डॉ.कमल के.प्यासा- जीरकपुर, मोहाली
राती रे
घुप्प नैहारे मंझ,
एक जियूंदी तड़पदी लाश…
आपू अपणे ले डरी-डरी री,
आपू-आपू ले सरमाई री,
काम्बदी लगी तौंधिया मंझ!
रौंदे-सिसकदे बालक,
भितर ही भितर घुटदी माओ,
बिल्हे नैहारे काल-कोठरुआ री
ढल्ही री कांधा हेठ
होर टपकदे छप्परा हेठ!
पींदे लगी रे,
पींदे ही रेहणा इन्हें—
दुःख, दर्द होर पीड़ा रे प्रकोप!
एस विडंबना रे…
सिमटदे लगी रे एक-दूजे ने,
सिसकदे-डुसकदे
किस्मता रे मारे यौँह बचारे,
वारिस-लावारिस!
जाणा हे यौँह सब किछ,
पर जीभ खोलदे नि,
किछ बोलदे नि!
कि के कटी गई रे किछ ध्याड़े,
किछ ईहां ही कटी ने कटी जाणे!
नैहारे हटी जाणे
आपू ही एकी ध्याड़े,
जेस ध्याड़े
विडंबना जो प्यारे हुई जाणे
यौँह किसमता रे मारे!



