एकह पहचान – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – मंडी

कुण हा, हाऊं….?
केथी हा…. किहाँ हा….?
फेर भी तुसा से  परोखे हा हाऊं….,!…..
पर मुंझों किछ थोग पता नी…..!
मेरी पक्की परख,
हाडकुआ रे कोठरु मँझ बंद :
एकह जियूँदा हांडदा
 फिरी रा,
धूड़ फाकदा माणू,…..!
भटकदा इथखा उथखा
तेथी, जेथीं
माणू, माणू जो नी जाणदा.
मेरे हाथा ले लहू रिसदा लगी रा
मेरे पैरे न करी दिति री
मुंझों परैसे मँझ भी
नैहरा दुस्दा लगी रा
भुखा ने पेटा री लार टपकदी लगी री….
हाऊं सब किछ भुली बिसरी गई रा,
मेरी रूह मुंझो कोतदी लगी री,,,,,
फेर भी हाऊं जियूँदा हा..
पर न जाणे की होर केस कठे….?
मेरा जिस्म इंहां लुहाखदा लगी रा
ठीक तीयां ही,
जिहां जे हाऊं जम्मेया था,
ऐहड़ा लगहा जे, से मुंझों साददा लगी रा…..
पर हाऊं हज़ि तांई,
पुरी तरह ने तेस दस्सा जो नी पुजी रा,
तेबे ही त हाऊं
हिउंदा री ठंडा ने कम्बदा रहाँ
हौर तौदिया रे तापा ने
झूलसी ने झूलसी जाहाँ……!

Daily News Bulletin

Nurturing Creativity – Keekli Charitable Trust, Shimla

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