कीरतपुर साहिब :गुरुद्वारों का कस्बा रूपी शहर व गुरुद्वारा पातालपुरी

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डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

कीरतपुर एक पहाड़ी व मैदानी क्षेत्र है यहीं से आगे पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है। यहीं से होते हुवे सतलुज नदी व इसकी नहर को आगे बहते देखा जा सकता है।किसी समय यह समस्त क्षेत्र जंगलों से भरा हुआ करता था । 17 वीं शताब्दी में सिखों के 6 ठे गुरु,गुरु हर गोविंद सिंह द्वारा (अपने पुत्र गुरदित्ता को कह कर) कैहलुर (बिलासपुर) पहाड़ी क्षेत्र के राजा तारा चंद से कुछ भूमि खरीद कर 1627 ईस्वी में इधर कीरतपुर को बसाया था।रोपड़ जिला में पड़ने वाला कीरतपुर का यह कस्बा रोपड़ से 30 किलो मीटर,चंडीगढ़ से 90 किलो मीटर, राष्ट्रीय उच्च मार्ग 21 में पड़ता है।यहीं से10 किलो मीटर आगे नंगल ऊना मार्ग पर आनंद पुर साहिब आ जाता है। इधर रोपड़ से आनंद पुर तक अनेकों गुरुद्वारे इस क्षेत्र में देखने को मिल जाते हैं।

दूसरे सिखों के सातवें व आठवें गुरु भी इधर ही पैदा हुवे थे।इनके पश्चात नौवें गुरु ,गुरु तेग बहादुर 1672 ई0 में पटना से पंजाब होते हुए इधर यहीं के पहाड़ी क्षेत्र चक्क नानकी (आनंद पुर साहिब)आए थे। यहीं पर गुरु तेग बहादुर जी से मिलने कुछ कश्मीरी पंडित कश्मीर से सहायता हेतु पहुंचे थे । गुरु तेग बहादुर जी ने पंडितों से अपनी ओर से पूरी मदद करने के साथ ही साथ यह भी आश्वासन दिया था कि वे खुद दिल्ली बादशाह औरंगजेब के पास जा कर बात करें गे। क्योंकि उधर कश्मीरी पंडितों को मुगलों द्वारा बलपूर्वक धर्म परिवर्तन के लिए कहा जा रहा था। इधर गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों को सहायता का आश्वासन दे कर उन्हें वापिस कश्मीर भेज दिया ,वहीं यही खबर बादशाह औरंगजेब के पास उसके गुप्तचरों द्वारा पहुंचा दी गई।परिणाम स्वरूप गुरुतेग बहादुर को उनके दिल्ली पहुंचने से पूर्व ,रास्ते में ही गिरफ्तार कर लिया गया।दिल्ली में फिर औरंगजेब द्वारा तेगबहादुर पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला जाने लगा ,लेकिन गुरु जी अपने धर्म पर अडिग रहे ,जिस पर बादशाह ने उनका सिर धड़ से अलग करवा कर उन्हें मार दिया। कहते हैं कि गुरु जी का वही कटा शीश ,एक शिष्य भाई जैता द्वारा दिल्ली से 1675 ई0 में इधर लाया गया था।

उसी शीश को उनके पुत्र ,10 वें गुरु गोविंद सिंह जी आनंद पुर साहिब ले गए और वहीं पर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया।बाद मेंअस्थियों को इधर पाताल पुरी में प्रवाहित किया गया था।ऐसा भी बताया जाता है कि 10 वें गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा ही ,यहीं पर 13 अप्रैल 1699 को वैसाखी वाले दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी और पांच प्यारों को चुन कर उन्हें अमृत भी छकाया गया था। ऐसा भी बताया जाता है कि गुरु नानक देव जी भी घूमते हुवे कीरतपुर आए थे ,उस समय इधर जंगल ही जंगल हुआ करता था। मुस्लिम संत पीर बुद्धन शाह से भी इस स्थान से संबंध बताए जाते हैं।यहां के गुरुद्वारों में शामिल हैं:गुरुद्वारा पाताल पुरी री,गुरुद्वारा बाबा गुरदित्ता,गुरुद्वारा बावन गढ़ (यहीं पहले गुरु तेग बहादुर जी का शीश भाई जैता द्वारा लाया गया था),गुरुद्वारा शीश महल,गुरुद्वारा मंझी साहिब,गुरुद्वारा चरण कमल व गुरुद्वारा हरगोविंद साहिब।

गुरुद्वारा पाताल पुरी : अभी पीछे ही 30 मार्च ,2025 को अपने बैनोही के परिवार के साथ (छोटी बहिन की अस्थियों के प्रवाह के लिए) मै इधर आया था तो इस गुरुद्वारे को देखने का भी सौभाग्य मिल गया। अति प्राचीन इस गुरुद्वारे का समस्त परिसर व वास्तुकला देखते ही बनती है।परिसर का समस्त क्षेत्र एक किलोमीटर से कुछ अधिक ही लगता है।रोपड़ से इधर आती बार गुरुद्वारा राष्ट्रीय उच्च मार्ग 21 के बांई ओर रेल के ट्रैक को पार करके पड़ता है।यही पर पहले एक लम्बी कतार में गुरुद्वारे की ओर बढ़ती बर्तनों से भरी दुकानें देखने को मिलती हैं.जिनसे आप पवित्र जल के बर्तन,तलवारें,कृपाणें,मालाएं,कड़े,कंघे,सिर ढपाने के रुमाले व अन्य जरूरी पूजा पाठ का सामान खरीद सकते हैं।इन्हीं दुकानों के आगे की ओर दाईं तरफ बड़ा सा पार्किंग स्थल बना है,जिसके साथ ही बाईं तरफ बड़ा सा सुन्दर गुरुद्वारा बना देखा जा सकता है।इस गुरुद्वारे की वास्तुकला देखते ही बनती है।

समस्त वर्गाकार गुरुद्वारा भवन एक ऊंचे चबूतरे पर बना है ,गुरुद्वारा भवन के मुख्य प्रवेश द्वारा पर पहुंचने के लिए कुछ पौड़ियां चढ़नी पड़ती हैं। पौड़ियां चढ़ते ही हम गुरुद्वारे के बाहरी प्रदक्षिणा पथ की गैलरी में पहुंच जाते हैं ।मुख्य द्वारा से हम अंदर के विशाल दरबाल हाल में प्रवेश करते हैं।यहीं दरबाल हाल के ठीक मध्य में थोड़ा पीछे हट कर ऊंचे आसान पर गुरु ग्रंथ साहिब जी को ग्रंथि के आगे सुन्दर आवरण में रखे देखा जा सकता है।आगे का सभागार जो कि दर्शकों की भारी भीड़ से भरा रहता है ,को भी देख सकते हैं।सेवादार चारों तरफ निर्देश देते व बाहर से आए दर्शकों की मदद करते हुए भी देखे जा सकते हैं। प्रदक्षिणा पथ चारों ओर से सुन्दर रेलिंग से सुसज्जित है और आगे पीछे के साथ ही साथ दाएं बाएं से भी आने जाने की सुविधा के लिए खुले हैं। पीछे वाला प्रवेश जो कि अंत तक ( जो की नदी के छोर तक जाता है) पूरी तरह से छता हुआ है।

पौड़ियां चढ़ कर सामने वाली गैलरी में कुल मिला कर 7 रोशनी व हवा के लिए खुले तोरण रूपी बनावट देखी गई है।इनमें 3 दाईं ओर 3 बाईं ओर के छोटे व मध्य वाला जो कि प्रवेश द्वारा के आगे है वह बड़ा है।इस तरह से पिछली तरफ व दाईं बाईं ओर के तोरण देखे जा सकते हैं। बाईं ओर के तोरणों की जो संख्या देखी गई वह ग्यारह है ।चारों तरफ के तोरण अच्छी तरह से सुसज्जित व आकर्षक दिखाए गए हैं।गुरुद्वारे के ऊपर छत पर हुआ निर्माण भी वास्तुकला का अद्भुत नमूना है ,जिसमें छत के चारों कौनों पर चार तलों वाले गुंबदाकार छतरीनुमा (बुर्ज)(हवा महल की तरह चारों तरफ से खुले) भी देखे जा सकते हैं।दोनों बुर्जों के ठीक मध्य में ही एक अन्य तीन तलों वाली रचना का निर्माण किया गया है ,जिसमें साईड के छोटे व मध्य में बड़े गुंबद लिए लंबी सी गैलरी दिखाई गई है। इसी नमूने के ठीक आगे मध्य प्रवेश तोरण के ऊपर की ओर तीन गुंबदों वाली एक अन्य सुन्दर झरोखेदार (वास्तुकला का )निर्माण दिखाया गया है।

पीछे की ओर भी ठीक ऐसा ही निर्माण दोनों पीछे वाले बुर्जों के मध्य में बना दिखाया गया है।गुरुद्वारे की इसी छत के ठीक मध्य में चार तलों वाली वर्गाकार एक अन्य सुन्दर आकृति(रचना) देखने को मिलती है,जिस पर गुरुद्वारे का मुख्य व बड़ा सा गुंबद बना है गुरुद्वारे का मुख्य भाग भी तो यही होता है। जिसके के नीचे बड़ा सभा भवन व दरबार भवन बना हैं। इन सब के अतिरिक्त कई एक छोटे छोटे अन्य बने गुंबद भी देखे जा सकते हैं। गुरुद्वारे की पिछली तरफ दाईं ओर कुछ ठहरने के कमरे व पंजीकरण कार्यालय स्थापित है ,जहां हरिद्वार की तरह ही अस्थियां प्रवाहित करने वालों का पूरा ब्यौरा लिखा जाता है।इसी तरह से गुरुद्वारे के पीछे ,बाईं ओर लंगर भवन में लंगर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।पीछे थोड़ा आगे ही सतलुज नदी की धारा को प्रवाहित होते देखा जा सकता,जिसके दोनों तरफ बैठने की व्यवस्था पौड़ियों वाले घाट बना कर की गई है।

अस्थियों(फूलों)के प्रवाह के लिए सीमेंट के बने पक्के पुल के दूसरी ओर जाना पड़ता है।वैसे पास ही दूसरा पुराना जीर्ण अवस्था वाला लकड़ी का पुल भी देखा जा सकता ,जिसका आजकल कोई प्रयोग नहीं हो रहा,क्योंकि वह खतरनाक है और कभी भी टूट कर गिर सकता है। नदी के दोनों ओर भारी संख्या में लोगों को बैठे व पानी का आनंद लेते देखा जा सकता है। पाताल पुरी के इस पवित्र स्थल का महत्व पवित्र तीर्थस्थल हरिद्वार जैसा ही है,कई एक गुरुओं कीअस्थियां इधर ही प्रवाहित हुई है और यही पर सिखों के अतिरिक्त अन्य लोग भी समय समय पर अस्थियां प्रवाहित करने को आते रहते हैं।

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