हिमाचल : पाषाण अभिलेख, संदर्भ बिलासपुर – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – जीरकपुर (मोहाली)

हिमाचल प्रदेश का बिलासपुर भी, यहां की अन्य पहाड़ी रियासतों की तरह ही, (पंजाब के पहाड़ी क्षेत्र की) एक रियासत हुआ करती थी।

इस पहाड़ी क्षेत्र में, सातवीं शताब्दी अर्थात 697 ईस्वी में, मध्य प्रदेश के चंदेल वंशी राजपूत राजा बीर चंद ने, कहलूर नामक राज्य की स्थापना करके यहां की सुनहाणी नामक स्थान को अपनी राजधानी बनाया था। इस पहाड़ी क्षेत्र में भी पहले राणों व ठाकुरों की छोटी छोटी ठकुराईयां हुआ करती थी,जिन्हें हरा कर राजा बीर चंद ने अपना राज्य स्थापित किया था। बाद में 1650 ईस्वी को राजा दीप चंद द्वारा सतलुज नदी के समीप व्यास गुफा के पास बिलासपुर नामक नगर बसा कर उसे अपनी राजधानी बना लिया था। कुछ वर्षों बाद 1814-15 ईस्वी में गोरखों ने बिलासपुर पर आक्रमण करके इसे जीत लिया था। लेकिन अंग्रेजों ने गोरखों को खदेड़ कर बिलासपुर को अपने नियंत्रण में कर लिया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब 15 अगस्त, 1948 को हिमाचल का गठन किया गया और सभी पहाड़ी रियासतें भारत गणराज्य का हिस्सा बन गई तो उस समय बिलासपुर के राजा इसके लिए सहमत नहीं हुए, बहुत सी आना कानी के बाद, प्रथम जुलाई, 1954 को आखिर बिलासपुर भी भारत गणराज्य का हिस्सा बन गया और इसे भी हिमाचल प्रदेश का एक जिला बना दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात विकासात्मक कार्यों के अंतर्गत भाखड़ा डैम के निर्माण (1960) से बिलासपुर शहर सतलुज झील के रूप में बदल गया और फिर ऊपर की ओर नया बिलासपुर नगर बसाया गया। इस तरह पुराने बिलासपुर के सभी मंदिर भी सतलुज झील के पानी में डूब गए, फलस्वरूप मंदिरों के बहुत से शिलालेख इत्यादि भी मंदिरों के साथ पानी में ही डूब गए। कुछ शिलालेख अभी भी राज्य संग्रहालय शिमला में संरक्षित हैं, जिनका ब्यौरा निम्न दिया गया है। वैसे बिलासपुर का क्षेत्र भी अपने प्रागैतिहासिक काल का होने कारण, प्रदेश में अपना विशेष स्थान रखता है।

1.रंगनाथ मंदिर अभिलेख।

अभिलेख श्रेणी : पाषाण।

अभिलेख प्रकार : शिलालेख।

अभिलेख काल : 8वीं- 9वीं शताब्दी।

अभिलेख लिपि : शारदा, भाषा संस्कृत।

अभिलेख प्राप्ति स्थान : रंगनाथ मंदिर, पुराना बिलासपुर (गोविंद सागर झील)।

अभिलेख विवरण: रंगनाथ (प्रतिहार शिखर शैली) के इस प्राचीन मंदिर को अब पुराने बिलासपुर की झील में देखा जा सकता है। 8वीं -9 वीं शताब्दी के रंग नाथ मंदिर का यह अभीलेख, जो कि शारदा लिपि में उकेरा हुआ है को राज्य संग्रहालय शिमला में देखा जा सकता है। अभिलेख में मंदिर निर्माण निर्माणकर्ता की जानकारी के साथ साथ कुछ स्थानीय लोगों के नाम भी मिलते हैं, जिन्होंने मंदिर निर्माण में आर्थिक सहयोग दिया था।

2.खानेश्वर महादेव मंदिर अभिलेख।

अभिलेख श्रेणी : पाषाण।

अभिलेख प्रकार : शिलालेख।

अभिलेख काल : 17वीं -18वीं शताब्दी।

अभिलेख लिपि : टांकरी, बोली कहलूरी।

अभिलेख प्राप्ति स्थान: शिखर शैली का प्राचीन खानेश्वर महादेव मंदिर (17वीं -1 8वीं शताब्दी) को अब पुराने बिलासपुर की गोविंदसागर झील में देखा जा सकता है। इसका अभिलेख, जो कि टांकरी लिपि व कहलूरी बोली के साथ पत्थर की शिला पर उकेरा हुआ है को, राज्य संग्रहालय शिमला में देखा जा सकता है। इस अभिलेख से भी मंदिर निर्माण, निर्माण काल व उस समय के शासक की जानकारी मिलती है।

3.नंदेश्वर महादेव मंदिर अभिलेख।

अभिलेख श्रेणी : पाषाण।

अभिलेख प्रकार : शिलालेख।

अभिलेख काल : 11वीं -12वीं शताब्दी।

अभिलेख लिपि : सिद्ध मात्रिका।

अभिलेख प्राप्ति स्थान:पुराना बिलासपुर,गोविंदसागर झील।

अभिलेख विवरण : शिखर शैली का नंदेश्वर महादेव मंदिर जो कि पुराने बिलासपुर की गोविंद सागर झील में पानी के अंदर हैं, का शिलालेख जो कि 11वीं -12वीं का बताया जाता है और इसकी लिपि सिद्ध मात्रिका बताई गई है। शिलालेख की अभी पूर्ण जानकारी नहीं मिल पाई। मालूम नहीं कि यह अभिलेख वाला शिलालेख राज्य संग्रहालय शिमला में है भी कि नहीं।

कुछ भी कहा जाए लेकिन हिमाचल के बिलासपुर में कुछ अपनी ही विशेषताएं हैं, जिनमें शामिल हैं, यहां से प्राप्त प्रागैतिहासिक पाषाण युगीन औजार, जीवाश्म, एशुलियन काल के उपकरण(1.5 मिलियन से 1.5 लाख साल पुराने औजार), भाखड़ा बांध, गोविंद सागर झील, मछली पालन केंद्र, नैना देवी मंदिर, हैज़ो जल क्रीड़ाएं (वाटर स्कीइंग व नौकायन) आदि आदि।

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