डॉ. कमल के.प्यासा – मण्डी
शिमला से मिलने वाले अभिलेखों के पश्चात अब इसके साथ लगने वाले सोलन जिले के अभिलेखों की खोज बीन को चलते हैँl सोलन जिले में भी अन्य जिलों की तरह कई एक छोटी छोटी रियासते हुवा करती थींl जिन पर राणों, ठाकुरों व राजाओं का दबदबा रहता थाl सोलन का यह समस्त क्षेत्र राजा बघाट के ही नियंत्रण का क्षेत्र हुआ करता थाl आज सोलन,जो कि मशरुम सिटी के नाम से प्रसिद्ध है, का नाम सोलन यहाँ की रक्षक माता रानी, “शूलनी “देवी के नाम पर पड़ा बताया जाता हैl उस समय बघाट ही इस क्षेत्र की राजधानी हुआ करती थीl और यह सोलन, क्षेत्र के क्रान्तिकारीयों का गढ़ हुआ करता थाl यहीं से राजाओं और राणों के अत्याचारों के प्रति आवाज़े बुलंद होती थींl यहीं से 1855 ईस्वी में डायर मेकिंन नामक सोलन ब्रुअरी का काम भी शुरू हुआ था l
गोरखों पर विजय पाने के उपरान्त अंग्रेज़ों ने 1857 ईस्वी सोलन को छावनी में बदल दिया थाl फिर 1902 ईस्वी में कालका शिमला रेल के आ जाने से सोलन की रौनक ऒर भी बढ़ गई थीl स्वतंत्रता के पश्चात ही सोलन के दरबारहाल में बघाट के राजा दूनी चंद की अध्य्क्षता में एक बैठक का आयोजन किया गया था, जिसमें प्रदेश के लिए हिमाचल का नाम सुझाया गया थाl हिमाचल बन जाने के पश्चात 1 सितम्बर, 1972 को महासू और शिमला ज़िलों के नरकंडा, अर्की व नालागढ़ को मिला कर सोलन को एक जिला बना दिया गया l
आज सोलन अपने औद्योगिक संस्थानों के लिए नालागढ़ बद्दी, राष्ट्रीय शोध संस्थान कसौली व करोल पहाड़ी गुफा, पुराना किला, शलूनी देवी व जाटौली शिव मंदिर के लिए अपनी विशेष पहचान रखता हैl वहीं अपनी पुरानी संस्कृति कला व इतिहास के लिए अर्की क्षेत्र के मंदिर, महल व कला कृतियाँ अपना प्रत्यक्ष प्रमाण लिए आज भी सबको आकर्षित करती हैँ l
- हिंडूर किला अभिलेख (उपलब्ध नहीं)
नालागढ़ के हिंडूर किले का अभिलेख उपलब्ध न होने के कारण केवल यहाँ इस किले की ऐतिहासिक जानकारी ही दी जा रही है, क्योंकि ये तथ्य शिलालेख के ही हो सकते हैँl हिंडूर किले का निर्माण चंदेल राजाओं द्वारा करवाया गया थाl जिसमें चंदेल राजा विक्रम चंद का विशेष योगदान रहा है उसने इस किले को 1421 ईस्वी को बनवाया थाl उस समय चंदेलों की यह राजधानी हुआ करती थीl मुग़ल शैली का यह पाँच मंज़िला किला आज हेरिटेज़ रेस्टोरेंट के रूप में देखा जा सकता हैl 1618 ईस्वी में ,इसी किले में राजा संसार चंद द्वारा दीवाने खास जोड़ दिया गया थाl ऐतेहासिक स्रोतों के अंतर्गत सोलन के अर्की से प्राप्त आहात सिक्कों के साथ साथ महलों की वस्तुकला व अर्की कलम के चित्र भी विशेष महत्व रखते हैँl
2.राजा सभा चंद ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : धातु पट्ट अभिलेख।
अभिलेख काल : 17वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : टांकरी, बोली भगाटी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : अर्की, सोलन।
अभिलेख विवरण : 17वीं शताब्दी के टांकरी लिपि के राजा सभा चंद के इस ताम्र पट्ट अभिलेख से उस समय राजा द्वारा किए गए दान पुण्य कार्यों के साथ भागल को राजधानी बनाना,1643 ईस्वी में अर्की में नगर बसा कर महल का निर्माण करवाना, कला को प्रोत्साहित करने के लिए, अर्की कलम की कई एक कृतियों का निर्माण करवाने की जानकारी भी इसी ताम्र पट्ट अभिलेख से मिलती है।
3.राजा बिक्रम चंद ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : ताम्र धातु पट्ट अभिलेख।
अभिलेख काल : 15वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : टांकरी ।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : नालागढ़, सोलन।
अभिलेख विवरण : नालागढ़ के राजा बिक्रम चंद (1421-1435ईस्वी) के टांकरी लिपि के ताम्र पट्ट अभिलेख से मंदिरों और ब्राह्मणों को दी गई भूमि दान के अतिरिक्त, अन्य धार्मिक, प्रशासनिक कार्यों के साथ राज्य सीमा विस्तार व वंशावली की जानकारी भी मिलती है। 1421ईस्वी में ही बिलासपुर के कहलूर क्षेत्र को छोड़ कर नालागढ़ को अपनी नई राजधानी बना कर किले का निर्माण भी करवाया था।



