लाहौल स्पीति की तरह ही किन्नौर भी हिमाचल का एक जिला है, जहाँ पर कि हिन्दू और बौद्ध दोनों संस्कृतियाँ फूलती फलती दिखती हैँ l क्योंकि इसका हिंदुस्तान तिब्बत मार्ग पर होने व तिब्बत सीमा पर होना बहुत महत्व रखता है, इसी लिए यहाँ की सांस्कृतिक गतिविधियां आदि तिब्बत से मिलती जुलती देखी जा सकती हैँ l प्राचीन काल में तिब्बत के साथ समस्त व्यपार इसी रास्ते से ही होता था l
किन्नौर को किन्नर देश व किंपुरुष देश के नाम से भी जाना जाता थाl इस क्षेत्र में भी, पहले छोटे छोटे राणे व ठाकुरों का दबदबा रहता था l स्वतंत्रता से पूर्व किन्नौर रामपुर बुशहर रियासत का ही हिस्सा हुआ करता था l स्वतंत्रता के पश्चात 15 अप्रैल, 1948 को रामपुर बुशहर रियासत भी हिमाचल प्रदेश का हिस्सा बन गई, तो किन्नौर को महासू ज़िले मे डाल दिया गया l फिर प्रथम मई, 1960 इसे स्वतंत्र जिला बना दिया गयाl यहाँ के प्रसिद्ध त्योहारों में लोसर त्योहार को नव वर्ष पर्व के रूप से बड़ी ही धूम धाम के साथ मनाया जाता है l एक दूसरा फुल्याच त्योहार है, इन दोनों त्योहारों को हिन्दू व बौद्ध आपस में मिलजुल कर मनाते हैँl मंदिरों व मठों के प्रति दोनों संम्प्रदायों में पूरी आस्था देखी गई है l और इन सभी का अपना प्राचीन इतिहास व महत्व हैं l किन्नौर क्षेत्र, जो कि अपने ऐतिहासिक व प्राचीन मंदिर मठों से जुड़ी पौराणिक कथाओं व अभिलेखों के लिए जाना जाता है l चलिए कुछ उन्हीं (अभिलेखों) के बारे जान लेते हैँ l यहाँ से मिलने वाले अभिलेखों की लिपि तिब्बती (भोटी), खरोष्ठी, ब्राह्मी, शारदा, टांकारी व देवनागरी देखी गई हैl अभिलेख गोंपाओं, मंदिरों, स्तूपों व शिलाओं पर देखे गए हैँ l जिनसे दान पुण्य, तिब्बत से आपसी संबंधों व सांस्कृतिक आदान प्रदान के बारे पता चलता हैl सिलसिले वार अभिलेखों की जानकारी निम्मन है :
1.सांगला कामरू किला अभिलेख l
अभिलेख श्रेणी : पाषाण l
अभिलेख प्रकार : पाषाण स्तम्भ अभिलेख l
अभिलेख काल : 15 वीं शताब्दी l
अभिलेख लिपि : शारदा, भाषा संस्कृत l
अभिलेख प्राप्ति स्थान : कामरू किला, गांव कामरू, सांगला l
अभिलेख विवरण : किन्नौर का प्राचीन कामरू किला, सांगला घाटी से लगभग 2 किलो मीटर आगे कामरू गांव में स्थित है l पाँच मंज़िला यह किला देवदार की लकड़ी व पत्थरों से बना है जिसमें आसाम से लाई देवी कामाक्षा की प्रतिमा स्थापित है l यह किला कभी रामपुर बुशहर की राजधानी हुआ करता थाl इसका प्राचीन स्तम्भ अभिलेख, जो कि शारदा लिपि का 15 वीं शताब्दी का है ( कहीं इस अभिलेख को ब्राह्मी लिपि का भी बताया है), को मुख्य द्वार के पाषाण स्तम्भ पर उकेरा देखा गया हैl अभिलेख से बुशहर रियासत के राजाओं के विजय अभियानों, निर्माण कार्यों, देवी देवताओं की स्थापना, धार्मिक -सामाजिक गतिविधियों, तांत्रिक कार्यों व लोक कथाओं सम्बन्धी जानकारी मिलती है l
2.अभिलेख बौद्ध मठ नाको l
अभिलेख श्रेणी : पाषाण l
अभिलेख प्रकार : पाषाण चट्टान व शिलालेख l
अभिलेख काल : 11 वीं शताब्दी l
अभिलेख लिपि : तिब्बती (भोटी), शारदा संस्कृत भाषा के साथ l
अभिलेख प्राप्ति स्थान : भारत तिब्बत सीमा के निकट बसा नाको गांवl अभिलेख प्राप्ति स्थान : किन्नौर का गांव नाको अपने प्राचीन मठ व नाको झील के लिए अति प्रसिद्ध हैl मठ नाको की स्थापना 11 वीं शताब्दी में रिचेन जांगपो द्वारा की गई थी l मठ से सम्बंधित अभिलेख (हगरांग गांव के) मठ परिसर की चट्टानों पर उकेरे हुए हैँl इन अभिलेखों में ऐतिहासिक, धार्मिक और आध्यात्मिक विचारों के साथ साथ लद्दाख व नगारी (खोरसुम) संबंधों की भी जानकारी मिलती है और साथ में कुछ मानव आकृतियां भी उकेरी देखी गई हैँl नाको झील के निकट मिलने वाली शिलाओं पर *ॐ मणि पदमे हूँ *व अन्य मंत्र लिखे देखे गए हैँ l
- पवारी अभिलेख l
अभिलेख श्रेणी : पाषाण l
अभिलेख प्रकार : पाषाण चट्टान अभिलेख l
अभिलेख काल : 3री -4 थी ई.पूर्व -7 वीं शताब्दी l
अभिलेख लिपि : ब्राह्मी, तिब्बती व टांकारी l
अभिलेख प्राप्ति स्थान : पवारी गांव, किन्नौर l
अभिलेख विवरण : रिकांग पीओ से 7-8 किलो मीटर की दूरी पर बसा किन्नौर का गांव पवारी अपनी प्रसिद्ध ऐतिहासिक धरोहर के लिए विशेष रूप से जाना जाता है l यहाँ से मिलने वाले ब्राह्मी, तिब्बती व टांकारी लिपि के चट्टान अभिलेखों से उस समय की प्राचीन ऐतिहासिक जानकारियां प्राप्त होती हैँl उस समय के शासकों के वंश, उनके युद्ध अभियानों, विजयों, व्यापारिक -सांस्कृतिक संबंधों, धार्मिक कार्यों, मंदिर निर्माण व बौद्ध धर्म के प्रचार सम्बंधित सभी जानकारियां प्राप्त होती हैँ
4.कड़च्छम अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी :पाषाण l
अभिलेख प्रकार : पाषाण चट्टान अभिलेख l
अभिलेख काल : 8 वीं – 12 वीं शताब्दी l
अभिलेख लिपि : तिब्बती (भोटी), टांकारी, भाषा किन्नौरी l
अभिलेख प्राप्ति स्थान : कड़च्छम, किन्नौर l
अभिलेख विवरण : कड़च्छम, सतलुज व वास्पा नदी के संगम समीप ही, चट्टानों पर तिब्बती (भोटी) व टांकारी लिपि के साथ, किन्नौरी बोली के अभिलेख देखे जा सकते हैँ l इन चट्टान अभिलेखों से मंदिरों के लिए दान की गई भूमि, राजाओं की प्रशासन व्यवस्था, राज्य सीमा, धार्मिक मन्त्र “ॐ मणि पदमे हूँ”, धर्म चक्र व दान करने वालों की जानकारी मिलती है l
5.रकच्छम अभिलेख l
अभिलेख श्रेणी : पाषाण l
अभिलेख प्रकार : पाषाण चट्टान अभिलेख l
अभिलेख काल : 7 वीं – 10 वीं शताब्दी l
अभिलेख लिपि : तिब्बती (भोटी) व टांकारी l
अभिलेख प्राप्ति स्थान : रकच्छम गांव, सांगला l
अभिलेख विवरण : किन्नौर में सांगला गांव के, चट्टानी क्षेत्र में कुछ चट्टानों पर प्राचीन तिब्बती व टांकारी लिपि के अभिलेख देखे गए हैँ, जिनसे क्षेत्र के शासकों व उनकी शासन व्यवस्था, धार्मिक गतिविधियों, मंदिरों के लिए दान देने वालों दानी व्यक्तियों आदि की जानकारी के साथ साथ अभिलेखों में धार्मिक व पौराणिक चिन्होँ जैसे चन्द्रमा, सूर्य,ॐ व “ॐ मणि पदमे हूँ” जैसे मन्त्रों को उकरे देखा गया है l
- माहेश्वर मंदिर अभिलेख l
अभिलेख श्रेणी : काष्ठ l
अभिलेख प्रकार : काष्ठ नक्काशी अभिलेख l
अभिलेख काल : 8 वीं शताब्दी l
अभिलेख लिपि : शारदा l
अभिलेख प्राप्ति स्थान : सुंगरा, किन्नौर l
अभिलेख विवरण : किन्नौर का सुंगरा माहेश्वर मंदिर, जो की तीन छत लिए पैगोडा शैली में बना है, अपनी लकड़ी की नक्काशी (कारागरी) का एक अद्भुत नमुना है l इसी मंदिर के आगे बायीं ऒर, एक छोटा सा शिखर शैली (पत्थर) का शिव मंदिर बना भी देखा गया है, जिसकी शिला नक्काशी भी देखते योग्य है l मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार की चौखट के ऊपर की ऒर, शारदा लिपि में उकेरा गया एक अभिलेख देखा जा सकता है l जिसमें मंदिर निर्माण, दान देने वालों के बारे व उस समय के शासकों की जानकारी दी गई है l
7.सिपलो अभिलेख l
अभिलेख श्रेणी : पाषाण l
अभिलेख प्रकार : चट्टान अभिलेख l
अभिलेख काल : 7 वीं -10 वीं शताब्दी l
अभिलेख लिपि : तिब्बती (भोटी), शारदा व टांकारी l
अभिलेख प्राप्ति स्थान : कानम व समीप का क्षेत्र l
अभिलेख विवरण : सिपलो के ये चट्टान अभिलेख जो कि तिब्बती (भोटी), शारदा, व टांकरी में देखे गए हैँ, से स्थानीय शासकों द्वारा किये निर्माण कार्य, धर्म कर्म, दान -पुण्य, गांव के नाम व तिब्बत के साथ किये आपसी समझौतों की जानकारियां मिलती हैँ l ऐसे ही एक समझौता अभिलेख में कुछ ऐसे पढ़ा गया है, समझौता तब तक लागू रहेगा, जब तक कैलाश मानसरोवर का पानी नहीं सूख जाता, काला कौआ सफ़ेद नहीं हो जाता और रिझो पुगल का स्थान समतल नहीं हो जाता l
8.लिप्पा अभिलेख l
अभिलेख श्रेणी : पाषण l
अभिलेख प्रकार :पाषाण चट्टान अभिलेख व शिलालेख l
अभिलेख काल : 10 वीं-11 वीं शताब्दी l
अभिलेख लिपि : तिब्बती (भोटी), भाषा झाँग झुंग l
अभिलेख प्राप्ति स्थान : मठ लिप्पा गांव (ग्लदांग छोड़कर, दुन्गुर व कंगयूर मठ) किन्नौर l
अभिलेख विवरण : तिब्बती (भोटी), भाषा झांग झुंग में उकरे ये अभिलेख चट्टानों व मठों की दीवारों पर देखे गए हैँ और ये द्रुकपाकाग्यु सम्प्रदाय से सम्बंधित हैँ l इनमें बौद्ध भिक्षुओं के सन्देश, धार्मिक मंत्र “ॐ मणि पदमे हूँ”, व मठों को दिए गए दान का ब्यौरा उकेरा गया है l मठ गांव अपने प्राचीन संस्कृति व मठों के लिए प्रसिद्ध हैँ तथा प्रसिद्ध भारत तिब्बत व्यापार मार्ग पर ही पड़ते हैँ l
हिमाचल : पाषाण अभिलेख, संदर्भ : लाहौल स्पीति – डॉ. कमल के. प्यासा




