कांगड़ा चाय : जीवन के रिश्तों की महक

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कांगड़ा चाय : जीवन के रिश्तों की महक
रणजोध सिंह

उस दिन स्वप्निल ने हल्के आसमानी रंग की साड़ी पहनी थी, होठों पर हल्के गुलाबी रंग की लिपस्टिक के साथ माथे पर विशेष डिजाईन की बिंदियाँ भी सजाई थी | अपने लम्बे काले बालों को उसने एकदम खुला छोड़ दिया, क्योंकि उसके खुले बाल उसके पति आनंद की कमजोरी थे | आनंद जैसे ही दफ्तर से घर पहुंचा, सारा ड्राइंगरूम काँगड़ा चाय की खुशबु से सरोवार हो गया | वह जानती थी उसका पति काँगड़ा चाय का दीवाना है | उसने मुस्कुराते हुए एक मादक निगाह आनंद पर डालते हुए अदा के साथ चाय पेश की | जब आनंद ने चाय की चुस्कियों के साथ उसे एक भेद भरी निगाह से देखा तो उसने शरमा कर आंखे झुका ली | आनंद के होश उड़ाने के लिए उसकी यह अदा काफी थी|

मगर जैसे ही उसकी नज़र मेज़ पर पड़ी हुई माँ की तस्वीर पर पड़ी, उसका सारा जोश काफूर हो गया | वह फिर चाय पीने का उपक्रम करने लगा, मगर उसकी मनपसंद कांगड़ा चाय कैसली हो गई थी | स्वप्निल का सारा रूप-योवन उसे एक भद्दा-मेकअप लगने लगा | एकाएक उसे माँ की याद सताने लगी, जो आज ही अपने पैतृक गाँव गई थी | जब तक माँ आनंद के साथ थी, वह ही उसके लिए चाय बनती थी, क्योंकि आज जो सुंदर देह खुशबुओं में लिपटी हुई अप्सरा सी लग रही थी, कल तक वह एक बीमार औरत थी |

आनंद ने जल्दी से चाय खत्म की और फिर दफ्तर की फाईलों से माथापच्ची करने लगा | फाईलों की दुनिया वह कुछ कद्र उलझा कि कब शाम ढली, कब रात हुई, उसे पता ही नहीं चला | स्वप्निल से उसकी बात रात को खाना खाते वक्त ही हो सकी | यद्यपि स्वप्निल ने उसकी पसंद का खाना बनाया था परंतु आनंद को इसमें कोई स्वाद नहीं आया | लेकिन फिर भी अन्नपूर्णा का मान रखने हेतु अत्यंत मधुर स्वर में बोला, “खाना बहुत बढ़िया बना है|” मगर उसके चेहरे के भाव उसकी जुबान से मेल नहीं खा रहे थे | खाना खाने के बाद वह फिर फाइलें लेकर बैठ गया और जब तक शयनकक्ष में पहुंचा स्वप्निल निद्रा देवी की गोद में जा चुकी थी |

बात यहीं तक रहती तो ठीक था, ऑफिस का काम घर पर लाना आनंद की रोज़मर्रा की जिंदगी में शामिल हो चुका था | शीघ्र ही स्वप्निल ने नोट किया कि सदा खिलखिलाने वाला आनंद कुछ बुझा-बुझा सा रहने लगा था | वह नित्यप्रति आनंद के जितना समीम आने की कोशिश करती वह उससे उतना ही दूर जा रहा था | वह उसके साथ बात तो करता मगर उसमें कोई प्यार, स्नेह या अपनत्व जैसी कोई भावना नहीं झलकती थी | वह अक्सर कहता, “चाय बहुत अच्छी है… खाना बड़ा स्वादिष्ट है…….. तुम पर यह ड्रेस बहुत अच्छी लग रही है………. आदि-आदि| मगर स्वप्निल की आत्मा तब छलनी हो जाती जब वह कहता, “चाय रहने दो मन नहीं है.. तुम खाना खा लो, मुझे देर हो जाएगी… तुम सो जाओ, मुझे कुछ महत्वपूर्ण फाइलें देखनी है|” एक तरह से पति पत्नी के बीच में अघोषित शीत-युद्ध शुरू हो गया था|

एक दिन अचानक स्वप्निल की माँ जी का फोन आया कि वह उससे मिलने आ रही है| स्वप्निल की आंखों में चमक आ गई, और उनसे मिलने की खुशी में कुछ समय के लिए वह अपने सारे दुख-दर्द भूल गई| मगर शीघ्र ही उसने महसूस किया कि माँ जी के चेहरे पर पहले वाली हँसी न थी, वह कुछ उदास सी रहने लगी थी| उसने इस बारे में उनसे कई बार जानने की कोशिश की, मगर माँ जी टालमटोल करती रहीं| परन्तु स्वप्निल के बार-बार स्नेहपूर्वक आग्रह करने पर उन्होंने बताया, “बेटी अब तुम्हे क्या बताऊँ….तुम्हारे भाई भाभी के लिए मेरे पास समय ही नहीं है तुम्हारी भाभी दोपहर का खाना मुझे परोस कर सोने चली जाती है और फिर शाम को जैसे ही तुम्हारा भाई ऑफिस से आता है वह अपने कमरे में घुस जाता है और रात को खाने के वक्त ही उसके दर्शन होते हैं|

यद्यपि रात का खाना हम साथ-साथ खाते हैं मगर उस समय टीवी किसी खलनायक की तरह बीच में आ जाता है| तुम्हारे भाई के हलक में तब तक रोटी का निवाला नहीं जाता जब तक वह टीवी न देख ले| उसके तुरंत बाद वे अपने कमरे में दुबक जाते हैं| बहु तो सुबह जल्दी उठ जाती है, मगर तुम्हारा भाई सदैव देर से उठता है| फिर ऑफिस के चक्कर में किसी तरह भाग-भाग कर नाश्ता करता है, और कई बार तो वह भी छूट जाता है| खैर बहु-रानी मुझे समय पर भोजन करवा देती है| मगर क्या इंसान को जीवित रहने के लिए सिर्फ भोजन की आवश्यकता होती है? क्या एक मां अपने बेटे से बात ही नहीं कर सकती?” यह कहकर माँ जी फफक-फफक कर रोने लगी| स्वप्निल ने उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए बड़े प्यार से समझाया, “आप चिंता न करो, मैं स्वयं भाई-भाभी से बात करूंगी|

” माता जी कुछ दिन की बाद अपने घर वापिस चली गईं, मगर स्वप्निल को यह सोचने के लिए मजबूर कर गईं कि कहीं वह भी तो अपने-भाभी के नक्शेकदम पर तो नहीं चल रही| आज स्वप्निल ने बहुत सोच-विचार कर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया | आनंद के दफ्तर से आते ही बहुत ही सौम्य शब्दों का प्रयोग करते हुए बोली, “आज शनिवार है और कल तुम्हें छुट्टी है, क्यों न हम आज गाँव चलें?” आनंद के लिए यह एकदम चौंका देने वाली बात थी | क्योंकि आज तक तो वह यही कहती थी कि कल उससे छुटी है, क्यों न डिनर करने बाहर चलें |” वह थोड़ी देर के लिए रूकी और फिर मुस्कुरा कर बोली, “देखो आनंद माँ जी के बगैर यह घर कितना सूना-सूना लगता है, तुम तो ऑफिस चले जाते हो और मैं यहाँ अकेले बोर हो जाती हूँ|

क्यों न हम माँ जी को भी अपने साथ ले आए?” स्वप्निल का प्रस्ताव सुनते ही आनंद की आंखों में चमक आ गई और उसने तुरंत स्वप्निल का हाथ थाम कर बोला, “वाह स्वी, तुमने तो मेरे मन की बात कह डाली, चलो आज ही चलते हैं, पर क्या आज चाय नहीं पिलाओगी?” उनका ड्राइंग रूम में एक बार फिर कांगड़ा चाय की खुशबू से महकने लगा और इधर स्वप्निल को अब तक समझ आ गया था कि आनंद केवल उसका पति ही नहीं किसी माँ का बेटा भी है, और कोई भी पत्नी, माँ-बेटे को एक दुसरे से अलग करके खुश नहीं रह सकती|

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