January 9, 2026

गीता जयंती व मोक्षदा एकादशी – डॉ. कमल के. प्यासा

Date:

Share post:

डॉ. कमल के. प्यासा – जीरकपुर, मोहाली

महाभारत युद्ध कौरव पांडवों के मध्य कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़ा गया था। इस युद्ध के पीछे हस्तिनापुर का सिंहासन मुख्य कारण था। फिर दुर्योधन का अहंकार व द्रौपदी का चीर हरण, जैसे कई और कारण भी थे।

युद्ध शुरू होने से पूर्व पांडव पुत्र अर्जुन ने जब युद्ध क्षेत्र में अपने निकट संबंधियों को देख तो वह विचलित हो गया और उसने युद्ध करने से इनकार कर दिया। इस पर विष्णु अवतार कृष्ण ,जो कि अर्जुन के रथ के सारथी के साथ ही साथ अच्छे मित्र व चचेरे भाई के रिश्ते के साथ कई अन्य संबंध भी रखते थे, वे उस समय आगे आ कर अर्जुन को समझने लगे। भगवान कृष्ण द्वारा दिया ज्ञान व शिक्षा ही गीता ज्ञान कहलाता है। इसी गीता ज्ञान को कृष्ण द्वारा अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में गीता जयंती के इस दिन मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष के ग्यारहवें दिन एकादशी वाले दिन दिया था। इस ज्ञान के अंतर्गत कृष्ण ने अर्जुन को मोक्ष (जन्म मरण से मुक्ति), धर्म अधर्म, भक्ति व योग जैसे सभी सिद्धांतों की जानकारी विस्तार से दे कर उसे युद्ध के लिए राजी कर लिया था। कृष्ण के द्वारा, ज्ञान में विज्ञान, धर्म, जीवन का मार्ग, भक्ति, त्याग, अंतकरण की शुद्धि, सांसारिक मामलों में उचित निर्णय लेने की कला और ऐसी ही अनेकों आध्यात्मिक बातें बताईं थीं। उन्होंने अर्जुन से यह भी स्पष्ट किया था कि युद्ध या लड़ाई की सफलता के लिए शारीरिक क्षमता, युद्ध कौशल व सामरिक योग्यता ही महत्वपूर्ण नहीं होतीं बल्कि आंतरिक संयम, आध्यात्मिक ज्ञान, निस्वार्थ भाव, समता व निष्काम कर्म भी जरूरी होता है। साथ ही उन्होंने अर्जुन को आत्मा के ज्ञान व विश्व के 5 भूत तत्वों, कर्तव्य के प्रति निष्ठावान व उच्चतम मार्ग पर चलने के लिए भी कहा था।

गीता में भगवान कृष्णा द्वारा 7 महा पापों से भी दूर रहने की भी सलाह दी गई है और उनके द्वारा बताए गए 7 महापाप हैं:_

1.अभिमान, 2.लोभ, 3.काम (वासना), 4.ईर्षा, 5.लोलुपता, 6.क्रोध व 7.आलस्य।

महा पापों के अतिरिक्त ही गीता में 18 ज्ञान की बातें कही गई हैं जो कि निम्नलिखित हैं:_

1.कर्म:के संबंध में संस्कृत के इस श्लोक से बात स्पष्ट हो जाती है,:

“कर्मण्येषाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

अर्थात कर्म करना ही तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं। अर्थात फल की इच्छा रखे बिना कर्म करते रहो। यही सबसे बड़ा संदेश है।

  1. आत्मा अमर है : आत्मा किसी की भी क्यों न हो, ये न मरती है न जलती है और न ही गलती सड़ती है। ये अजर अमर है।

3.परिवर्तन : परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है। विज्ञान भी यही कहता है। जो कुछ है, सब ठीक है, उसे स्वीकार करो।

4.क्रोध से बचे : क्योंकि क्रोध करने से कई तरह के भ्रम पैदा हो जाते हैं, जिससे बुद्धि का नाश होता है और गलतियों पर गलतियां होती जाती हैं।

5.मन बुद्धि पर नियंत्रण : मन पर नियंत्रण होना अति आवश्यक है, तभी हम अपनी समस्त इंद्रियों पर भी नियंत्रण कर सकते हैं। यदि इंद्रियों व मन पर नियंत्रण नहीं रहेगा तो कई प्रकार की परेशानियां और विकार पनप उठेंगे ।

6.आत्म विश्वास और पहचान : आत्म विश्वास होने पर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। क्योंकि सोच और विचारों का भी अपना सतीत्व होता है।

7.मोह माया त्याग : यदि हमारी इच्छाओं की पूर्ति नहीं होती, तो वह हमारे दुखों का कारण बन जाता है। इसलिए मोह माया का त्याग सबसे बेहतर है।

8.कर्तव्य पथ पर अटल रहें : सच्चा व्यक्ति हमेशा अपनी बात का पक्का, समय पर अपने काम को निभाता है और सब का विश्वासपात्र होता है।

9.आत्म निर्भरता : निर्भरता इंसान को पंगु कर देती है और उसकी कमजोरी (निर्भरता) का दूसरे लाभ उठाने लगते हैं। इसलिए आत्मनिर्भर रहना ही उचित है।

10.मन पर नियंत्रण : उस परमपिता परमात्मा पर विश्वास रखे, वही सब कुछ करता है और उसकी इच्छा के विपरीत तो एक पत्ता भी नहीं हिल पाता।

11.सत्संग का महत्व : क्योंकि ईश्वर ही सर्वव्यापक है, उसके अनुसार ही सब कुछ चल रहा है। वही संयम व सदाचार सिखाता है, इसलिए उसके बारे जानना जरूरी हो जाता है।

12.सुख दुख को छुपाना : अपनी परिस्थितियों की जानकारी किसी को न दें। क्योंकि यदि आप किसी को अपने दुख दर्द बताते हैं तो, वह चाहे बाहरी तौर पर कुछ सहानुभूति प्रकट कर दे, लेकिन समय आने पर वही व्यक्ति आपकी कमजोरी का फायदा उठाने का प्रयास करेगा, आप का मज़ाक बनाएगा। इसी प्रकार यदि आप अपनी किसी खुशी को किसी को बताते हो तो, बाहरी तौर पर वह जैसा भी दिखे, लेकिन अंदर से उसे आपकी खुशी से जलन होगी। आज कोई भी दूसरे को खुश नहीं देख सकता। इसलिए आप अपने तक ही सीमित रहे, यही उचित है।

13.अधिकार व शक्ति : जैसा बीजा जाता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है और यह सब बीजने वाले पर ही निर्भर करता है। इसलिए जैसे जैसे कर्म करेंगे, उसी अनुसार फल भी वैसे प्राप्त होगें।

14.पवित्र जीवन : घर में पति पत्नी के संबंध यदि मधुर या पवित्र रहते हैं तो वहां परमपिता परमात्मा निवास करते हैं व पुत्र रूप में आते भी हैं।

15.सदाचार का पालन : मांस मछली सेवन, नशा शराब, जुआ, हिंसा, व्यभिचार, असत्य बोलना, मद आसक्ति और निर्दयता आदि सभी बुरी आदतें हैं। इनसे बचना चाहिए।

16.अधिकारिता : हमेशा अच्छे कर्म करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना भी जरूरी होता है।

17.संघर्ष से सीखें : जीवन में हार जीत तो चलती रहती हैं। लेकिन सफल इंसान वहीं होता है, जो गलतियों को दोहराता नहीं बल्कि उनसे सीख कर आगे बढ़ता है।

18.सकारात्मक सोच : हमेशा इंसान को दूर की सोचनी चाहिए, न कि अपनी स्वार्थ सिद्धि की जाए।

गीता में ही 7 महा पापों की भी व्याख्या की गई है, जो इस प्रकार से हैं :- 1.काम, 2.क्रोध, 3 लोभ, 4.अभिमान, 5.लोलुपता, 6.ईर्षा व 7.आलस्य।

भगवान कृष्ण ने ज्ञान में विज्ञान, धर्म, जीवन का मार्ग, भक्ति, त्याग, अंतकरण की शुद्धि, सांसारिक मामलों में ठीक निर्णय लेने की कला और कई दूसरी बातें भी बताई थीं।

गीता जयंती के इस दिन पड़ने वाली एकादशी को मोक्षदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन किए जाने वाले व्रत में, सबसे पहले स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु व भगवान कृष्ण की आराधना की जाती है, भोग में तुलसी भी लगाई जाती है और तुलसी के आगे, सायंकाल को घी का दिया जला कर 7 फेरे लिए जाते हैं। इसी दिन गीता के पाठ के साथ गीता के श्लोकों का जाप व भजन कीर्तन किया जाता है। इन सभी बातों के साथ ही साथ यह भी ध्यान रखा जाता है कि मन शांत रहे और किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार न आएं। साकारात्मक कार्यों व विचारों के साथ जीवन में संतुलन बनाए रखने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। तामसिक भोजन का त्याग करना चाहिए। बिना स्नान के किसी भी प्रकार का पूजा पाठ न करें। इस दिन न ही तुलसी को तोड़ा जाए और न ही तुलसी को जल दिया जाए।

इस तरह भगवान कृष्ण द्वारा गीता का संदेश मात्र हिन्दू समाज के लिए ही नहीं, बल्कि ये तो एक समस्त मानवजाति के लिए एकता व भाईचारे का संदेश है, जिसे आज समस्त विश्व अपना रहा है। क्योंकि गीता संदेश में जो जो बातें कही गई हैं, उनमें विज्ञान है, सच्चाई है और मानवता की भलाई है। क्या आत्मा का अजर अमर होना गलत है? क्या परिवर्तन प्रकृति का नियम नहीं है? क्या कर्म का सिद्धांत जैसा बीजोगे वैसा पाओगे, अर्थात क्रिया प्रति क्रिया समान व बराबर होती हैं (न्यूटन गति का नियम), सदाचार का पालन, मोह माया का त्याग, मन नियंत्रण, आत्म निर्भर बने व क्रोध न करें आदि सब गलत है क्या? इस तरह आज के दिन गीता जयंती का मनना मानवता व विश्व एकता के संदेश को जन जन तक पहुंचना ही तो है।

महान बलिदानी धर्म रक्षक गुरु तेग बहादुर साहिब – डॉ. कमल के. प्यासा

Daily News Bulletin

Keekli Bureau
Keekli Bureau
Dear Reader, we are dedicated to delivering unbiased, in-depth journalism that seeks the truth and amplifies voices often left unheard. To continue our mission, we need your support. Every contribution, no matter the amount, helps sustain our research, reporting and the impact we strive to make. Join us in safeguarding the integrity and transparency of independent journalism. Your support fosters a free press, diverse viewpoints and an informed democracy. Thank you for supporting independent journalism.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Related articles

Government to Provide Pucca Houses to 27,715 Poorest Families, Says Chief Minister

Chief Minister Thakur Sukhvinder Singh Sukhu on Tuesday announced that the state government would ensure pucca houses...

Collective Effort Essential for a Progressive and Drug-Free Himachal: Governor

Governor Shiv Pratap Shukla on Tuesday called for united and sustained efforts to build a progressive and...

From Loom to Connectivity: Him MSME Fest 2026 Sets New Direction for Himachal’s Weavers

The successful organization of Him MSME Fest 2026 at the historic Ridge Ground has emerged as more than...

Senior Residency Policy to Be Framed for Medical Colleges, Says Chief Minister

Chief Minister Thakur Sukhvinder Singh Sukhu on Tuesday announced that the state government would formulate a comprehensive...