सिरमौर के रेणुका तीर्थ का सांस्कृतिक स्वरूप – डॉ.हिमेन्द्र बाली

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डॉ.हिमेन्द्र बाली – सिरमौर नाहन

हिमाचल प्रदेश का सिरमौर जिला बाहरी हिमालय पर्वत श्रेणी में अवस्थित है जो अपनी नैसर्गिक सुषमा और प्राचीनतम् सांस्कृतिक गरिमा के लिये प्रसिद्ध है। वैदिक नदियां यमुना और सतलुज के मध्य स्थित सिरमौर राज्य का किन्नर-बुशहर राज्य के उपरान्त महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सिरमौर हिमाचल प्रदेश के 14 अप्रैल 1948 में गठन पर एक जिले के रूप में स्थापित हुआ। इससे पूर्व सिरमौर रियासत पर दो राजवंशों का राज्य रहा। पूर्ववर्ती काल में सिरमौर पर राठौर वंश के शासकों का राज्य रहा। शिमला (महासु) जिले की जुब्बल रियासत के राजवंश के इतिहास में उल्लेख है कि 12वीं शताब्दी से पूर्व इस राजवंश का राज्य सिरमौर में स्थापित था जिसकी राजधानी पांवटा के समीप गिरि नदी तट पर सिरमौरी ताल में थी। शिमला जिले के अंतर्गत पूर्ववर्ती जुब्बल व बलसन रियासतों के शासक भी स्वयम् को सिरमौर के राजवंश से सम्बन्धित मानते हैं और सिरमौरी ताल से जाकर जुब्बल में राज्य स्थापित करने की बात की पुष्टि करते हैं । परन्तु तारीख-ए-सिरमौर के लेखक कुंवर रणजोत सिंह जेम्स टॉड की पुस्तक का संदर्भ देते हुए सिरमौर के प्राचीन वंश को यदुवंशी मानते हैं जिनका अस्तित्व गिरि नदी में बाढ़ आ जाने के कारण मिट गया। परन्तु जेम्स टॉड का पूर्ववर्ती सिरमौर राज्य के यदुवंश से सम्बन्धित होने का प्रमाणिक आधार स्थापित नहीं होता है। हैमिल्टन का कथन है कि 1082 ई. में सिरमौर में राठौर वंश का राज्य था।
वास्तव में जुब्बल, बलसन व सिरमौरी ताल के भग्नावशेषों के अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि 12वीं शताब्दी से पूर्व सिरमौर में राठौर वंश का राज्य था।
12वीं शताब्दी तक सिरमौर की राजधानी पांवटा घाटी में क्यारदा दून में सिरमौरी ताल में थी जो यमुना व गिरि नदियों के संगम से लगभग दस-बारह किमी उत्तर-पश्चिम में गिरि नदी के दायीं ओर स्थित थी।
सिरमौरी ताल में राठौर वंशज राजा की राजधानी थी जो एक मान्यतानुसार काला जादू में निष्णात नटनी के श्राप के कारण गिरि नदी की भयंकर बाढ़ में नष्ट हो गई। सिरमौर राज्य की राजधानी के बाढ़ में नष्ट होने से सम्बन्धित मान्यतानुसार सम्वत् 1139 अर्थात् 1082 ई. में सूर्यवंशी मदन सिंह सिरमौर का शासक था जिसकी राजधानी इसी नाम से सिरमौर (सिरमौरी ताल) में थी। परन्तु जुब्बल के इतिहासानुसार उस समय सिरमौर के शासक का नाम उगर सिंह था। इसी काल में काला जादू में निष्णात नटनी ने अपने कौशल की शक्ति को प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रखा। राजा मदन सिंह ने नटनी की काला जादू की शक्ति से सशंकित होकर उसे गिरि नदी के दोनों ओर टोका और पोका को नट की रस्सी “भारट” पर पार करने और वापस लौटने की चुनौती प्रस्तुत की और कौशल की सफलता पर बदले में आधा राज्य देने का बचन दिया।
नटनी रस्सी पर नदी को पार करने में सफल हुई और पुन: टोका की ओर नदी के ऊपर से लौटने लगी। राजा के दीवान जुझार सिंह ने नटनी की सफलता को देखते हुए धोखे से रस्सी को काट दिया। परिणामस्वरूप धोखे की शिकार नटनी नदी में जा गिरी। नटों ने घायलावस्था में नटी को नदी से बाहर निकाला। छल का शिकार हुई मर्माहत नटी ने गिरि गंगा नदी के जल को हाथ में लेकर  सिरमौर राज्य को श्राप देते हुए कहा:
आर टोका पार पोका, डूब मरो सिरमौरो रे लोका।
छल-कपट की इस दारूण घटना से जनित नटनी के श्राप से गिरि नदी में अप्रत्याशित बाढ़ आने के कारण राजा मदन सिंह व उसके कुटुम्भ का सर्वनाश हो गया। सिरमौर शासक की राजधानी के नष्ट होने के बाद राज्य में अव्यवस्था फैल गई और विचारशील लोग राज्य की गद्दी पर नये शासक को बिठाने की मंत्रणा करने लगे।
सिरमौर में राठौर वंश के नष्ट होने के बाद पुन: राज्य पर किसी राजवंश को स्थापित करने के विषय में ऐसा आख्यान है कि सिरमौर की गद्दी पर राजा को बिठाने के लिये होशंग राय भाट को जैसलमेर भेजा गया। उसके अनुरोध पर वहां के तत्कालीन शासक शालिवाहन द्वितीय (1168-1200) ने अपने तीसरे पुत्र हांसू को सपत्नीक सिरमौर भेजा। दुर्योगवश मार्ग में हांसू की सरहिन्द में मृत्यु हो गई। उसकी गर्भवती पत्नी ने सिरमौर के टोका नामक स्थान पर पलाश के वृक्ष के नीचे पुत्र को जन्म दिया।
अत: पलाश के वृक्ष के नीचे बालक के जन्म लेने पर बालक पलासू कहलाया। कालांतर में इस नये राजवंश का पलासिया नाम पड़ा।
अन्य आख्यान के अनुसार सम्वत् 1152 में जैसलमेर का रावल उगरसेन संयोगवश हरिद्वार आया था। वहां उगरसेन को सिरमौर राज्य का भाट होशंगराय नाथ मिला जिसने प्रशस्ति पढ़ते हुए सिरमौर की सत्ता को सम्भालने के लिये रावल को आमंत्रित किया। रावल उगरसेन के पुत्र शोभा रावल ने सिरमौर को विजित कर 27 फाल्गुन सम्वत् 1152 अर्थात् सन् 1095 ई. में सुभंश प्रकाश नाम से राजबन में सिरमौर राज्य की राजधानी बनाकर भटी वंश स्थापित किया। सुभंश प्रकाश ने 1099 ई. तक राज्य किया।
सुभंश प्रकाश (1095-1099) से लेकर राजेन्द्र प्रकाश (1933-1948) तक सिरमौर के राजवंश में 48 शासक हुए।
उदित प्रकाश (1217-1227) ने मुसलमानों के भय से अपनी राजधानी राजबन से यमुना व तौंस के संगम पर कालसी परिवर्तित की। राजा कर्म प्रकाश (1616-1630) को नाहन की पहाड़ियों में शिकार करते हुए सिद्ध महात्मा बनवारी लाल मिले। जिनसे प्रभावित होकर कर्मप्रकाश ने 1621 ई. में नाहन नगर की नींव रखी और यहां अपने राजप्रसाद का निर्माण किया। इस प्रकार राजा कर्म प्रकाश ने नाहन को सिरमौर राज्य की राजधानी बनाया। राजा कीर्ति प्रकाश (1757-1773) ने श्रीनगर (गढ़वाल) को पराजित किया। उसने नारायणगढ़, रामपुर,थानेधार, रामगढ़, मोरनी की पहाड़ियों, पिंजौर और जगतगढ़ के क्षेत्रों को विजयी कर राज्य की कीर्ति का बहुत विस्तार किया। राजा कीर्ति प्रकाश के शासनकाल में उत्तरांचल और हरियाणा के बहुत से भाग सिरमौर के अंतर्गत थे। इस काल में सिरमौर राज्य में उत्तर में हाटकोटी से लेकर दक्षिण में हरियाणा के नारायणगढ़, पूर्व में गंगा तट से लेकर पश्चिम में बांदीपुर तक सिरमौर की सीमाएं विस्तार पा चुकीं थीं।
साधु बनवारी लाल के सुझाव पर राजा ने इस क्षेत्र का नाम नाहन रखा जिसका शाब्दिक अर्थ है ना+हन अर्थात् जिसकी कोई हानि न हो। अन्य मत के अनुसार इस क्षेत्र का नाम नाहर था जिसका अर्थ सिंह होता है। नाहर ही कालांतर में नाहन नाम से प्रसिद्ध हुआ। चूंकि सिद्ध महात्मा बनवारी लाल के पास दो शेर पहरा देते थे। एक अन्य मान्यतानुसार यहां शेर बहुतायत में थे। इन्हीं विशेषताओं के कारण भी क्षेत्र का नाम पूर्व में नाहर और कालांतर में नाहन नाम से प्रसिद्ध हुआ।
सिरमौर के नामकरण के विषय में कई संदर्भ प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार सिरमौर रियासत के अन्य रियासतों में विशिष्ट स्थान रखने के कारण “सिर” अर्थात् प्रमुख के परिणामस्वरूप सिरमौर नाम पड़ा। ऐसा भी मन्तव्य है कि राठौर वंश के अंतिम शासक मदन सेन (1082 ई. ) तक सिरमौर या सिरमौरी ताल सिरमौर की राजधानी थी और राजधानी के नाम से ही राज्य का नाम सिरमौर प्रचलित था। अन्य मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में सिरमौर के राजा ने चन्द्रगुप्त मौर्य को नंद वंश के साथ हुए संघर्ष में सहयोग किया था। अत: विजयोपरान्त चन्द्रगुप्त मौर्य ने इस पहाड़ी राज्य को शिरोमौर्य अर्थात् मौर्य वंश का ताज नामक उपाधि प्रदान की। अत: कालांतर में भाषा विपर्यय के कारण सिरमौर्य सिरमौर नाम से विख्यात हुआ। ऐसी मान्यता भी प्रचलित है कि सिरमौर के राजाओं की राजधानी को पहाड़ी बोली  में सरमाऊर अर्थात् तालाब और महल कहा जाता है।अत: भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर यहां सरोवरों की राजमहल के समीप स्थिति पूर्ववर्ती सिरमौरी ताल की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप है। अत: राज्य का सरमाऊर से सिरमौर नामकरण कुछ सार्थकता को लिये हुए है।
सिरमौर के नामकरण के विषय में उपरोक्त मतों की तरह ही सिरमौर का शाब्दिक अर्थ सर्वोपरि है। सिरमौर का नामकरण सिर व मौड़ के संयोजन से हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ है सिर पर पहना जाने वाला मौड़ अर्थात् मुकुट है। अत: कालांतर में सिरमौड़ सिरमौर में व्यह्रत हुआ।
प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने अपने यात्रावृतांत में सिरमौर को श्रुघ्न अथवा सू-हि-किन-ना नाम से अभिहित किया है। कनिंघम के अनुसार सातवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में सिरमौर उत्तर भारत का शक्तिशाली और सम्पन्न राज्य था। ह्वेनत्सांग स्वयम् भी सिरमौर की राजधानी में कुछ समय तक रूका। उसने सिरमौर राज्य में पाए जाने वाले साल के ऊंचे-ऊंचे वृक्षों का वर्णन किया है। चीनी यात्री ने सिरमौर की राजधानी के वैभव की भूरि-भूरि प्रशंसा भी की है। उसने यहां पाए जाने वाले हाथियों व सिंहों आदि का वर्णन किया है। उस काल में सिरमौर का क्षेत्रफल 1000 वर्गमील था। ऐसी मान्यता भी है कि सातवीं शताब्दी का प्रचलित राज्य नाम श्रुघ्न से कालांतर में सिरमौर में परिणत हो गया।
सिरमौर के नामकरण के विषय में यहां की भौगोलिक स्थिति भी उतरदायी मानी जाती है। वास्तव में शिवालिकीय क्षेत्र में बसा सिरमौर आर्यों की भूमि ब्रह्मवर्त और आर्यवर्त के सिरे पर अवस्थित था। सिरमौर की उच्चस्थ चोटी चूड़धार की मनोरम पर्वत चोटी का सौंदर्य चिताकर्षक था। शिवालिक की पर्वत श्रृंखला पर मनोहारी चूड़धार के हिमाच्छादित शिखर के कारण क्षेत्र का नाम सिरमौर (सिर का मुकुट) पड़ा होगा।
अन्य मान्यता के अनुसार सिरमौर का नामकरण राजा शालिवाहन द्वितीय के पौत्र राजा रसालू के पुत्र सिरमौर के नाम से हुआ। इस मान्यता की पुष्टि इस बात से होती है कि राजा रसालू से जुड़ा रसालू का टिब्बा नाहन नगर के समीप है।
मनुस्मृति के अनुसार सरस्वती और दृषद्वती (घग्घर) नदियों के मध्य का क्षेत्र ब्रह्मवर्त है, जैसे:
सरस्वति दृषद्वत्यादिव नद्योर्यदुतरम्,
तं दैवनिर्मित देश ब्रह्मवर्त प्रच्यक्ष्यते।
उपरोक्त दोनों नदियां सिरमौर से उद्भूत होकर भारत वर्ष के मैदानों में प्रवेश पातीं हैं। अत: सिरमौर का कुछ भाग अवश्य ब्रह्मवर्त का भाग रहा होगा। अत: सरस्वती का उद्गम व प्रवाह क्षेत्र कनखल जनपद का प्राचीन काल का सिरमौर का वह भाग जो सिरमौर का भाग था, वह ऊंचे हिमालय पर्वत के दक्षिण में स्थित था। यह भूभाग आर्यवर्त का उत्तरी भाग था।
इतिहासकारों का मत है कि दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ का आयोजन कनखल नामक स्थान पर हुआ जो प्राचीन काल में सिरमौर का भाग था। अत: उस काल में सिरमौर पर दक्ष प्रजापति का राज्य रहा होगा।
सतलुज घाटी में स्थित कुमारसैन रियासत पर लिखी पुस्तक “बहारे कुम्हारसैन” में 166 ई. में सिरमौर राज्य की घटना का संदर्भ निहित है। इस ऐतिहासिक घटना के अनुसार सन् 166 ई. में कुमारसैन के राणा जोरावर सिंह के काल में सिरमौर के राजा ने रामपुर बुशहर राज्य पर आक्रमण किया। रामपुर बुशहर की देवी महाकाली ने सिरमौर के राजा को आक्रमण न करने के लिये चेताया। अन्यथा हैजे से सिरमौर की सैना का विनाश हो जायेगा। परन्तु सिरमौर के राजा ने महाकाली की चेवावनी को अनदेखा कर बुशहर पर आक्रमण किया। महाकाली की चेतावनी के अनुरूप हैजे से सैंकड़ों सैनिक मर गये और बाध्य होकर सेना को लौटना पडा। वापस लौटते हुए सिरमौर का शासक कुमारसैन के राणा जोरावर सिंह के पास रूका और राणा ने सिरमौर के राजा के साथ राजकुमारी का विवाह किया।
राणा जोरावर सिंह के पुत्र दिल रंजन सिंह के शासन काल में भी सिरमौर के राजा ने कुमारसैन शासक के मना करने पर रामपुर बुशहर पर आक्रमण किया। इस युद्ध के परिणाम पहले से भी घातक सिद्ध हुए और सिरमौर को घोर पराजय का सामना करना पड़ा। अत: दूसरी शताब्दी में भी सिरमौर में राज्य स्थापित था जिसके सतलुज घाटी के कुम्हारसैन रियासत के राणा के साथ वैवाहिक सम्बन्ध थे और इसी काल में सिरमौर के रामपुर बुशहर पर दो युद्धाभियानों की विफलता के संदर्भ राज्य की प्राचीनता को सिद्ध करते हैं।
वास्तव में सिरमौर का क्षेत्र सतलुज व यमुना के बीच कुलिंद जनपद के अंतर्गत था। ऋग्वेद  में वर्णित है कि ऋग्वैदिक आर्य आरम्भिक काल में यहां बहने वाली नदियों सरस्वती और आपाया (मारकण्डा) के तटों पर बसे। यहां की लोकगाथाओं में इस आशय की अनेक अनुश्रुतियां इस तथ्य को सिद्ध करतीं हैं। ऋग्वेद के सप्तसिंन्धु क्षेत्र में वर्तमान का पंजाब और हिमाचल प्रदेश का विस्तृत क्षेत्र विद्यमान था। उस समय के सुविख्यात पंच जन का ऋग्वेद में वर्णन विस्तार से हुआ है। यह पंच जन पंजाब और हिमाचल की भूमि में विस्तार पाकर अपनी शक्ति का संवर्द्धन कर रहे थे। इन पंज जनों के नाम पुरू, अनु, द्रुह्यु, यदु और तुर्वश था। राहुल सांकृत्यायन ने नाहन के राजवंश को यदु जन से सम्बन्धित बताया है जिनको यमुना नदी के समीप अपना प्रसार करते हुए बताया गया है।
हिमाचल के इस शिवालिकीय क्षेत्र में आर्य राजा देवोदास और अनार्य राजा शम्बर के बीच चालीस वर्ष तक हुए युद्ध का उल्लेख है जो विद्वानों के मतानुसार सिरमौर के शिवालिकीय क्षेत्र में हुआ। सिरमौर शिवालकीय क्षेत्र के अंतर्गत है जो हिमाचल (हिमालय) का प्रवेश द्वार है। वैदिक संस्कृति  व सभ्यता सरस्वती नदी के आस-पास  पलवित-पुष्पित हुई। सरस्वती नदी की सहायक नदियां घग्घर (दृषद्वती), मारकण्डा व गिरि आदि नदियां का प्रवाह सिरमौर क्षेत्र में है और इन्ही के किनारे जमदग्नि ऋषि के नेतृत्व में ऋषियों का एक समूह सरस्वती नदी के किनारे विचरण करते हुए निचली पहाड़ियों में प्रविष्ट हुआ और अपने आश्रम स्थापित किये। यहां सप्तर्षियों में एक जमदग्नि ने जामू कोटी में आश्रम की स्थापना की। जामू के टिब्बे पर जमदग्नि की तप:स्थली के समीप ढलान पर सफेद मिट्टी का बिखराव है जिसे ऋषि की यज्ञ बेदी की राख के अवशिष्ट माना जाता है। जामू के टिब्बे पर ऋषि जमदग्नि की यज्ञशाला व समीप ही आज्ञाकारी पुत्र परशुराम का लघु मंदिर स्थित है। सहस्रार्जुन व जमदग्नि का कामधेनु गाय के लिये संघर्ष का प्रकरण इस शिवालिकीय क्षेत्र में घटित हुआ माना जाता है।
पिता के साथ कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के बैरभाव के परिणामस्वरूप परशुराम ने सहस्रार्जुन का वध कर जलाल नदी में अपना परशा धोया जिससे नदी का वर्ण लाल हो गया। अत: वह सरिता लाल वर्ण के कारण जलाल नदी कहलायी जो धारटीधार के लवासा चौकी के पूर्वी भाग से निकलती है।
मारकण्डेय पुराण के रचयिता मारकण्डेय ऋषि ने सिरमौर के बोहलियो के समीप बाड़ावन में घोर तप कर नदी का सृजन किया। ऋषि के नाम से ही जल धारा का नाम मारकण्डा नदी पड़ा जो वैदिक नदी सरस्वती की सहायक नदी रही है। मारकण्डा नदी के तट पर ही मारकण्डेय ऋषि ने मारकण्डेय पुराण की रचना की।
महाभारतकाल के कुरू वंशज कौरवों व पाण्डवों की घटनाओं का सिरमौर की लोकपरम्परा में दिग्दर्शन होते हैं। यहां के खशों के खूंद शाठड़ व पांशड़ क्रमश: स्वयम् को कौरवों व पाण्डवों का वंशज मानते हैं।
कालसी में मौर्य वंशज अशोक महान के कालसी में शिलालेख के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिरमौर या तो मौर्य वंश का अंग रहा होगा या ख्यातिलब्ध स्वतंत्र मित्र राज्य रहा होगा।
गिरिगंगा व जलाल नदी के संगम पर स्थित ददाहू के समीप गिरि गंगा के वाम भाग में रेणुका स्थल ऋषि जमदग्नि की पावन भूमि रही है। यहीं एक बड़ा सरोवर है जो जमदग्नि की पत्नी रेणुका को समर्पित है। निकटस्थ एक अन्य सरोवर पुत्र परशुराम को समर्पित है। परशुराम सरोवर में जलापूर्ति माता रेणुका के सरोवर से होती है। यहीं एक घाटी का नाम रामश्रृंग भी है। रेणुका जी से ऊपर कामड़ी टिब्बा है जहां कपिल मुनि और कामली माता अवस्थित है। उत्तर की ओर जामू कोटी से ठीक ऊपर उतुंग शिखर तपे (तापे) का टिब्बा है जहां जमदग्नि ऋषि का चौंतड़ा और ठीक सामने पुत्र परशुराम का लघु मंदिर है।
एक मान्यतानुसार इस शिखर का नाम तपे का टिब्बा इसलिए नाम पड़ा कि यहां भार्गव गोत्र के प्रवर्तक भृगु ऋषि तप करते थे और यहां उनका आश्रम था। यहीं कालांतर में ऋषि जमदग्नि और माता रेणुका ने भी तप किया था।
जमदग्नि के अतिरिक्त अगस्त्य व गौतम ऋषियों ने भी रेणुका के आस-पास पर्वत शिखरों पर आश्रम बनाकर तप किया और आर्य संस्कृति का प्रसार किया। अत: ऋग्वदिक काल में ही आर्य शिवालिक की घाटियों को पार कर सिरमौर से निकलने वाली सरस्वती व आपाया (मारकण्डा) नदियों के उद्गम स्थानों पर पहुंचकर बस गये थे। ऋग्वैदिक काल के परवर्तीकाल त्रेतायुग में भार्गव परशुराम गिरि आर व पार क्षेत्र में अपने पिता-माता व भाईयों के साथ रहे। इस बात का प्रमाण यह है कि रेणुका झील के दोनों ओर पर्वतमाला को वशिष्ठ पर्वत कहा जाता है। ददादू के दायीं और की धार टारन पर्वत वनाच्छादित है और शाली तीर्थ नाम से सुविख्यात है। धार टारन पर्वत के दूसरी और महेन्द्र पर्वत है जो भार्गव परशुराम से सम्बन्धित पौराणिक संदर्भों के अनुसार परशुराम यहां आज भी तपोनिष्ठ है।
परवर्ती काल द्वापर युग में पाण्डवों का लाक्षागृह की घटना के बाद व अज्ञातवास काल में शिवालिकीय व हिमालयी क्षेत्र में प्रवास की अनेकानेक मान्यताएं यहां प्रचलित हैं। संक्षेप में सिरमौर का क्षेत्र महाभारत काल में कुलिंद जनपद का भाग था और यहां के कुलिंदों ने पाण्डवों व कौरवों का महायुद्ध में साथ दिया। आज भी यहां के कुलिंद कनैत या खश नाम से विख्यात हैं और महाभारत युद्ध में अपने पक्ष के कारण पाशी (पाण्डवों से सम्बन्धित) या शाठी (कौरवों के पक्षधर) कहकर स्वयम् को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। इसी जातीय गौरव पर आधारित विशु मेले में दोनों पक्ष धनुर्विद्या का युद्ध नृत्य ठोडा का आयोजन कर वंशीय गौरव से पुलकित होते हैं। समग्रत: सिरमौर सरस्वती-सैंधव संस्कृति व सभ्यता का सक्रिय क्षेत्र रहा है जिसके अवशिष्ट आज यहां के लोकसाहित्य, लोकसंगीत एवम् परम्पराओं में जीवंत प्रतीत होते हैं। सिरमौर जनपद की प्राचीन पृष्ठभूमि होने के कारण यहां की धर्म व संस्कृति अपनी विशिष्ट पहचान के लिये विख्यात है। सिरमौर में शैव, शाक्त, वैष्णव व सिद्धनाथ परम्पराओं का प्राधान्य रहा है। इनके अतिरिक्त सिक्ख, इस्लाम व ईसाई मत भी अल्पांश सिरमौर में प्रचलित है।
पावन तीर्थ रेणुका व सांस्कृतिक परम्पराएं: सिरमौर में हिन्दू धर्म का प्राधान्य रहा है। हिन्दू धर्म के दो स्वरूप यहां प्रचलित हैं। गिरि नदी सिरमौर को हिन्दू धर्म के दो स्वरूपों में विभाजित करती है। गिरि आर अर्थात् दायीं ओर के क्षेत्र में परम्परावादी हिन्दू धर्म का प्रचलन है। जबकि गिरि नदी के पार अर्थात् बायीं ओर प्राचीनतम् हिन्दू धर्म प्रचलित है जो कई आधार पर हिमालयी क्षेत्र उत्तरांचल एवम् जिला शिमला जिले से सम्बद्धता रखता है। सिरमौर में वैष्णव, शैव, शाक्त व सिद्धनाथ मतों की विद्यमानता दृष्टिगोचर होती है। सिरमौर के गिरि पार क्षेत्र में सप्तर्षियों में एक जमदग्नि, रेणुका एवम् पुत्र परशुराम की मान्यता सर्वव्यापक है। परशुराम का चारित्रिक बल सर्वोत्कृष्ट एवम् सार्वभौमिक है। परशुराम ने जिस स्थान का भ्रमण किया वह स्थल स्वयम् तीर्थ बन गया। ऋग्वैदिक काल के अवसान के बाद त्रेतायुग के आरम्भिक काल में सिरमौर के शिवालकीय व हिमालयी क्षेत्र में आर्य संस्कृति के प्रसार का श्रीप्रयास ऋषि जमदग्नि व रेणुकानंदन परशुराम ने किया। यह निर्विवाद तथ्य है कि वैदिक युग में हिमाचल का शिवालिकीय क्षेत्र आर्य जीवन के केन्द्र स्थलों में से एक रहा है। ऋग्वैदिक आर्यों की संस्कृति व सभ्यता के न्यूनाधिक अवशेष हिमाचल के शिवालिकीय व हिमालयी क्षेत्र में विद्यमान है। शिवालिक हिमाचल का ही पर्वत है जो प्रदेश का प्रवेश द्वार है। शिवालिक व हिमाचल के बीच के खण्ड को मध्य खण्ड कहा जाता है जहां वर्तमान सिरमौर, शिमला, सोलन, सुकेत, मण्डी, कुल्लू, हमीरपुर, पूर्वोत्तर कांगड़ा व चम्बा का क्षेत्र सम्मिलित है। यहां सैंधव, वैदिक, पौराणिक और लोक संस्कृति का संयोजित स्वरूप विद्यमान है। हिमाचल प्रदेश की इन्ही घाटियों और वादियों में आदि भृगु ने अग्नि देव को साक्षात् आकाश से पृथ्वी पर उतरते देखा था। यहीं की परम पावन धरा पर वैवस्वत मनु ने जलप्लावन के उपरान्त मानव सृष्टि का सूत्रपात किया। सप्त ऋषियों ने हिमालय के इसी क्षेत्र में तपश्चर्या के लिये आश्रम स्थापित किये। इन्ही हिमालयी उपत्यकाओं में सप्तसिन्धु की अनेक नदियों ने जन्म लिया। सतयुग के अन्त में ऋषि जमदग्नि और उनके तेजस्वी पुत्र परशुराम और मां रेणुका ने शिवालिकीय क्षेत्र सिरमौर में आश्रम बनाकर सांस्कृतिक परम्पराओं को वैदिक स्वरूप प्रदान किया।
शिवालिक व हिमालय के इस मध्य खण्ड में स्थित सिरमौर में वैष्णव, शैव, शाक्त, नाग एवम् सिद्धनाथ मतों का प्रचलन है। वास्तव में हिमाचल भारतीय समाज के राजनीति, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक घटनाओं का सहचर और साक्षी रहा है।
वैष्णव धर्म ईश्वरवादी धर्म है जिसमें विष्णु की पूजा सर्वोच्च देव के रूप में होती है। विष्णु के परवर्ती काल में वैष्णव मत रूप में प्रतिष्ठित होने के संदर्भ ऋग्वेद में भी अंतर्निहित हैं। ऋग्वेद में विष्णु को सूर्य का स्वरूप माना गया है और परवर्ती वैदिक साहित्य में इन्हे समर्पण और गरिमा के स्थान पर बलिदान से सम्बन्धित माना गया है।
हिमाचल प्रदेश में वैष्णव धर्म का प्रवर्तन गुप्तकाल में हो चुका था जिसकी पुष्टि कांगड़ा के फतेहपुर से प्राप्त कांस्य की विष्णु मूर्ति से होती है।
सिरमौर क्षेत्र में विष्णु के छठे अवतार परशुराम की गिरि घाटी में बड़ी मान्यता है। सतयुग के अवसान के साथ त्रेतायुग में ऋषि जमदग्नि ने सरस्वती व आपाया (मारकण्डा) के मध्य गन्धर्व देश में आकर गिरि नदी के वाम तट पर स्थित रेणुका में पुत्र परशुराम के साथ आश्रम की स्थापना की। ऋषि जमदग्नि सरस्वती व ब्यास घाटी और परशुराम सतलुज घाटी में सांस्कृतिक चेतना के उन्नायक रहे हैं। नाहन कस्बे से 40 किमी दूर रेणुका झील देवी रेणुका का स्वरूप ही है। सिरमौर की तपोभूमि में चूड़धार पर्वत श्रृंखला के एक स्कन्ध का नाम जामू का टिब्बा अर्थात् जमदग्नि का टिब्बा या जामू की धार नाम से सुविख्यात है। यहीं ऋषि जमदग्नि तपश्चर्या किया करते थे। जामू की धार जामू के समीप है जहां ऋषि का मंदिर है और यहीं ऋषि की यज्ञ बेदी भी है। आज भी पुजारी परम्परानुसार प्रत्येक रविवार और संक्रांति के अवसर पर यहां पूजानुष्ठान सम्पन्न करता है।
भार्गव गोत्र में उत्पन्न परशुराम विष्णु के छठे अवतार और चिरंजीवी हैं। ऋषि भृगु से भार्गव गोत्र प्रचलित हुआ। भृगु ऋषि अत्यंत प्राचीन ऋषियों में एक थे ऋग्वेद में जिनका बार-बार उल्लेख हुआ है। भृगु ऋषि को ही स्वर्ग से प्रथम बार मानवोद्धार के लिये पृथ्वी पर अग्नि को लाने का श्रेय जाता है। भृगु ऋषि ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। भृगु ऋषि के पुत्र च्यवन हुए जिनका सूर्यवंशी राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से विवाह हुआ। च्यवन ऋषि के पुत्र दधीचि ने इन्द्र को वृत्रासुर का वध करने के लिये जीवित ही अपना अस्थिपिंजर दान किया था। च्यवन ऋषि के पुत्र ऊर्व अरब देश गए। उन्ही के नाम से उस क्षेत्र का का अरब देश पड़ा। अरब देश से आकर ऊर्व रेवा अर्थात् गिरि गंगा नदी के किनारे रहने लगे। भृगु वंश में आगे चलकर ऋचीक ऋषि हुए। ऋचीक का सत्यवती से पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुआ। ऋचीक ऋषि द्वारा अभिमंत्रित चरू (खीर)
के सेवन से आशीषस्वरूप सत्यवती के आजस्वी जमदग्नि ऋषि और ऋषि ऋचीक की सास के विश्वामित्र उत्पन्न हुए। जमदग्नि का विवाह सूर्यवंशी सम्राट मान्धाता के लघु पौत्र प्रतिसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका श्रीराम के इश्वाकु वंश की राजकुमारी थी। जमदग्नि व रेणुका हैहयवंश के शासक कार्तवीर्य व उसके पुत्रों के अत्याचारों से त्रस्त थे। अत: भार्गव दम्पति ने हैहय वंशियों की क्रूरता से मुक्ति पाने के लिये विष्णु की घोर तपस्या की। विष्णु ने अपने अंश को रेणुका के गर्भ में प्रक्षेपित किया और परिणामस्वरूप परशुराम उत्पन्न हुए। परशुराम दशावतारों में छठे अवतार और चौबीस अवतारों  में सोलहवें अवतार रूप में वैसाख शुक्ल तृतीय को वैवस्वत मनवंतर के 19वें महायुग के त्रेतायुग में पृथ्वी पर आविर्भूत हुए। प्रपितामह ऊर्व से परशुराम ने रणविद्या और ऋषि अगस्त्य से शस्त्र-शास्त्र विद्या ग्रहण की और प्रचण्ड विद्याओं के स्वामी बन गए।
भृगु की संताने भार्गव कहलाईं और यह कुल अथर्ववेदी है। ऋग्वैदिक काल के अंतिम चरण में भृगु वंशज जमदग्नि ने शिवालिकीय क्षेत्र के गन्घर्व देश में गिरि नदी घाटी में तपश्चर्या के प्रयोजन से आश्रम स्थित किया। त्रेतायुग के आरम्भ में जमदग्नि व उनके पुत्र परशुराम व अन्य भार्गव नेताओं ने सारस्वत-सिन्धु क्षेत्र के वासियों के प्राण बचाकर उन्हे सुरक्षित स्थानों पर बसाया।  भार्गव श्रेष्ठ मनीषियों द्वारा शिवालिक और हिमालय पर्वतों के बीच रावी, ब्यास, सतलुज और गिरि नदियों की उत्यकाओं में आर्य बस्तियां स्थापित हुईं। इन बस्तियों में सरस्वती व इसकी सहायक नदी गिरि के ऊपरी क्षेत्र में रेणुका व हाटकोटी, सतलुज घाटी में काओ, ममेल, नीरथ, नगर व निरमण्ड एवम् ब्यास व रावी घाटी  में नगरकोट, जगतसुख, नग्गर एवम् मल्याणा प्रमुख हैं। ऋग्वैदिक काल में आर्य शिवालिक की पर्वत श्रृंखला को पार कर सिरमौर में प्रवाहित सरस्वती तथा आपाया (मारकण्डा) नदियों के उद्गमस्थल तक विस्तार पा चुके थे। जमदग्नि के अतिरिक्त अगस्त्य और गौतम ऋषियों ने भी रेणुका के आस-पास आश्रम बनाए।
वास्तव में सरस्वती व ब्यास घाटी में जमदग्नि और सतलुज घाटी में परशुराम आर्य संस्कृति के पुरोधा रहे हैं। गिरि घाटी के अंतर्गत ददाहू के समीप परशुराम ताल है । जिससे यहां भार्गव परिवार के आश्रम की पुष्टि होती है। परशुराम ताल के समीप माता रेणुका देह के गिरने से बनी झील रूप में अवस्थित है।
भागवत पुराण के एक कथानक के अनुसार एक दिन माता रेणुका सरोवर से जल लेने गई और गंधर्वराज चित्ररथ को युवतियों के साथ जलक्रीड़ा देखकर उनमें राजसी वैभव की लालसा से  मानसिक पाप हो गया। जमदग्नि ने परशुराम को मानसिक पाप से मलिन हुए पत्नी के शरीर को समाप्त करने का आदेश दिया। पितृ आज्ञा को धारण कर परशुराम ने परशा से मां का शिरोच्छेदन कर दिया। मातृ हत्या के पाप के प्रायश्चित के लिये परशुराम ने गंगा, यमुना, सरस्वती, पब्बर, सतलुज और ब्यास नदी घाटी में विचरण कर शिवालिक के उत्तर में पंद्रह स्थानों पर शिव व शक्ति के स्थल स्थापित किये। स्थानीय अनुश्रुतियों के अनुसार परशुराम ने सतलुज घाटी की पांच बस्तियों- काओ, ममेल, नीरथ, नगर व निरमण्ड एवम् लालसा, डन्सा, शिंगला व शनेरी में पांच ठहरियों की स्थापना की। भार्गव परशुराम ने सतलुज, ब्यास व पब्बर घाटियों में नरमेधी, गोमेधी और अश्वमेधी यज्ञों का आरम्भ किया।
जमदग्नि ऋषि ने गिरि नदी घाटी के जामू की धार के अतिरिक्ति सतलुज घाटी के अंतर्गत शिमला के समीप मशोबरा, सुन्नी के समीप जमोग व मकड़छा और सुकेत के तत्तापानी में आश्रम स्थापित कर आर्य संस्कृति के विस्तार में महनीय योगदान दिया। जमदग्नि ऋषि ने ब्यास घाटी के मलाणा में कैलाश झील मानसरोवर से अठारह देवों को करडु में लाकर कुल्लू घाटी में देव पूजा की परम्परा का आरम्भ किया। समग्रत: भार्गव परशुराम व जमदग्नि शिवालिक एवम् पश्चिमी हिमालय में वैदिक संस्कृति के अग्रणी ऋषि रहे हैं जिसके अवशेष आज भी देवास्था एवम् लोकपरम्पराओं में अंतरंग रूप से दृश्यमान हैं।
सरस्वती की सहायक नदी गिरि व पौराणिक जलाल के संगम पर ददाहु में जमदग्नि ऋषि का आश्रम रहा है। स्थानीय लोकाख्यान के अनुसार सिरमौर की धारटी धार में स्थित लवासा चौकी के पूर्वी भाग से जलाल नदी का उद्गम होता है। इसी नदी में भार्गव परशु राम ने सहस्रार्जन का वध कर अपने रक्तरंजित आयुधों को धोया था जिससे नदी का जल रक्त वर्ण हो गया। आज भी नदी का जल त्रेतायुग के आरम्भिक काल की इस घटना का प्रमाण है।
परशुराम जी का जन्म सतलुज घाटी के अंतर्गत श्रीपटल निरमण्ड में भूण्डे के अवसर पर गायी जाने वाले गीत में काशी में हुआ अभिहित है। परन्तु ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार परशुराम का जन्म नर्मदा नदी के किनारे हुण्डिया नेमावर आश्रम में हुआ प्रमाणित होता है। लोककथाओं के अनुसार परशुराम का जन्म हिमाचल के सिरमौर जनपद के अंतर्गत रेणुका सरोवर के समीप जमदग्नि ऋषि के आश्रम में हुआ। कुछ विद्वानों ने भार्गव परशुराम के आश्रम को सरस्वती नदी के तट पर अवस्थित माना है और सरस्वती का उद्गम भी सिरमौर में स्थित शिवालिक की पहाड़ियों से माना गया है। यह वैदिक नदी सिरमौर की उपत्यकाओं से प्रवाहित होकर हरियाणा में प्रवेश पाती है।
ब्रह्माण्ड पुराण और श्रीमद्भागवतमहापुराण में वर्णत आख्यानों में जमदग्नि, परशुराम व कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के प्रसंगों के आधार पर परशुराम की जन्मस्थली हुण्डिया नेमावर सिद्ध होती है। यह निश्चित है कि जमदग्नि ने सरस्वती,सतलुज व ब्यास घाटियों में भी आश्रम बनाये। अत: संयोगवश लोकगाथाओं में परशुराम के सिरमौर के रेणुका आश्रम में जन्म के संदर्भ अनायास ही जुड़ गये होंगे।
परशुराम जमदग्नि के पांच पुत्रों में सबसे कनिष्ठ पुत्र थे। अत: रेणुका के गर्भ से परशुराम से पूर्व रूपण्वान,सुषेण,वसु तथा विश्ववासु नामक पुत्र उत्पन्न हुए। श्रीमद्भागवद की कथानुसार जब जमदग्नि ने मानसिक पाप से मलिन हुई पत्नी के वध करने का आदेश चार बड़े भाईयों को दिया तो उन्होने पितृ आदेश के अनुपालन में असमर्थता जताई। अत: जमदग्नि ने पुत्रों को कायर कहकर उन्हे नारी रूप में परिवर्तित कर दिया और इनमें अग्रज बन्धु बिरला में प्रतिष्ठित ला देवी रूप में प्रतिष्ठित है। दूसरी देवी दोरमाई देवी रूप में प्रतिष्ठित है। तीसरी देवी भद्रमाछरी या भद्रकाली है। दरमोई और भद्रकाली देवियां साथ विराजित हैं। और इन दोनों के संयुक्त मंदिर कई स्थानों पर हैं। इनमें सबसे प्रमुख पांवटा साहिब के देतर गांव में है। चौथे भ्राता कामली देवी रूप में प्रतिष्ठित है और देवी का मंदिर रेणुका तहसील के चाना गांव में अवस्थित है। इन सभी देवियों की सिरमौर के विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी मान्यता हैं।
सभी वैदिक व पौराणिक घटनाओं के दृष्टिगत भार्गव वंश ने सदैव समाज को सच्चरित्रता का मार्ग दिखाकर नारी के सम्मान को अहम् प्राथमिकता दी है। त्रेतायुग के पूर्ववर्ती काल में हैहयवंशी कार्तवीर्य ने भृगुवंशियों पर अनेकानेक अत्याचार किये। ब्रह्मवैवर्त पुराण और महाभागवत पुराण में हैहयवंशी कार्तवीर्य व जमदग्नि ऋषि के संघर्ष का वर्णन निहित है। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार कार्तवीर्य ने ऋषि जमदग्नि के पास पुत्रीवत् कपिला गाय को प्राप्त करने के लिये ऋषि पर दत्तात्रेय द्वारा प्रदत अमोघ अस्त्र द्वारा प्रहार कर मार डाला। जबकि महाभागवत पुराण के अनुसार रेणुका ने पुत्र परशुराम का आह्वान कर कार्तवीर्य द्वारा अपह्रत कामधेनु गाय को वापस लाने का आह्वान किया। परशुराम मां की आज्ञा का पालन कर कार्तवीर्य अर्जुन का वध कर कामधेनु गाय को वापस ले आये। प्रतिशोध में कार्तवीर्य अर्जुन के पुत्रों ने ऋषि जमदग्नि का वध कर डाला।
महिष्मति का राजा कार्तवीर्य आखेट करते हुए जमदग्नि ऋषि के आश्रम में पहुंचा। इसी संदर्भ में लोकाख्यान के अनुसार जमदग्नि ऋषि की पत्नी रेणुका की बहन का नाम बैनका (बेणुका) था जिसका विवाह कार्तवीर्य सहस्रबाहु से हुआ था। एक बार जमदग्नि ने यज्ञानुष्ठान का आयोजन किया। रेणुका ने पति को बहन बेनका को अनुष्ठान में बुलाने की प्रार्थना की। आरम्भ में ऋषि ने राजा सहस्रबाहु के आतिथ्य के लिये असमर्थता व्यक्त की। परन्तु रेणुका के बारम्बार आग्रह पर सहमति व्यक्त की। सहस्राबाहु को आमंत्रित कर दिये जाने के बाद जमदग्नि ने देवराज इन्द्र से सर्वकामनादायी कामधेनु, सभी तरह की बहुमूल्य वस्तुओं को सुलभ बनाने वाले कल्पवृक्ष और सभी ऐश्वर्य को प्रदान करने वाले कुबेर को इस आयोजन हेतू मांगा। सहस्रबाहु ऋषि द्वारा अलौकिक अतिथि सत्कार से हतप्रभ हो गया और उसने अपने नाई को ऋषि द्वारा प्रदान इस अपूर्व अतिथि सत्कार के वास्तविक कारण को जानने के लिये भेजा। जब सहस्रार्जुन को पता चला कि यह अलौकिक आतिथ्य कामधेनु गाय से सम्भव हुआ तो उसने ऋषि से गाय प्राप्त करने का प्रस्ताव रखा। ऋषि ने गाय को देने से मना कर दिया और उसे वापस स्वर्ग जाने का आग्रह किया। कामधेनु गाय ने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया। सहस्रबाहु ने कामधेनु को पाने के लिये बाण से प्रहार किया। कामधेनु गाय के खुर में बाण से आघात हुआ। कामधेनु ने लौटकर सहस्ररार्जुन की सेना को नष्ट कर स्वयम् स्वधाम स्वर्ग लौट गई।
सहस्रबाहु ने अपनी विफलता के लिये जमदग्नि के इस मायावी कारण को उत्तरदायी माना और ऋषि का वध कर दिया। माता रेणुका पति की मृत्यु पर घोर विलाप करने लगी। देववाणी के माध्यम से रेणुका को सूचना प्राप्त हुई कि कुबेर के पास पुनर्जीवन देने वाला अमृत है। अत: अमृत की बूद को ऋषि के मुंह में डालने से वे पुनर्जीवित हो उठे। जमदग्नि को आभास हुआ कि पत्नी ने सहस्रार्जुन से विवाह करने के लिये उनका वध कर डाला। अत: जमदग्नि ने पुत्र परशुराम को अपनी माता का वध करने का आदेश दिया। परशुराम उस समय कोंकण में तपस्यारत थे। पिता का आदेश पाकर वे तत्काल वहां पहुंचे और माता का शिरोच्छेदन कर दिया। परशुराम ने इस घोर दुख का कारण सहस्रबाहु को पाया और भारत के मैदानी क्षेत्र में जाकर क्षत्रियों का सर्वनाश कर उनके रक्त में तैरने का प्रण लिया। जब क्षत्रियों का संहार कर परशुराम कुरूक्षेत्र पहुंचे तो इन्द्र को पता चला की परशुराम यह रक्त अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिये कर रहे हैं। अत: इन्द्र ने भारी वर्षा की और जल भराव मनुष्य की उंचाई तक हो गया और उपरी सतह रक्त वर्ण हो गई। जमदग्नि पुत्र द्वारा पूर्ण किये गये अपने संकल्प से प्रसन्न हुए और परशुधारी पुत्र को वर मांगने को कहा। परशुराम ने आग्रह किया कि मेरी माता व भाईयों को पुनर्जीवित कर दो। परशुराम ने अपनी माता का मृत्यु संस्कार भी किया। जमदग्नि ने कहा कि तुम्हारी माता व भाई जलस्वरूप में परिणत हो गये हैं। पुजारी द्वारा कही मान्यता के अनुसार परशुराम के भाई जलस्वरूप नहीं हुए और न ही यहां सरोवर भाईयों के स्वरूप हैं। जबकि छोटा सरोवर जमदग्नि को समर्पित है।
भार्गव जमदग्नि, परशुराम और सहस्रार्जुन के लोकाख्यान हिमाचल प्रदेश में सिरमौर, मण्डी एवम् शिमला जिलों में प्रचलित हैं। सतलुज घाटी में जिला मण्डी के दक्षिणवर्ती सतलुज नदी के तट पर अवस्थित तत्तापानी को जमदग्नि ऋषि की तपोभूमि माना जाता है। जबकि तत्तापनी के दक्षिणी भाग में सतलुज के बायीं ओर सुन्नी कस्बे में कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के राज्य की मान्यता सर्वप्रचलित है। वहां सहस्रार्जुन अपनी प्रवृति के कारण दानों नाम से विख्यात है और राजपरिवार का कुलदेव भी है। तत्तापानी और सुन्नी में जमदग्नि द्वारा रेणुका के आग्रह पर स्वर्गिक आतिथ्य दिये जाने पर कामधेन गाय कपिला के लिये युद्ध का आख्यान प्रचलित है।
सतलुज घाटी के तत्तापानी व सुन्नी की तरह सिरमौर के गिरि नदी घाटी के अंतर्गत रेणुका झील के आस-पास ऋषि जमदग्नि अपनी पत्नी के साथ आश्रम बनाकर रहते थे। सिरमौर में प्रचलित लोकप्रसंग के अनुसार सहस्रार्जुन का राज्य सिरमौर जिले की सैनधार क्षेत्र में था जो पौराणिक जलाल नदी के बायीं ओर अवस्थित है। पौराणिक आख्यान के अनुसार कार्तवीर्य सहस्रार्जुन हैहय वंश का राजा था जो आर्यवर्त क्षेत्र का अधिपति था। दत्तात्रेय से वरदान पाकर सहस्रार्जुन ने हजार भुजाओं का वरदान पाकर अनंत शक्ति पा ली थी। अपने बाहुबल के सामर्थ्य से उसने सिन्धु व सरस्वती नदियों के मध्य ब्रह्मवर्त क्षेत्र में अपने आधिपत्य जमाकर आर्य संस्कृति का प्रसार करने वाले वसिष्ठ, पराशर, गौतम और पराशर ऋषियों का अपमान करने का दु:साहस करना आरम्भ कर दिया।
लोक कथानक के अनुसार सैनधार क्षेत्र का अधिपति सहस्रार्जुन अपनी पत्नी बैणका (बेनका) की बहन रेणुका पर कुदृष्टि रखते हुए ऋषि आश्रम में स्वयम् सेना सहित आने के लिये आतुर हुआ। ऋषि ने पत्नी के आग्रह पर उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर कामधेनु और कुबेर के प्रताप से कल्पनातीत आतिथ्य से कार्तवीर्य को अभिभूत कर दिया। कामधेनु को पाने के लिये सहस्रार्जुन ने ऋषि का वध कर डाला और देवी रेणुका को बलपूर्वक साथ ले जाने को उद्यत हुआ। देवी ने सतीत्व की रक्षा के लिये आश्रम के समीप रामकुण्ड में छलांग लगा ली। देवताओं के आग्रह पर रेणुका बाहर आयी। तब से यह कुण्ड रेणुका कुण्ड अथवा सरोवर नाम से प्रसिद्ध हुआ। माता रेणुका ने पति की मृत्यु पर घोर विलाप किया और अपने पुत्र परशुराम को स्मरण किया। लोकमान्यतानुसार परशुराम ने अपने पिता द्वारा संताप में 21बार छाती पीठने के प्रतिशोध को धारण कर जलाल नदी के बायीं ओर सैनधार क्षेत्र में सहस्रार्जुन व उसकी सेना का विनाश किया। सैनधार में सहस्रार्जुन व उसकी सेना का इतना रक्तपात हुआ कि यहां की मिट्टी का वर्ण लाल हो गया और नदी का जल भी लाल हो गया। जल के लाल वर्ण होने से यह नदी जल लाल अर्थात् जलाल कहलाई। आज भी सेनधार की मिट्टी का वर्ण लाल है। परशुराम ने अपने रक्तरंजित परशे को जलाल नदी में धोया और जिस कारण जलाल नदी का वर्ण भी लाल हो गया। सैनधार सिरमौर जिले की प्रसिद्ध पर्वत श्रृंखला है जिसका आरम्भ सोलन व सिरमौर की सीमा पर अवस्थित गिरि नदी के बायीं और यशवन्त नगर से पूर्व की ओर गिरि व जलाल नदियों के संगमस्थल ददाहू में सम्पन्न होता है। सैनधार का लगभग आधा भौगोलिक क्षेत्र पच्छाद व आधा भाग रेणुका तहसील के अंतर्गत है। सैनधार की प्राकृतिक सुषमा के विषय में यहां कहावत है कि “सेण, गेण रो नेण ठाकरे आपी के साज राखे” अर्थात् भगवान ने सैनधार, आकाश और नाहन को स्वयम् के लिये सजाया-बनाया रखा है। स्थानीय मान्यता है कि हैहयवंशी कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने नर्मदा नदी से शिवालिकीय गंधर्व क्षेत्र की सैनधार पर्वतमाला पर सेना सहित डेरा डाला था। यहीं से उसने ददाहु के समीप गिरि पार भार्गव जमदग्नि के आश्रम में सेना सहित प्रवेश किया था। सहस्रबाहु के सेना सहित यहां ठहराव के कारण पर्वत माला का नाम सहस्रधार पड़ा जो कालांतर में सैनधार में परिवर्तित होकर लोक प्रचलित हुआ। नाम के अनुरूप यहां जल की सहस्रधार अर्थात् प्राचुर्य आज भी देखा जा सकता है। अत: हैहयवंशी सहस्रार्जुन के सिरमौर के शिवालिक-हिमालयी क्षेत्र में भृगुवंशियों के साथ संघर्ष की लोक परम्पराएं व लोकगाथाएं प्रचुरता में विद्यमान हैं जो क्षेत्र के वैदिक व पौराणिक काल खण्ड में महत्व को इंगित करतीं हैं।
रेणुका में देवी रेणुका और परशुराम के दो मंदिर हैं। प्राचीन मंदिर झील के किनारे है। परशुराम कुण्ड के किनारे अवस्थित परशुराम मंदिर में गर्भगृह में प्रस्तर फलक पर परशुराम, मां रेणुका व गणेश का उत्कीर्णत्व शोभनीय है। इनमें अक चित्र में मां रेणुका परशुराम को अंक में धारण कर दुलार रही है। दूसरे चित्र में परशुराम शारंग धनुष व परसा को धारण किये हुए है। एक उत्कीर्णत्व में कामधेनु गाय सुशोभित है। तीसरे चित्र में गणपति विराजमान है। चौथा चित्र प्रस्तर मंदिर का शिखर है जो यहां पूर्व शिखर (नागर) शैली के प्रस्तर मंदिर का परिचायक है। पांचवें उत्कीर्णत्व में मंदिर के विमान के ऊपर कलश की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। परशुराम का मंदिर शिखर शैली में निर्मित है। विमान कर विशाल आमलक स्थापित है और शिखर पर कलश सुशोभित है। मंदिर के गर्भगृह के बाहर दीवारों के साथ प्रदक्षिणा पथ बना है। अग्रभाग में मुख्य द्वार के सामने द्वार मण्डल बना है जहां से मंदिर में प्रवेश किया जा सकता है। परशुराम मंदिर के बाहर दायीं ओर परशुराम की तपशिला है जिसपर भार्गव परशुराम ने हजारों वर्षों तक तप किया था। परशुराम मंदिर के पृष्ठभाग में मां रेणुका का शिखर शैली का मंदिर है। गर्भगृह में देवी की स्थानक प्रस्तर मूर्ति विराजित है।
दूसरा मंदिर परशुराम तालाब के तट पर टेकरी पर है। प्राचीन मंदिर स्लेट की छत्त से आवृत गृह शैली में निर्मित है। इसका द्वार पश्चिमाभिमुख है। मंदिर के गर्भगृह में गणेश का एकल विग्रह प्रतिष्ठित हैं।
नये मंदिर तक पहुंचने के लिये चौड़ी सीढ़ियां बनीं हैं। यह मंदिर वर्गाकार न्याधार पर आधारित है। यह मंदिर गुम्बद शैली में निर्मित है और शिखर पर कांस्य कलश स्थापित है। मंदिर के द्वार पूर्व, उत्तर और दक्षिण की ओर खुलते हैं। उत्तर व दक्षिण के द्वार मेले के अवसर पर ही खुलते हैं। मंदिर में सत्रह विग्रह प्रतिष्ठित हैं जिनमें दो विग्रह एक-एक परशुराम, जमदग्नि, रेणुका, गणेश, शिव, दुर्गा, क्षेत्रपाल, दिगपाल, पांच पाण्डव, एक किदार भैरव और एक विग्रह पवालिया देव का है। पवालिया देव परशुराम के द्वारपाल की भूमिका में है। सिरमौर में आविर्भूत होने के कारण पवालिया को सिरमौरी देव भी कहते हैं। इन विग्रहों में जमदग्नि, रेणुका और परशुराम के विग्रह अष्टधातु से निर्मित हैं। इन तीनों विग्रहों पर चांदी के छत्र सुसज्जित हैं।
परशुराम का जामू में अवस्थित मंदिर का विशेष महत्व है। जामू मंदिर में परशुराम की पूजा का दायित्व हियून गांव के नौ पुजारी परिवार वहन करते हैं जो भाट हैं। प्रत्येक पुजारी परिवार एक महीने की अवधि तक क्रमवार पूजानुष्ठान करते हैं। पूजानुष्ठान की अवधि में पुजारी को ब्रह्मचर्य के कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है। पूजा अवधि में पुजारी को गृहत्याग कर पूरी अवधि में मंदिर में ही प्रवास करना पड़ता है। प्रात:काल शहनाई वादन के साथ भार्गव परशुराम को जगाया जाता है और सांयकाल शहनाई वादक पूरे गांव का भ्रमण करते हुए इस बात की पुष्ट करता है कि सभी ग्रामीणों ने भोजन कर लिया है। तदोपरान्त परशुराम के शयन के लिये शहनाई वादन होता है। शयन के शहनाई वादन के बाद कोई ग्रामीण भोजन नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति शयन काल के शहनाई वादन के बाद भी भूखा सो जाए तो इसका दोष परशुराम अपने ऊपर लेते हैं।
जामू में परशुराम की प्रात: और सांय पूजा होती है। प्रात: पुजारी स्नानादि के बाद स्वच्छ जल लाकर विग्रह पर छिड़कता है। घी का दीपक जलाकर शंख ध्वनि सहित निम्न मंत्रोच्चार के साथ पूजा होती है:
पहले बाराह रूपी औतार उतरे,बाराह की माता चन्द्रावती,पिता पदमावती;फिर बुद्ध रूपी औतार उतरे, बुद्ध की माता उदमावती, पिता कंवल ऋषि।
उपरोक्त मंत्र में वाराह अवतार व बुद्ध अवतार की उत्पत्ति का वर्णन निहित है जो विष्णु के अवतारों के वर्णन पर आधारित है।
मंत्रोच्चार के बाद पुजारी पुन: विग्रह पर पानी छिड़कता है और शंख ध्वनि करता है। पूजा के समय शहनाई का वादन चलता रहता है और घंटी बजती रहती है।
मंदिर में 17 विग्रह प्रतिष्ठित हैं। परशुराम की पीतल की मूर्ति अकेले प्रतिष्ठित है। विग्रह पर स्वर्ण छत्र सुशोभित है और गले में चांदी का हार पहनाया गया है । हार में स्वर्ण मोहर के मध्य में हीरा जड़ित है। परशुराम सोने के गुम्बद से सुसज्जित चांदी की पालकी पर विराजमान है। भार्गव परशुराम मनुष्य व पशुओं में रोग निवृति के देव माने जाते हैं। किसी व्यक्ति की आर्त प्रार्थना पर देव दोषी व्यक्ति को रोग के माध्यम से पीड़ा और संताप देते हैं।
जामू में मंदिर के अतिरिक्त परशुराम के डुगाना, मासु और जमदग्नि चोटी पर मंदिर स्थापित हैं। डुगाना में परशुराम मंदिर में तीन प्रस्तर व दो विग्रह पीतल के स्थापित हैं। मासु मंदिर में प्रस्तर की मूर्ति को रेणुका से अनिष्टकारी शक्तियों से रक्षा के लिये लाया गया है।
परशुराम पुजारी के माध्यम से देवावेश में अपने आदेश का अनुपालन कराते हैं।
परशुराम क्रोधीस्वभाव के देव हैं। क्रोधावेश में वे दरिद्रता और रोग का प्रकोप पैदा कर देते हैं। वे ऐसी स्थिति में पशुओं में संक्रामक रोगों को पैदा कर देते हैं। प्रसन्न होने पर सम्पन्नता और सफलता का आशीष देते हैं। परशुराम की पूजा के लिये चांदी अथवा पीतल का घड़ा चश्में से बिना शरीर की छांव पड़े भरा जाता है। पूजानुष्ठान घी का दीया प्रज्जवलित कर शंख ध्वनि के संसर्ग सहित बेल की पत्तियों सहित सम्पन्न होता है।
भार्गव परशुराम भारतीय संस्कृति के उन्नायक रहे हैं जिनके सैंन्धव-सरस्वती नदी घाटी से लेकर पश्चिमी हिमालय तक आर्य संस्कृति के प्रसार व अभिवर्द्धन के चिन्ह अनेकानेक स्थानों पर मिलते हैं।
रेणुका में भार्गव परशुराम अपनी माता व लोगों से मिलने के लिये कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की देव उठनी एकादशी को आते हैं।
माता-पुत्र के दिव्य मिलन से जुड़ा सुप्रसिद्ध रेणुका मेला: रेणुका मेले का आरम्भ युगों से चला आ रहा है। माता- पुत्र के दिव्य मिलन के इस मेले के आरम्भ के विषय में लोकमान्यता प्रचलित है। लोकमान्यता के अनुसार जब कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने कामधेनु गाय को छल से जमदग्नि ऋषि से प्राप्त करना चाहा तो दोनों में भीषण युद्ध हुआ। कामधेनु गाय सहस्रार्जुन के सैनिकों का विनाश कर अपने धाम स्वर्ग चली गई। कामधेनु के खो जाने की निराशा में सहस्रार्जुन ने ऋषि का वध कर दिया। तदोपरान्त वह पतिव्रता की प्रतिमूर्ति रेणुका के अपहरण का दुस्साहस करने लगा। अपने सतीत्व की रक्षा के लिये रेणुका रामकुण्ड में कूद पड़ी। रेणुका ने कुण्ड में जीवन न्यौछावर करने से पूर्व पुत्र परशुराम को सहायता के लिये स्मरण किया। संकल्प के अनुसार मां की आर्त पुकार से बद्रिकाश्रम में तपस्यालीन परशुराम का ध्यान टूट गया। अत: तत्क्षण पिता के आश्रम में आकर सहस्रबाहु का वध कर डाला और मां को जीवित ही रामकुण्ड से बाहर निकाला।
परशुराम जब वापस अपने धाम जाने लगे तो माता ने आग्रह किया कि वह कभी अपनी मां और लोगों से मिलने यहां आया करे। इस पर भार्गव परशुराम ने वचन दिया कि वे कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी को यहां आयेंगे और द्वादशी को वापस बद्रिकाश्रम लौट जायेंगे। अत: मां को दिए बचन के अनुसार भार्गव परशुराम प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास में देव उठनी एकादशी को मां से मिलने यहां आते हैं। इस मां-पुत्र के मिलन के उपलक्ष में मेले का आयोजन होता है।
रेणुका मेले के आयोजन के विषय में एक अन्य लोकाख्यान भी प्रचलित है। गिरिगंगा क्षेत्र से जाने के बाद भार्गव परशुराम अपने परम भक्त केदार भेरों की प्रार्थना पर द्रवित हो उठे। केदार भेरों की प्रार्थना थी कि वे अधिकत्तर समय उनके सामने रहे। अत: भक्त के आग्रह पर परशुराम कई वर्षों तक महेन्द्र पर्वत पर रहे और अपने माता-पिता के दर्शनार्थ नहीं आ सके। दीर्घावधि तक जब परशुराम रेणुका नहीं आए तो पुत्र से मिलने की उत्कण्ठा में माता रेणुका ने पुत्र का स्मरण किया। माता द्वारा स्मरण करने पर वे तुरन्त गिरि गंगा तट पर पहुंच गये। रेणुका ने पुत्र से कहा,पुत्र! “हमने तुम्हे भगवान विष्णु से प्राप्त किया है। भगवान विष्णु भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी को शंखासुर का वध कर क्षीर सागर में शयन करते हैं। विष्णु के क्षीर सागर में चार मास के लिये योग निन्द्रा में शयन के साथ ही सभी देवगण भी निस्तेज हो जाते हैं। इन चार महीनों की अवधि में किसी भी तरह के मंगल कार्य निषेध होते हैं। विष्णु कार्तिक मास की देव उठनी एकादशी को क्षीर सागर की चतुर्मासीय योगनिन्द्रा से जागते हैं। उनके जागने के साथ ही देवों का तेज लौट आता है। अत: तुमसे आग्रह है कि तुम कार्तिक मास की दशमी तिथि को यहां आना। चूंकि तुम विष्णु के अवतार हो। अत: देवउठनी (देवप्रबोधनी) एकादशी को तुम्हारे तेज से देव जगत व लोकजगत आलोकित होगा। माता के आग्रह को मानकर भार्गव परशुराम हर वर्ष देवउठनी एकादशी में यहां आकर अपने संकल्प को पूर्ण करते हैं। देव उठनी एकादशी के पावन पर्व को सिरमौर में “देवठन” कहा जाता है जो देवउठनी का ही अपभ्रंश है। इस वैदिक घटना की परिणति से ही रेणुका मेले का आयोजन युगों से होता चला आ रहा है।
कार्तिक मास की दशमी के दिन रेणुका से 9 किमी दूर जामू में परशुराम के मंदिर से परशुराम भगवान के विग्रह को चांदी की पालकी में सुशोभित कर पुजारियों द्वारा लाया जाता है। जामू से परशुराम की पालकी को सर्वप्रथम गिरि नदी तट पर लाया जाता है। यहीं से देवता की शोभायात्रा का आरम्भ होता है। शोभायात्रा में पालकी से आगे पताकाएं और चांदी की गदाएं सुशोभित होती हैं। परशुराम की पालकी के पीछे ढोल-नगाड़ों, करनाल, रणसिंगों व दुमानु आदि वाद्ययंत्रों के स्वर से वातावरण देवमय हो जाता है। इस दिन देवी- देवताओं के 11 विग्रहों को मेले में सुशोभित कर लाया जाता है। परशुराम के चार विग्रह पालकी में सुशोभित होकर रेणुका तहसील के जामू, कटाह और पांवटा तहसील के डुगाना मंदिरों से मेले में पहुंचते हैं। शिरगुल देव के तीन विग्रह पालकी में आरूढ़ होकर रेणुका तहसील के मनाल देवा, पच्छाद तहसील के शाया और नाहन तहसील के जैतक से मेले में शामिल होते हैं। देवों के अतिरिक्त नाहन तहसील के बिरला से ला देवी, मनारिया से मनार देवी और रेणुका तहसील के भैला से नैना देवी मेले में आतीं हैं। इसके अतिरिक्त रेणुका तहसील के मोहर कोटला से गौ देव और रेणुका तहसील के काण्डो उंगर की वराहरूपी देवी पालकियों में सुसज्जित होकर मेले में सम्मिलित होती है। अत: मेले में सम्मिलित सभी देव गणों में परशुराम के आगमन का विशेष महत्व रहता है। गिरि नदी से आरम्भ हुई शोभा यात्रा अन्य देवों सहित ढोल,नगाड़े,करनाल व रणसिंगों की ध्वनि और ठोडा नृत्य करते हुए नर्तकों के चिताकर्षक नृत्य के साथ सांय परशुराम मंदिर पहुंचतीं हैं। रेणुका पहुंचने पर परशुराम का झील में स्नान होता है जो पुत्र द्वारा अपनी माता के चरण स्पर्श का अनुष्ठान है। माता के चरणस्पर्श के बाद परशुराम मंदिर में रात्रि विश्राम के लिये विराजित होते हैं। अगामी दिवस देवउठनी एकादशी को झील में पवित्र स्नान कर लोग पुण्य अर्जित करते हैं। इस दिन खिचड़ी खाना शुभ माना जाता है। लोग मंदिर में विराजित माता रेणुका व परशुराम से आशीष ग्रहण करते हैं।
रेणुका मेला पूर्णिमा तक चलता रहता है। यहां झील में पूर्णिमा के दिन स्नान के लिये भारी भीड़ जुट जाती है।
देवउठनी एकादशी के दिन रात्रि में लगभग चार बजे परशुराम के पुजारी में देव का आरोहण होता है और लोग परशुराम से अपने दुख-दैन्य का निवारण ढूंढते हैं। प्रात: पुन: परशुराम के विग्रह का माता रेणुका का प्रतिरूप झील में स्नान होता है।
रेणुका मेले में अनेकानेक व्यापारिक गतिविधियां चलतीं है। स्थानीय लोग खरीफ की फसलों के उत्पाद मेले में बेचते हैं और जीवनोपयोगी वस्तुओं की खरीददारी करते हैं। धार्मिक व सांस्कृतिक रेणुका मेले का महत्व देवउठनी एकादशी पुण्य दिवस पर माता व पुत्र के दिव्य मिलन से विशिष्ट रूप से जुड़ा है। भारतीय धार्मिक परम्परा में देवउठनी एकादशी को श्रीविष्णु क्षीरसागर में चतुर्मासीय योग निन्द्रा प्रवास के बाद धरती पर अवतरित होते हैं और परिणामस्वरूप सभी देवगणों का तेज लौट आता है। देवउठनी एकादशी से देवाराधन देवठन का आयोजन गिरि घाटी क्षेत्र में हर्षोल्लास से होता है। वस्तुत: सिरमौर जनपद के गिरि पार क्षेत्र में अवस्थित रेणुका तीर्थ वैदिक परम्पराओं की जीवंत भूमि रही है। इस पावनस्थल पर ही आर्य संस्कृति के नायक भृगु वंशज जमदग्नि ऋषि और परशुराम ने आश्रम स्थापित कर सांस्कृतिक चेतना का आरम्भ किया था। नि:संदेह सिरमौर के गिरि नदी घाटी में स्थित रेणुका तीर्थ हिमालयीय संस्कृति की विशिष्टता को जीवित रखे हुए हुए।

संदर्भ ग्रंथ

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