इंसानियत का इंसानियत से सवाल है
आज फिर उठीं कई आवाज़ है
चेहरे बदले किरदार बदले लेकिन
घटनाओं का वही अंदाज है…
आज फिर से उठा इंसानियत पे सवाल है
आखिर ये कैसा समाज है जहाँ इस कदर एक होनहार
बेटी ने गवाई अपनी जान है
पर इंसाफ का ना कोई नामोनिशा है
प्यार से समेटा था मजबूत इरादों से सेचा था
आज उस माँ की आँखों में आंसुओ का सैलाब है
आज फिर उठा इंसानियत पे सवाल है
आखिर ये कैसा समाज है
पिता का ये सवाल है बेटी की तड़पती रूह का
आखिर क्या इन्साफ है
क्या उसे वापस सलामत लोटा सकता, कोई इंसान है
आज फिर उठा इंसानियत पे सवाल है…
एक और निर्भया बनी आखिर ये कैसा समाज है
आज हज़ारों नज़रों में बदलाव की मांग है
आख़िर ये बेटियों की सुरक्षा की बात है
सड़को पर उतरी कई उम्मीद भरी आस है
आख़िर उस तड़पती रूह का क्या इन्साफ है
क्या फ़ासी इस बात का जवाब है कि
दोहराया नहीं जाएगा ये किस्सा इस समाज
में एक और बार है
वक़्त है यह एकजुट होने का क्योंकि ये
किसी एक का नहीं हज़ारो का सवाल है
आज फिर उठा इंसानियत पे सवाल है
आखिर ये कैसा समाज है।




