डॉ. कमल के. प्यासा – जीरकपुर (मोहाली)
नक्सल घास है,
लेकिन शुष्क, उदास है।
घिनौनी ओछी गाली है
और सर्वनाश है!
मात्र उच्चारण से ही
चेहरे पर नफरत,
माथे पर बल, आँखों से
आग निकलती है
और मुट्ठी कस जाती है।
उस पर दिमागी नक्सल
आखिर क्या है…?
शब्दों के बाण
छोड़ने से पूर्व
ज़ुबान को टटोलो पहले।
थोड़ा सोचो, मनन करो…
वाणी की मधुरता,
शालीनता, नम्रता।
क्रिया के प्रति प्रतिक्रिया,
न्यूटन की थम जाती है…
नफरत से टकराती नफरत,
और बढ़ती ऋणात्मकता
खुद घट जाती है!



