March 27, 2026

‘बेटियाँ’ – रणजोध सिंह की कविता

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जनाना री रोटी (पहाड़ी संस्करण): रणजोध सिंह
रणजोध सिंह

कुछ अच्छे करम करने पड़ते हैं
कुछ काम आती हैं पूर्व जन्म की नेकियाँ|
जब उसकी नज़र-ए- इनायत होती है
तब घर में आती हैं परियों सी बेटियाँ|

कहते हो तुमको नाज़ है अपने बेटों पर
न बघारों यार ये झूठी शेखियाँ|
जब घर के चिराग ही अंधेरों का सबब बनते हैं
तब काम आती हैं यही भोली सी बेटियाँ|

समझे थे जिसे बुढ़ापे की लाठी
खिला दी उसने वृद्धाश्रम की रोटियाँ|
अखंड विश्वास था जिस वंशज पर, गिराकर चला गया
बुढ़ापे की लाठी बनती हैं नाजुक सी बेटियाँ|

जिस की खातिर कोल्हू का बैल बने रहे उम्र भर
वो खेलता रहा जायदाद को गोटियाँ|
कुल वंशज तो बस गया विदेश जाकर
गले लगाती हैं प्यारी सी बेटियाँ|

Daily News Bulletin

Nurturing Creativity – Keekli Charitable Trust, Shimla

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