भगवान जगन्नाथ जी की पुरी यात्रा

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डॉ. कमल के. प्यासा –  मण्डी 

वैसे तो सभी पूज्य देवी-देवताओं की अपनी-अपनी शोभा यात्राएं निकलती ही हैं, लेकिन यह रथ वाली परंपरा इधर भारत, नेपाल, श्रीलंका व बांग्लादेश में ही देखी गई है। भारत में भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का चलन पूर्व के राज्य उड़ीसा के पुरी में व पश्चिम-दक्षिण के राज्य गुजरात के अहमदाबाद में देखा गया है।

उत्तर में हिमाचल में केवल जिला कुल्लू में ही लकड़ी के विशाल रथ, भगवान राम की रथ यात्रा के लिए, दशहरे के अवसर पर (भारी शोभा यात्रा के रूप में) देखने को मिल जाते हैं। शेष हिमाचल प्रदेश में देवी-देवताओं को अपने रथों में यात्रा करते हुए लगभग सभी जिलों में देखा जा सकता है, लेकिन इनके रथ विशाल लकड़ी के पहियों वाले न होकर एक लकड़ी की पालकी के रूप में होते हैं, जिन्हें कंधों पर उठाया जाता है। कंधों पर उठाए जाने वाले इन रथों में सभी पौराणिक देवी-देवता, लोक देवी-देवता व ऋषि-मुनि आदि आ जाते हैं। ये समस्त देवी-देवता केवल सोने, चांदी व अष्ट धातु के बने मुखौटों (मोहरों) के रूप में ही होते हैं।

पुरी के भगवान जगन्नाथ जी, बलराम जी व सुभद्रा जी के लकड़ी से बने मुखौटों की रथ यात्रा के संबंध में कई पौराणिक कथाएं हैं, जिनसे रथ यात्रा के संबंध में बहुत-सी जानकारियां प्राप्त होती हैं। कथा (भागवत पुराण) के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने अपने बड़े भाई बलराम और छोटी बहन सुभद्रा को अक्षय तृतीया के दिन नगर भ्रमण के रूप में रथ यात्रा करवाई थी, जिसके लिए उन्होंने विश्वकर्मा से तीन सुंदर रथों का निर्माण रथ यात्रा के लिए करवाया था। तभी से यह पुरी की रथ यात्रा शुरू मानी जाती है।

एक अन्य पौराणिक कथा, जो भगवान श्री कृष्ण के मामा कंस से जुड़ी है, के अनुसार कंस ने भगवान श्री कृष्ण को अपनी योजनानुसार मारने के लिए अपने एक दरबारी अक्रूर को रथ के साथ गोकुल से (कृष्ण व उनके बड़े भाई बलराम को) मथुरा लाने भेजा था। फिर उसी रथ में बैठकर दोनों भाई मथुरा के लिए चल पड़े थे। तभी गोकुलवासियों ने उस रथ के प्रस्थान को रथ यात्रा का नाम दिया था।

उड़ीसा में पुरी की यह वार्षिक रथ यात्रा, जो कि हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया से शुरू होकर आषाढ़ शुक्ल की दशमी को समाप्त होती है, विश्व प्रसिद्ध है और इसमें देश-विदेश के हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। तभी तो इस रथ यात्रा के रथों की तैयारी (निर्माण) अप्रैल महीने के अक्षय तृतीया वाले दिन से ही शुरू कर दी जाती है। क्योंकि रथ यात्रा में तीनों भाई-बहन शामिल थे, इसलिए चली आ रही परंपरा के अनुसार तीन ही विशालकाय रथों का निर्माण किया जाता है। बनाए जाने वाले रथों की जानकारी इस प्रकार से है:

1. भगवान जगन्नाथ रथ:
इसे नंदी घोष के नाम से जाना जाता है। इसमें कुल मिलाकर 16 पहिए होते हैं। इस रथ की ऊंचाई 45 फुट व लंबाई 34 फुट होती है। रथ के सारथी दारुक व रक्षक को गरुड़ कहा जाता है। रथ को खींचने वाले रस्से को शंखचूड़ नागनी कहते हैं। रथ की पताका को त्रैलोक्य मोहिनी के नाम से जाना जाता है।

इसी रथ में अलग-अलग नामों के चार घोड़े भी होते हैं, जिन्हें शंख, बहालक, सुवेल व हरिदसव के नामों से जाना जाता है। भगवान जगन्नाथ के साथ अन्य जो देवता इसी रथ में शामिल होते हैं, उनमें वराह, गोवर्धन, गोपीकृष्ण, नृसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान व रुद्र, कुल नौ देवता साथ रहते हैं। भगवान श्री जगन्नाथ जी के इस रथ को श्रद्धा, परंपरा व आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्वितीय प्रतीक माना जाता है।

2. दूसरा रथ:
यह भगवान जगन्नाथ जी की छोटी बहन सुभद्रा जी का होता है, जिसे देवदलन या दर्पदलन के नाम से जाना जाता है। इस रथ की लंबाई 31 फुट और ऊंचाई 43 फुट रहती है। इसमें 12 पहिए होते हैं। इस रथ के सारथी अर्जुन और रथ की रक्षक देवी माता दुर्गा होती हैं।

रथ के रस्से को स्वर्णचूड़ नागनी और पताका को नांदविका कहा जाता है। इस रथ के चार घोड़ों के नाम रुचिका, मौचिका, जीत व अपराजिता बताए जाते हैं। सुभद्रा जी के इस रथ को शक्ति, सौम्यता और विजय का प्रतीक माना जाता है।

3. बलराम जी का रथ:
बलराम जी के रथ को तालध्वज रथ के नाम से जाना जाता है। इनका अति मजबूत रथ 14 पहियों वाला होता है, जिसकी ऊंचाई 44 फुट व लंबाई 33 फुट होती है। इसका सारथी मातली व रक्षक वासुदेव को बताया जाता है।

इस रथ के रस्से को वासुकी नाग के नाम से जाना जाता है और पताका को उन्नानी कहते हैं। इस रथ के चार घोड़ों के नाम तीव्र, घोर, दीर्घाश्रम व स्वर्णनाभ बताए गए हैं। बलराम जी का यह रथ शक्ति, धैर्य व नेतृत्व का प्रतीक बताया जाता है।

इन तीनों रथों में जंगल से लाई गई नीम व नारियल की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। रथों का निर्माण व अन्य सभी कार्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी काम करने वाले कारीगर, बढ़ई, पेंटर, दर्जी व भोई (मजदूर/सेवादार) ही करते हैं।

भगवान जगन्नाथ जी से संबंधित तीनों रथ आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भारी श्रद्धालुओं के जनसमूह व दूर-दूर से आए पर्यटकों के साथ जगन्नाथ मंदिर से 3 किलोमीटर दूर गुंडीचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं, जिधर भगवान जगन्नाथ जी का जन्म हुआ था और वहीं इनकी मौसी का घर भी बताया जाता है।

रथों के प्रस्थान से पूर्व पुरी के राजा या राजपरिवार के लोगों द्वारा “छेरा पंहारा” की रस्म की जाती है, जिसमें सोने के झाड़ू से आगे के रास्ते की सफाई की जाती है और मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। इसके बाद यह रथ यात्रा शुरू हो जाती है।

आषाढ़ शुक्ल की दशमी को रथ यात्रा समाप्त हो जाती है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया से शुरू होकर यह यात्रा दस दिन तक चलती है। फिर ग्यारहवें दिन त्योहार रूपी यह रथ यात्रा वापस अपने गंतव्य स्थान (जगन्नाथ मंदिर) पहुंच जाती है। वापसी की इस रथ यात्रा को “बाहुड़ा” कहा जाता है।

मौसी के गुंडीचा मंदिर में यात्रा के दिनों में दिन में 7 बार भगवान जगन्नाथ जी को भोग लगाया जाता है। इन्हीं 7 दिनों के प्रवास के मध्य ही श्रद्धालुओं व सभी दर्शकों द्वारा भगवान जगन्नाथ जी, बलराम जी व सुभद्रा जी के खुले रूप में दर्शन, पूजा-पाठ, नवग्रहों की आराधना व भजन-कीर्तन आदि किया जाता है। इस रथ यात्रा में भाग लेने से 100 यज्ञों का पुण्य प्राप्त होने के साथ मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

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