एहसास – लघु कथा – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – पंजाब

उस दिन राणा जी कुछ पहले ही सैर के लिए निकल गए थे। तभी मैं भी जल्दी से तैयार हो कर निकल पड़ा। सोचा कहाँ जाएंगे, बैठे होगें पार्क के बेंच पर।.नहीं तो सोसायटी के चक्कर में तो मिल ही जाएंगे। लिफ्ट से उतर कर मैं सीधा पार्क की ओर हो लिया।

उधर बेंच के समीप ही 4-5 महिलाएं खड़ी थीं, वहीं (बेंच पर ) मुझे राणा जी का जाना पहचाना चेहरा नजर आ गया। मैं दूर से ही उन्हें इशारा करता हुआ सीधा, उन्हीं की ओर चल दिया। साथ में सोचे जा रहा था कि आज राणा जी इन महिलाओं के बीच में कैसे? फिर बेंच पर बैठी उस महिला का ध्यान आते ही सोच लिया, शायद आज राणा जी पत्नी के साथ आए हैं सैर करने।

मैं पार्क में प्रवेश करते ही, उनकी तरफ बढ़ते हुए अभी पहुंचा ही था, कि मीनाक्षी मिठाई के डिब्बे को पकड़े हुए मेरे आगे आकर मुस्कुराते हुए कहने लगी, “लो मिठाई खाओ, मेरे मम्मी पापा अभी अंबाला से आए हैं, वही लाए हैं।”

मैंने झेंपते हुए थोड़ा सा टुकड़ा उठा लिया और समझ गया बेंच पर बैठी महिला मीनाक्षी की मम्मी है व पास बैठे राणा जी नहीं बल्कि उसके पापा हैं। मैं तो जितनी उत्सुकता के साथ राणा जी को देख (समझ) कर आया था अब लज्जा कर पानी पानी हो गया था और शर्माते हुए कहने लगा, “ओह मैं तो ममता के पापा राणा जी समझ कर आया था ।” अपने आप को ठगा सा महसूस किया व अपनी व्यस्तता जताते हुए तुरंत मीनाक्षी की मम्मी पापा को नमस्ते करके पार्क से निकल गया।

राणा जी कहीं भी दिखाई नहीं दिए। मैं अकेले ही सोसायटी का चक्कर लगाने लगा लेकिन अंतर मन की सोच मुझे बेचैन किए जा रही थी!

“अरे मैं भी कितना मूर्ख हूं, रोज साथ घूमते हैं और फिर भी बंदे को नहीं पहचान पाया, न जाने इस नजर को भी क्या हो गया है? इतना तो सोच लेता, महिलाओं के बीच अकेले राणा जी कैसे हो सकते हैं। चलो सुबह बच्चों को छोड़ती बार मीनाक्षी को साफ साफ बता दूंगा कि क्यों कल उसकी मम्मी पापा के पास कुछ देर नहीं बैठ पाया।”

इन्हीं विचारों में खोए मुझे पता ही नहीं चला कि कब मैं घर पहुंच गया। रात को भी देर तक विचारों में उलझा, आगे से आगे सोचता रहा। चलो, दूर से तो इस उम्र में पहचानने में माना गलती हो जाती है, लेकिन क्या मति भी मारी जाती है क्या? दो चार मिनट बैठ कर उसके मम्मी पापा से बात भी तो की जा सकती थी! चलो कोई बात नहीं, सुबह जब बच्चों को बस में चढ़ाने जाते हैं तो सारी बात स्पष्ट कर दूंगा, किसी को बुरा नहीं लगेगा!” इन्हीं विचारों में खोए न जाने कबआंख लग गई।

अगले दिन नाती का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वह स्कूल नहीं गया, फिर रविवार की छुट्टी आ गई। लेकिन मैं अपने व्यवहार के प्रति अभी भी शर्मिंदगी अनुभव कर रहा था। आखिर सोमवार बच्चों को गाड़ी में छोड़ने के पश्चात, वापसी में मैंने राणा जी व मीनाक्षी से अपनी इस समस्त घटना का स्पष्टीकरण दिया तो मीनाक्षी कहने लगी, “अंकल जी हो जाता कई बार, मुझे तो ऐनक में भी कई बार स्पष्ट दिखाई नहीं देता और तब बड़ा गुस्सा आने लगता है।”

राणा जी कहने लगे, “ओह भाई मुझे देखो मैं तो ऐनक के लगे होने पर देखता हूं मेरी ऐनक कहां है!” तभी मैंने राहत की सांस ली, क्योंकि अब दिल का बोझ हल्का हो गया था और अपनी नादानी का पछतावा भी छू मंत्र हो चुका था।

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बदनाम पानी – डॉ. कमल के. प्यासा

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