मेरी पहली साइकिल और छात्रों का विरोध: पारुल अरोड़ा

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मेरी पहली साइकिल और छात्रों का विरोध: पारुल अरोड़ा
पारुल अरोड़ा

इस विजयादशमी पर मैंने आनलाईन अपने लिए गियर वाली साइकिल मंगवाई। साइकिल बड़ी गत्ते की पेटी मे सुरक्षित मेरे घर तक कम्पनी ने पहुंचा दी थी। आज इंटरनेट के उपयोग से विदेश से कुछ भी घर पर बैठे क्रय किया जा सकता है। सुई से लेकर हेलीकॉप्टर तक मात्र एक क्लिक में। माता जी को साईकिल बताई तो उन्होंने मेरी पहली साईकिल से जुड़ी घटना को मेरे पुछने पर विस्तार से बताया। बात 1990 की थी। उस समय मैं पांच छः वर्ष का था। मण्डी हमें अपने घर पर भारतीय डाक विभाग की चिट्ठी डाकियें द्वारा प्राप्त हुई। उन दिनों संचार का एक मात्र साधन यही था।

चिट्ठीयां और पोस्टकार्ड से हमारे देश की रक्षा करने वालें सैनिकों और परिवारों से लेकर सामान्य जन भी अपनी बात सगे संबंधियों, परिचितों, मित्रों तक पहुचाते थे। विवाह समारोह की सुचना भी इनके द्वारा प्राप्त होती थी। विवाह से महिना महिना पहले ही चिट्ठीयां द्वारा न्यूंद्रा दूर दूर अपनो को भेजा जाता था। विवाह के कार्डों का आज जैसा प्रचलन नहीं था। टेलीफोन भी गिने चुने घरों में ही होता था। हमारे यहां नानको के घर या जहां नानके रह रहे हो वहां स्वयंम जा कर विवाह का निमंत्रण दिया जाता था। मेरे सगे संबंधि पंजाब मे बहुत हंै। मेरे मूल नानके जिला लायलपुर (पाकिस्तान) मे थे। दुर्गियाना मंदिर अमृतसर मे नाना जी और उनके परिवार को विभजन के बाद सर्व प्रथम मिली थी। दादके विभाजन के बाद अजनाला पिंठ गांव मे बस गए थे। हमारी कुल देवी माँ हिंगलाज भवानी (बलोच्चस्थान) मे है। उन दिनों टीवी चैनलों मे ही था। रामायण, महाभारत, चाणक्य, सप्ताह में दो बार चित्रहार देखने को मिलता। छोटा था तो कार्टून देखना बहुत पसंद करता था।

उन दिनों मोगली और डकटेलस मैं बड़े चाव से देखता था। मोगली रविवार को सुबह दूरदर्शन पर प्रसारित होता था। नबे के दशक की एक घटना अच्छे से याद है। शनिवार का दिन था मेरे पिता जी अपनी दूकान से रात को करीब आठ नौ बजे के आस पास घर वापसी आ रहे थे। तो घर के निचे की गलि मे मेरे पिता जी से नोटो से भरा बैेग छिन कर एक व्यक्ति भाग गया था। बैेग मे लग भग पचास-ंसाठ हजार रुपए थे। रात मे ही पुलिस मे रिपोर्ट करवाई थी। तो पुलिसवालों ने पिता जी से पुछा था। क्या आपको सारे नोटो का नम्बर पता है। आज तो डिजीटल पेमेंट का युग है। मेरे पिता जी की सेरी बाजार मे बहुत बड़ी दुकान थी। अरोड़ा करयाना स्टोर के नाम से। बाद मे जब घंटा घर मार्केट बनी तो वहां दूकाने मिली। अगले दिन रविवार का दिन था। मैं टीवी वाले कमरे मे गया पिता जी वहां बैठे थे। मेहनत की कमाई खो दी थी पिता जी ने जो कभी नहीं मिली।

मैंने पिता जी से कहा मोगली देख लूं मैं टीवी पर। उन्होंने कहा देख लें। मैंने टीवी ओंन किया और टीवी देखने बैठ गया। कराऊन कम्पनी का कलर्ड टीवी था हमारे पास उन दिनों। चिट्ठी से पता चला की अमृतसर मे मेरे मासी जी के बेटी या बेटे का विवाह था। हम तीनों को अमृतसर जाना था। उन दिनों बसें आज की तरह नहीं चलती थी। बहुत कम आज तो मण्डी से आस पड़ोस के राज्यों में बसों से कभी भी पहुंचा जा सकता है दिन भर याता यात के विभिन्न प्रकार के साधन उपलब्ध है। हिमाचल पथ परिवहन निगम की बसों मे यात्रा करने का तो मु-हजये बचपन से ही बहुत अनुभव है। विवाह के बाद हमने अमृतसर के बाजारों से -सजयेर सारा सामान खरिदा। वहां के बाजार और वहां मिलने वाली वस्तुओं का दाम और गुणवत्ता अच्छी रहती थी। इस बार माता पिता जी ने मेरे लिए एक छोटी निले रंग की साइकिल भी क्रय की।

अगले दिन हम अमृतसर से पठानकोट के लिए बस मे सारे सामान और मेरी छोटी साइकिल के साथ बैठे और दोपहर मे पठानकोट पहुंचे। वहां आकर पता चाला की मंडल आयोग द्वारा स्थान स्थान पर उग्र प्रदर्शन किए जा रहा है। हिमाचल के लिए कोई बसें नहीं जा रही हैं, आगे कर्फ्यू लगा हैं। अब हम वहां फंस गए थे। इंटरनेट मोबाइल तो उस समय थे नहीं, आज दे-रु39या दुनिया मे क्या हो रहा है, पल भर मे पता चल जाता है। वहां जम्मू जाने के लिए बस खड़ी थी। जम्मू मे मेरे मासी जी के घर जाने की योजना बनी। जम्मू पहुंचने के दो दिन बाद वहां भी कर्फ्यू लग गया । इतने दिनों से हमारी दुकान बंद थी। परिवार को चिंता थी कैसे मण्डी पहुंचेगंे में भी छोटा था। ऊपर से -सजयेर सारे सामान के साथ मेरी साइकिल भी तो थी।

लगभग चार पांच दिन वहां बितने के बाद मासी जी के एक पड़ोसी सरदार जी ने बताया की सुबह सुबह तड़के जम्मू बस स्टैंड से पठानकोट के लिए बस जाती है। अगली सुबह ही वो सरदार जी और मेरे मासड़ जी हमें अपने स्कूटरों पर हमारे सारे सामान के साथ बस अड्डे छोड़ आए। बस अभी जम्मू कश्मीर की सिमा लखनपुर ही पहुंची थी की बस ड्राइवर ने आगे बस ले जाने के लिए मना कर दिया। आगे कहीं उग्र प्रद-रु39र्यान चल रहे थे। किसी भी प्रकार की बड़ी घटना हो सकती थी। कुछ स्थानों पर छात्रों ने आत्म दाह भी कर लिया था। यह सब रुकने का नाम नहीं ले रहा था। हम तीनों सामान के साथ वहीं सड़क पर बैठ गए। थोड़ी देर बाद जम्मू की ओर से एक ट्रक आता दिखा तो मेरे पिता जी ने ट्रक वाले से पठानकोट तक हमे ले जाने के लिए आग्रह किया।

अब हम तीनों ट्रक पर और सारा सामान पिछे ट्रक मे मेरी साइकिल भी हमारे साथ खज्जल हो रही थी। पठानकोट से इस बार हिमाचल के लिए बस मिल गई। अब हमारी सांस मे सांस आइ। बस अभी पालमपुर के आस पास पहुंची थी की यहां भी चालक और परिचालक ने बस आगे मण्डी की ओर ले जाने के लिए मना कर दिया कारण कर्फ्यू और प्रदर्शन ही थे। अब बस की सब सवारियां नजदीक के रेलवे स्टेशन की ओर दोड़ी हमारे पास बहुत सामान था तो दुसरी सवारियों ने भी रेलवे स्टेशन तक हमारा सामान पहुंचाने मे हमारी सहायता की। यहां से जोगिंद्रर नगर तक की यात्रा हमें छोटी और धीरे-ंउचयधीरे चलने वाली लोह पथ गामिनी मे करनी थी। रात होने से पहले हम जोगिंद्रर नगर पहुंचे। बस अड्डे पे पता चला की मण्डी के लिए कोई बस नहीं जा रही है।

यहां भी कर्फ्यू की वजह से रात हमनें एक होटल मे काटी सुबह सुबह एक टैक्सी वाले से बात हुई, वो हमें मण्डी नगर छोड़ने के लिए मान गया। हम तीनों, दो ओर लोग और हमारा सारा सामान, मेरी नन्ही साइकिल भी सूर्य उदये के थोड़े बाद ही मण्डी पहुंच गए। मण्डी पहुंचते ही हमें एक दुखद समाचार प्राप्त हुआ था। हमारे एक पड़ोसी के बेटे को छात्र प्रदर्शन के चलते मण्डी में गोली लगी थी और उनकी दुखद मृत्यु हो गइ थी। कुछ घंटो की यात्रा कैसे दिनों में बदल गइ थी और अब संस्मरण में। आज सड़क पर एक मिनट का भी जाम लग जाए तो लोग अपना धैर्य खो बैठते हैं। हमारे हिमाचल मे कहते हैं कि दूरी हाण्डणी बूरी नी हाण्डणी। मार्ग हमेशा अच्छा चुनना चाहिए भले ही वह लम्बा हो।

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