महान बलिदानी धर्म रक्षक गुरु तेग बहादुर साहिब – डॉ. कमल के. प्यासा

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मुगलों के शासन काल में आततायी शासक औरंगजेब ने जहां हिन्दू मंदिरों की तोड़ फोड़ की, वहीं उस क्रूर व निर्दयी ने भारतीय संस्कृति और धर्म को भी नहीं बक्शा और जबरन धर्म परिवर्तन की आड़ में न जाने कितने ही निर्दोष हिंदुओं के सिर कलम करवा दिए थे। हिंसक प्रवृति के इसी शासक ने सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर साहिब को भी सारे आम खत्म कर दिया था।

गुरु तेग बहादुर का जन्म पंजाब के अमृतसर में, प्रथम अप्रैल, 1621को कृष्ण पंचमी के दिन, सोढ़ी खत्री परिवार की माता नानकी व पिता हरगोबिंद (छठे गुरु), जी के यहां गुरु घर में हुआ था। इनका बचपन का नाम त्याग मल था और ये पांच भाई बहिन थे। बहिन का नाम वीरां व भाईयों में बाबा गुरदित्ता, सूरज मल, अनी राय, अटल राय व त्याग मल थे।

गुरु तेग बहादुर जी, त्याग मल से तेग बहादुर कैसे बने? इस संबंध में बताया जाता है कि एक बार मुगलों के विरुद्ध करतारपुर के युद्ध में (मुगलों के दांत खट्टे करने में) त्याग मल का विशेष योगदान रहा था और उसी योगदान को देखते हुए ही, इन्हें त्याग मल से तेग बहादुर कहा जाने लगा था। वर्ष 1633 ईस्वी में इनकी शादी बीबी गुजरी से करा दी गई थी।

अध्यात्म और जन सेवा में विश्वास रखने वाले गुरु तेग बहादुर जी, जनकल्याण व धर्म प्रचार के लिए आनंद पुर साहिब से कीरतपुर, रोपड़, सैफाबाद, बेखियाला(खदल) से दमदमा होते हुए कुरुक्षेत्र जा पहुंचे थे। फिर प्रयाग, वाराणसी, पटना से होते हुए असम तक जा पहुंचे। वहां आध्यात्मिक ज्ञान के साथ ही साथ लोगों को सामाजिक, आर्थिक और जीवन यापन के साथ रूढ़ियों व अंधविश्वासों से दूरी बनाए रखने को भी कहा। प्रजा हित व प्राणी सेवा में गुरु जी द्वारा कई स्थानों पर कुएं खुदवाए गए, धर्मशालाओं का निर्माण व लोगों के आने जाने के लिए कई एक रास्तों को भी बनवाया। गुरु जी जब असम यात्रा पर थे तो उस समय 1666 ईस्वी में, पटना में पुत्र गोविंद सिंह का जन्म हुआ था। जो कि दसवें या अंतिम सिख गुरु कहलाते हैं।

जिस समय (कश्मीर में) औरंगजेब ने अपनी धर्म परिवर्तन की नीति को बढ़ावा देते हुए, कश्मीरी पंडितों को जबरन मुसलमान बनने संदेश दिल्ली से भेजा तो कुछ कश्मीरी पंडित, आनंदपुर में गुरु तेग बहादुर जी के पास सहायता व सहयोग के लिए पहुंच गए। गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों को आश्वासन दे कर वापिस कश्मीर भेज दिया और कह दिया,

“मैं खुद दिल्ली पहुंच कर बादशाह औरंगजेब से बात करता हूं, तुम चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा।”

कश्मीरी पंडितों से हुई उसी आश्वासन की बात को, बाद में औरंगजेब के गुप्तचरों ने, गुप्त ख़बर के रूप में औरंगजेब तक पहुंचा दिया। परिणाम स्वरूप गुरु तेग बहादुर को दिल्ली पहुंचने से पूर्व ही, रास्ते में गिरफ्तार कर लिया गया। और उन्हें बंदी बना कर औरंगजेब के समक्ष पेश किया गया तथा फिर उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए कहा जाने लगा। लेकिन गुरु जी ने कहा,

” मैं सिर कटवा सकता हूं, पर केस नहीं।”

गुरु तेग बहादुर का उत्तर सुन कर औरंगजेब बौखला उठा और उसने काजी को फतवा पढ़ने को कह दिया। काजी के फतवा पढ़ने के पश्चात ही, जलालदीन जल्लाद ने उसी समय गुरु तेग बहादुर जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। इतना सब कुछ हो जाने पर भी गुरु जी के मुख से उफ तक नहीं निकली थी। यह दुखद घटना दिल्ली के चांदनी चौक के शीश गंज में 11नवंबर, 1675 को हुई बताई जाती है।

दर्द भरी इस घटना के पश्चात गुरु जी की पार्थिव देह का अंतिम दाह संस्कार रकाब गंज में किया गया और उनके शीश को आनंद पुर में दफनाया दिया गया। इस समस्त घटना के पश्चात लोगों में भारी आक्रोश पैदा हो गया था, क्योंकि गुरु जी का बलिदान, निर्भय आचरण, धार्मिक अडिगता व नैतिक उदारता, सबके लिए भारी मिसाल बन चुकी थी ,दूसरे औरंगजेब के अत्याचार भी दिन प्रतिदिन बढ़ते ही चले जा रहे थे। परिणाम स्वरूप, अंत में तंग आ कर गुरु गोविंद सिंह को मुगलों के विरुद्ध खड़ा होना पड़ा। सबसे पहले गुरु गोविंद सिंह ने कुछ पहाड़ी राजाओं को अपने साथ मिला कर, उन्हें मुगलों के खिलाफ खड़ा किया और 1687 ईस्वी में अलिफ खान को पहाड़ी राजाओं की सहायता से बुरी तरह से परास्त भी किया। 13 अप्रैल 1699 ईस्वी को दल खालसा की स्थापना करके गुरु गोविंद सिंह ने अपनी शक्ति को ओर भी मजबूत कर लिया और पिता तेग बहादुर की दुखद मृत्यु का बदला मुगलों से समय समय पर लेता रहा।

गुरु तेग बहादुर मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने से भी नहीं झिझके और हंसते हंसते सब कुछ झेल गए। इसी लिए उन्हें हिंद की चादर (भारत की ढाल) के नाम से भी जाना जाता है। गुरु जी जात पात, ऊंच नीच, छुआ छूत व छोटे बड़े आदि सभी भेदों से दूर ही रहते थे। उनकी दृष्टि में भेद भाव तो लेश मात्र भी नहीं था। वह एक अच्छे विद्वान, साहित्यकार, सिद्धांतवादी व निडर योद्धा भी थे। उनके द्वारा लिखित 116भजन, 57 श्लोक व 15 रागों में लिखी गुरुवाणी आज भी गुरु ग्रंथ साहिब में पढ़ी जाती है। गुरु जी की याद में 21 – 22 अप्रैल 2022 को 400 वां प्रकाश वर्ष मनाया गया था, जिसमें गुरु जी की याद करते हुए, भारत सरकार द्वारा गुरु जी का सिक्का व टिकट भी जारी किया गया, जो कि हम सब के लिए गर्व की बात है।

अंत में उस गुरु, महान दार्शनिक, क्रांतिकारी व बलिदानी योद्धा को हम सभी देश वासियों की ओर से शत शत नमन।

गुरुपर्व पर विशेष : महान दार्शनिक संत गुरु नानक देव जी – डॉ. कमल के. प्यासा

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