राम नवमी और नारद का शाप: डॉo कमल केo प्यासा

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डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

पुराणों के अनुसार जहां सृष्टि की रचना की बात होती है तो देव ब्रह्मा जी का नाम सबसे ऊपर ही आता है,फिर देखभाल के लिए भगवान विष्णु व संहार के लिए देव शिव का नाम बताया जाता है।ऐसा भी शस्त्रों में बताया जाता है की जब जब अत्याचार बड़ने लगते हैं,अधर्म में वृद्धि होने लगती है और धर्म का नाश होने लगता है तो तब तब भगवान विष्णु धरती पर अवतरित होते हैं और इस समस्त क्रम को अवतारवाद के अंतर्गत ही रखते हैं। वैसे भगवत गीता के 4 थेअध्याय (के श्लोक के अनुसार भी )में श्री कृष्ण कहते हैं कि जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तो मैं स्वन्य वहां पहुंचता हूं और अधर्म को रोकता हूं,अत्याचार व अत्याचारी को मरता हूं तथा धर्म की रक्षा करता हूं।भगवान कृष्ण भी तो विष्णु के ही अवतार ही तो थे।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार अब तक भगवान विष्णु के 23 अवतार हो चुके हैं और 24 वां जो कि कलिक अवतार हैं अभी होना है। त्रेता युग में जिस समय लंका के शासक ,रावण के अत्याचार चर्म सीमा पर थे तो उस समय भगवान विष्णु 7 वें अवतार (मर्यादा पुरषोत्तम राम) के रूप में अवतरित हुवे थे और देवी लक्ष्मी मां सीता के रूप में आईं थीं।जैसा कि हम जानते ही हैं ,कि हमारी पौराणिक कथाएं कहीं न कहीं किसी शाप या वरदान से जरूर जुड़ी रहती हैं और यहां भी भगवान विष्णु को देव नारद के शाप के फलस्वरूप ही इस अवतार में अवतरित होना पड़ा था।

देव नारद ने भला क्यों कर भगवान विष्णु का शाप दिया था ,इसकी भी अपनी अलग कथा बताई जाती है। नारद मुनि जो कि देव लोक के समाचार एक दूसरे देवता तक पहुंचने के लिए अपनी विशेष पहचान रखते थे और उनका सभी से अच्छा परिचय व व्यवहार रहता था ,एक बार किसी बात पर उनकी कामदेव से आपसी तूं तूं मैं मैं हो गई और देव ऋषि नारद ने उसे बुरी तरह से पछाड़ दिया तथा इसके पश्चात तो ऋषि नारद अपनी वाह वाही में लग गए । इसी संबंध में उन्होंने भगवान विष्णु से भी अपनी प्रशंसा में बहुत कुछ कह डाला जो कि भगवान विष्णु को ठीक नहीं लगा और भगवान ने, नारद मुनि के अभिमान को तोड़ने के लिए माया रच डाली ।

उसी माया के अनुसार ऋषि नारद जी जब देव लोक से लोट रहे थे तो उन्हें रास्ते में एक सुंदर राजकुमारी दिखाई दी,नारद जी तो उसे देख कर चकित हो गए और उससे विवाह करने की सोचने लगे। किसी भी तरह नारद जी उस राजकुमारी से अति शीघ्र विवाह करना चाहते थे ,इस लिए वह भगवान विष्णु जी के पास पहुंच कर उस राजकुमारी को ले कर फरियाद करने लगे कि हे प्रभु मेरा रूप ऐसा बना दो कि राजकुमारी मेरे ही गले में वर माला डाले। इस पर भगवान विष्णु ने केवल इतना ही कहा ,जो तुम्हारे लिए उचित होगा मैं वही कर दूंगा।इसके पश्चात पूरी आशा के साथ ऋषि नारद राजकुमारी के स्वयर में पहुंच गए,जहां उनकी शक्ल देख कर सभी हंसने लगे थे,क्योंकि भगवान विष्णु ने उसके अहंकार और घमंड को तोड़ने के लिए उसकी शक्ल बंदर की तरह बना दी थी।

जब राजकुमारी ने विवाह की जयमाला को भगवान विष्णु के गले में डाल दिया तो ऋषि नारद चकित रह गया और दूसरों को हंसते देख कर उसने जब पात्र में रखे पानी में अपनी शक्ल देखी तो आगबबूला हो भगवान विष्णु को शाप देते हुवे कहने लगा, कि जाओ अब तुम्हें भी बंदरों का साथ मिले गा और जैसे मैं राजकुमारी के लिए तरस गया हूं ,तुम्हें भी अपनी पत्नी का वियोग देखना पड़े गा। इस प्रकार ऋषि नारद के शाप को इस अवतार का कारण कहा जा सकता है। भगवान विष्णु मर्यादा पुरषोत्तम राम के रूप में सरियु नदी के समीप अयोध्या में राजा दशरथ के यहां चैत्र कृष्ण पक्ष की नवमीं तिथि को पैदा हुवे थे। कहते हैं कि राजा दशरथ के कोई संतान नहीं थी ,जिस कारण राजा दशरथ तीन तीन रानियां होने के बाद भी परेशान रहते थे।लेकिन ऋषि वशिष्ठ के प्रमर्श से जब राजा दशरथ ने पुत्रेष्ठि यज्ञ का अनुष्ठान किया तो तीनों रानियों के यहां पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गई ।

सबसे बड़ी रानी कौशल्या के यहां बड़ा बेटा राम,दूसरी रानी केकैयी के भरत व सुमित्रा के लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न का जन्म हुआ था। देखते ही देखते सभी भाई जवान हो गए और राजा दशरथ भी समय के साथ परिपक्व हो चुके थे।अब वह अपने राजपाठ की जिमेवरी अपने ज्येष्ठ पुत्र राम के सपुर्द करके खुद निवृत होना चाहते थे, लेकिन जब केकैयी को इसकी जानकारी मिली तो वह रूठ बैठी और उसने राजा दशरथ को उनके द्वारा दिए गए वचनों को याद दिला कर ,बेटे राम के स्थान पर अपने पुत्र भरत के लिए राजपाठ तथा राम को बनवास भेजने को कह दिया। राजा दशरथ को दिए वचन के अनुसार ही ,उसकी ( केकैये) मांगें माननी पड़ीं और मर्यादा पुरषोत्तम राम को अपने पिता की आज्ञानुसार वनवास जाना पड़ा।

इसी वनवास के दौरान माता सीता को लंका नरेश रावण अपहरण करके ले गया और फिर मर्याद पुरषोत्तम राम दुष्ट रावण का वध करके माता सीता को ले आये और रावण के भाई वभिषण को लंका का राजा बना कर प्रजा को रावण के अत्याचारों से मुक्त कर दिया। इस प्रकार अच्छाई की बुराई पर की इस जीत को, अधर्म की पराजय व धर्म की जीत भी कहा जाता है।

राम नवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रामचरित्र मानस (तुलसी रामायण)का लेखन शुरू किया था और इसे लिखने में तुलसी दास जी को लगभग अढ़ाई वर्ष का समय लग गया था ।इस प्रकार तुलसी कृत रामायण पूर्ण रूप से सवंत 1633 के मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष में(मर्यादा पुरषोत्तम राम जी का विवाह दिवस।)पूर्ण किया गया था। तुलसी कृत इस रामायण में कुल मिला कर 7 काण्ड हैं ,जो कि इस प्रकार से हैं – बाल काण्ड, अयोध्या काण्ड, आरण्य काण्ड, किषिकंधा काण्ड, सुंदर काण्ड, लंका काण्ड व उत्तर काण्ड। राम नवमी के दिन ही व्रत रखा जाता है और भगवान राम की कथा भी की जाती है।इसी दिन देवी मां के पूजन के साथ साथ कन्या पूजन भी किया जाता है।

राम नवमी और नारद का शाप: डॉo कमल केo प्यासा

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