प्रो. देवेंद्र सिंह अपनी कार में सपत्नीक मुकेश कुमार के मधुर गीत सुनते हुए अपने पुश्तैनी गांव जा रहे थे। गांव अभी चार-पांच किलोमीटर दूर था, कि अचानक उन्होंने गाड़ी को ब्रेक लगा दी। सड़क के किनारे एक नौजवान जो शायद कभी उनका विद्यार्थी रहा था, दर्द से कराह रहा था। उन्होंने तुरंत उस युवक को पहचान लिया। गाड़ी से उतरकर वह शीघ्रता से उस युवक के पास पहुंचे और हैरानी से बोले, “अरे शामलाल तुम यहां क्या कर रहे हो, ठीक तो हो?” “सर मेरे पेट में बहुत दर्द हो रहा है, घर से अस्पताल के लिए निकला था, मगर यहां पर बस खराब हो गई, अब कोई बस भी नहीं मिल रही।” उसने बड़े ही दयनीय स्वर में उत्तर दिया। प्रो.देवेंद्र ने उसे पानी पिलाया और सड़क किनारे सुरक्षित स्थान पर अच्छे से बिठाकर कहा, “कोई बात नहीं, यहां से हिलना नहीं, मैं अभी दस-पंद्रह मिनट में आता हूं।” उन्होंने तुरंत अपनी कार को द्रुत गति से गांव की तरफ रवाना कर दिया। पत्नी को घर के दरवाजे पर ही उतार उन्होंने तुरंत गाड़ी बैक की और कुछ ही मिनटों के बाद वह शामलाल के पास थे। उन्होंने शामलाल को कार में बिठाया और तीस किलोमीटर का सफर तय करके उसे एक अच्छे अस्पताल में ले गये, जहां पर सभी प्रकार की टेस्टस की सुविधा थी।
अस्पताल पहुंचते ही उन्होंने शामलाल के घर वालों को भी सूचित कर दिया और कुछ घंटों बाद शामलाल के घर वाले भी अस्पताल पहुंच गए। डॉक्टर्स ने शामलाल का इलाज पहले ही आरम्भ कर दिया था, कुछ देर बाद डॉक्टर ने उन्हें बताया, “शामलाल जी को गंभीर डिहाइड्रेशन हो गई थी मगर अब वह बिल्कुल ठीक है, आज की रात उन्हें चिकित्सकीय निरीक्षण में रखना पड़ेगा और कल तक आप उन्हें घर ले जा सकते हैं। इस केस में सबसे अच्छी बात यह है कि आप समय पर पेशेंट को अस्पताल ले आये नहीं तो कुछ भी हो सकता था।”
शामलाल व उसके घरवालों के चेहरों पर प्रो. देवेंद्र के प्रति कृतज्ञता और धन्यवाद के भाव साफ-साफ पढ़े जा सकते थे। उनके चेहरों पर मुस्कान के फूलों को महकते देख, प्रो. देवेंद्र दोबारा अपनी कार में बैठकर अपने गांव के लिए रवाना हो गए। उनके चेहरे पर असीम सुकून था और कार के एफ.एम. रेडियो पर गाना बज रहा था, “किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, जीना इसी का नाम है।”



