अभी सांय की सैर के लिए निकला ही था, सोचा फल आदि खत्म हैं, चलो पहले यही देख लेता हूं। सुबह नाती के टीफन के लिए भी तो कुछ नहीं। इधर दिन में हुई बारिश के कारण वीं .आई. पी. रोड पानी से भरी पड़ी थी। इधर उधर नजर दौड़ाई तो सामने सड़क के दूरी ओर केवल मात्र फल वाले की एक ही रेहड़ी दिखाई दी। सुबह के लिए फल लेने भी जरूरी थे, लेकिन सड़क के दूसरी ओर जाना भी तो आफत थी। खैर साउथ सिटी की तरफ कुछ पानी कम देख कर उधर से हो लिया।
पानी इकट्ठा होने के कारण दूसरा कोई फल सब्जी वाला नहीं था। एक ही रेहड़ी, फल भी कोई खास नहीं थे पर दाम जरूर मनमाने थे। मैं टोकरी ले कर उसमें देख देख कर सेब डालने लगा और रेहड़ी वाले को एक दर्जन सख्त व साफ साफ केले डालने के लिए कह दिया। उसने जल्दी से एक ओर से केले उठाए और उन्हें थैली में डाल कर जल्दी से गांठ लगा दी। मैंने भी उसे टोकरी में डाले सेब तोलने को दे दिए। उसने उनमें से एक दो सेब निकाले और फिर अपने हाथ से एक दूसरा सेब डाल कर जल्दी से थैली को गांठ लगा दी।
पैसे देने के पश्चात मैं दोनों थैलियों के साथ घर पहुंचा और उन्हें नाती को देते हुए कहा, “लो भई तुम्हारे सुबह के टीफन के लिए।” नाती ने खुशी खुशी से सेब की थैली खोली और एक सेब को निकाल कर मुझे दिखाते हुए कहने लगा, “नाना जी ये तो खराब ले आए आप!” सच ही वह गला हुआ सेब था। मैंने जल्दी से दूसरी केले वाली थैली उठाई और उसको खोल कर देखा तो उसमें भी एक खराब केला था। अब मेरी समझ में आ गया कि वह क्यों जल्दी से थैली को गांठ लगा रहा था। मैंने उस पर विश्वास करते हुए कहा था, “भईया, जरा सख्त व साफ साफ केले डालना मैं सेब डालता हूं।”
इतना कहने के बावजूद भी, ये लोग अपनी आदत से बाज नहीं आते, एक आध तो जरूर खराब डाल ही देते हैं! अक्सर हर बार यही सोचता हूं कि अगली बार जब भी सब्जी या फल लूंगा तो देख कर थैली में डलवाउंगा। लेकिन हर बार विश्वास की आड मार जाती है और ये लोग अपनी आदत से बाज नहीं आते। अंदर से कोई फल खराब निकलता है वो तो माना, अंदर कोई नहीं घुसा होता। लेकिन जब सब कुछ जान बुझ कर, अपनी बचत के लिए दूसरों को बेवकूफ बनाया जाता है, वह गलत है।