिब्बती (भोटी) व टांकरी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : प्राचीन रॉक आर्ट साईट, निकट अश्व प्रजनन केंद्र, लारी, लाहौल स्पीति।
अभिलेख विवरण : लारी स्पीति घाटी का पेट्रोग्लिफ (नक्काशी चट्टान) का सबसे बड़ा स्थान मना जाता है। इसकी पेट्रोग्लिफ व नक्काशी पूर्व साक्षर (Preliterate) काल से लेकर विभिन्न प्राचीन अवधियों की बताई जाती हैँ। यहाँ के अभिलेखों के साथ ऊकेरी मानव आकृतियों से कई प्रकार की जानकारियां मिलती हैँ। ऐसा भी बताया जाता है कि यहीं से प्राचीन *सेरलँग *किले के अवशेष भी प्राप्त हुए हैँ। चट्टान व शिलालेखों से राजाओं के आदेश, गुरुओं के नाम, बौद्ध धार्मिक मंत्र “ॐ मणि पदमे हूँ “,मंत्र सूत्र, रक्षा मंत्र, धार्मिक चिन्ह स्वास्तिक, ॐ, ज्योमितीय आकृतियाँ, जीव जन्तु चिन्होँ में नील भेड़, शिकार करने की आकृतियाँ आदि देखने को मिलती हैँ।




