August 30, 2025

खिल सकते है दबे हुए मसले हुए फूल शर्त ये है उन्हें सिने से लगाना होगा

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खिल सकते है दबे हुए मसले हुए फूल शर्त ये है उन्हें सिने से लगाना होगा|
रणजोध सिंह

अध्यापक बनने से पहले कभी मैं विद्यार्थी भी था और एक विद्यार्थी के जीवन को तराशने में अध्यापक की कितनी अहम भूमिका होती है ये मैंने शिद्दत से महसूस किया| कक्षा एक से लेकर यूनिवर्सिटी तक के सफर में ईश्वर-तुल्य अनेक अध्यापकों ने मेरा मार्ग प्रशस्त किया| परन्तु इस लेख को मैंने केवल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के प्रांगण तक ही सीमित रखा है| मेरे इस संस्मरण को हिमाचल प्रदेश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र गिरिराज में स्थान देने के लिए मैं समस्त गिरिराज परिवार का ह्रदय से आभारी हूँ|

संस्मरण- विद्यार्थी के भीतर छिपी प्रतिभा को तराशते अध्यापक जब भी हम जीवन के स्वर्णिम दिनों को याद करते हैं तो हमारा विद्यार्थी काल खासकर कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दिन अनायास ही उभर कर आँखों के सामने आ जाते हैं| मैं संसार के उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से हूँ, जिन्हें हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी शिमला में पढ़ने का सुअवसर मिला| यदि कोई व्यक्ति भव्य गगनचुंबी अट्टालिकाओं के पिरामिड और उसमे खड़ी हुई सैंकड़ो बसों के बेड़े को यूनिवर्सिटी मानता है तो वर्ष 1989-90 तक की हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी उसकी आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरेगी|

मगर जो व्यक्ति यूनिवर्सिटी को शिक्षा का मंदिर मानते हैं उन लोगों के लिए हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी सचमुच ही किसी देवस्थल से कम नहीं थी| चारों तरफ बुराश, चीड़ तथा देवदार के घने वृक्ष, हर तरफ स्वच्छ, ताजी व ठंडी हवा की मंद-मंद बयार, शहर की भीड़-भाड़ से दूर किसी निर्जन वन सी प्रतीत होती थी हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी| मार्च-अप्रैल के मौसम में जब चारों और सुर्ख लाल बुराश के फूल खिलते थे, तो यूनिवर्सिटी लाल चुन्नर धारण किये हुए किसी नवनवेली दुल्हन से प्रतीत होती| उस समय यहाँ तक पहुंचने के लिए पूरे दिन में केवल पांच-सात बसें ही चलती थी| अधिकतर छात्र-छात्राएं शिमला से यूनिवर्सिटी तक का सफर पैदल ही तय करते थे| यूनिवर्सिटी बेशक छोटी थी मगर अपने अध्ययन-अध्यापन को लेकर पूरे विश्व में प्रसिद्ध थी| ये तो सर्वविदित सत्य है कि विद्यार्थी के भीतर छिपी हुई प्रतिभा को काटने, छांटने और तराशने का कार्य अध्यापक ही करता है|

वस्तुतः हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में मेरी भी मुलाकात ऐसे तीन प्राध्यापकों से हुई जिन्होंने मेरे समूचे जीवन को ही बदल डाला| पहले महा-पुरुष थे डॉ. चमनलाल गुप्त, जो हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में हिंदी के जाने-माने प्राध्यापक थे| उनसे मेरा सीधा-सीधा कोई सरोकार नहीं था, क्योंकि मैं एम.कॉम. अर्थात वाणिज्य का विद्यार्थी था, जबकि उनका नाता हिंदी से था | मेरी उनसे पहली मुलाकात गेयटी थिएटर शिमला में एक भाषण प्रतियोगिता के दौरान हुई, जहां वे एक निर्णायक के रूप में आए थे और मैं एक प्रतिभागी के रूप में उस सभागार में उपस्थित हुआ था| किन्ही कारणों से उस वाद-विवाद प्रतियोगिता में सभी पुरस्कार उन प्रतिभागियों को दिए गए जिन्होंने अपना वक्तव्य अंग्रेजी भाषा में तैयार किया था|

मुझे बहुत निराशा हुई और मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि अगली बार मैं भी अपना वक्तव्य अंग्रेजी में ही तैयार करूंगा| लेकिन उस दिन न जाने डॉ. चमनलाल गुप्त जी को मेरे वक्तव्य का कौनसा पहलू अच्छा लगा, जिसके कारण प्रतियोगिता के अंत में उन्होंने मुझे अपने पास बुला कर कहा, “बेटा आपने बहुत अच्छा बोला, अगली बार डिवेट की तैयारी करो तो मुझसे जरूर मिलना|” अगली बार जिस भाषण प्रतियोगिता से मुझे न्योता आया उसका विषय था, ‘यह प्रेम को पंथ कराल महा, तरवार की धार पे धावनो है|’ मैंने थोड़ी सी तैयारी की और चमनलाल गुप्त जी से मिलने उनके कार्यलय जा पहुंचा|

उन्होंने मेरे वक्तव्य पर एक सरसरी सी नजर डाली और मुझे अगले कल आने का निर्देश दिया| अगले रोज मैं बिना विलंब उनके कार्यालय पहुंच गया| मेरे आश्चर्य की उस समय कोई सीमा न रही जब उन्होंने मेरा विषय अपने हाथों से लिख कर तैयार रखा था| उन्होंने न केवल मेरा भाषण तैयार किया अपितु भाषण देते समय किन-किन चीजों का ध्यान रखना है, भी विस्तारपूर्वक बताया| इस प्रतियोगिता में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया और शाम के समय जब मैंने ये सूचना उन्हें दी तो मुझे गले लगाते हुए प्रसन्नता पूर्वक कहा, “अब हिंदी को कभी छोड़ना मत” उनका ये हस्तलिखित भाषण आज भी मेरे पास सुरक्षित है|

इस घटना का मुझ पर इतना प्रभाव पड़ा कि उनके पद चिन्हों पर चलते हुए न केवल मैं कॉलेज प्राध्यापक बन गया अपितु आज की तिथि में हिंदी लेखन के क्षेत्र में भी मेरा हस्तक्षेप है| वर्ष 2020 में मेरे भीतर के लेखक ने अंगड़ाई ली और मैं सीधा डा.चमनलाल गुप्त जी शरण में चला गया और उन्ही के प्रेरणा से मेरा प्रथम काव्य-संग्रह ‘आईना’ प्रकाशित हुआ जिसकी भूमिका डॉ. चमनलाल गुप्त जी ने ही लिखी| दूसरी घटना डा.सुनील गुप्ता जी को लेकर है| उस समय वह वाणिज्य विभाग के विभागाध्यक्ष थे और हमें लागत लेखांकन (कोस्ट एकाउंटिंग) पढ़ाते थे| जब मैंने एम.फिल. की पढ़ाई आरंभ की तो उन्हें ही अपना गाईड बनाया क्योंकि उस समय विद्यार्थी को यह सुविधा थी कि वे अपनी मर्जी का गाईड चुन सकते थे, बाशर्ते कि गाईड उस विद्यार्थी को पढ़ाने के लिए तैयार हो जाए|

मैं जैसे ही एम.फिल. का पहला अध्याय यानि भूमिका (इंट्रोडक्शन) लेकर गुप्ता जी के पास गया, उन्होंने पूछा कि कितने पेज़ लिखे हैं मैंने बताया कि सर पांच-सात पेज़ लिखे हैं| गुप्ता जी ने एकदम नाराज होकर बोले, “यहां लोग पचास–पचास पेज़ की इंट्रोडक्शन लिखते हैं और तुम पांच पेज़ लेकर मेरे पास आ गए| जाओ, इसे दोबारा लिखकर लाओ और कम से कम 40-50 पेज़ लिखकर लाना|” यद्यपि वे मेरे गाईड थे और उनसे प्रतिवाद करना किसी भी सूरत में मेरे लिए हितकर नहीं था| मगर फिर भी मैं अपनी सारी हिम्मत जुटा कर बोला, “सर मैं केवल पेज नहीं भरना चाहता, अपितु आपकी तरह छोटी मगर क्वालिटी रिसर्च करना चाहता हूँ, मैंने आपकी एम. फिल. की थीसिस लाइब्रेरी से निकलवा कर कई बार पड़ी है| आप एक बार मेरी इंट्रोडक्शन पढ़ लीजिए फिर आप मुझे 100 पेज़ लिखने के लिए भी कहेंगे तो मैं लिख दूंगा|

” उन्होंने मेरी इंट्रोडक्शन पढ़ने के लिए 15-20 मिनट लगाए और एक ही सीटिंग में दो तीन बार पढ़ ली| इस बीच मैं खड़ा ही रहा| यद्यपि वहां पर दो तीन खाली कुर्सियां पड़ी हुई थी पर न तो उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया और न ही मेरी हिम्मत पड़ी कि मैं उनसे बैठने के लिए पूछता| फिर अचानक मेरी तरफ मुखातिब होते हुए बोले, “रणजोध तू बड़ा शरारती है, इंट्रो तो ठीक लिखी है चल अब कल से अगले चैप्टर, ‘रिव्यू ऑफ द लिटरेचर’ की तैयारी कर….. कल से, नहीं नहीं अभी से…… सीधा लाइब्रेरी चला जा और एक महीने से पहले बहार मत आना| अब रिव्यू ऑफ द लिटरेचर करने के बाद ही मिलना| सुबह के समय में डिपार्टमेंट में ही मिल जाऊंगा और शाम को माल रोड पर| फिर मेरी तरफ देख कर हँसते हुए बोले, “माल पर तो घूमने जाता ही होगा…. बालजीस, अल्फा यह गोफा में देख लेना, मैं यहीं-कहीं मिल जाऊंगा|

फिर एक दिन उनसे मेरी मुलाकात शिमला के माल रोड़ पर स्तिथ अल्फा रेस्टोरेंट में हुई| मुझे ऐसे मिले जैसे वर्षो से जानते हो | उस दिन न केवल मेरी थीसिस को ही पड़ा अपितु कॉफ़ी भी पलाई| मैं बहुत हैरान हुआ कि जो शख्स किसी समय बैठने के लिए कुर्सी भी नहीं देता था वह अब मुझे कॉफी भी पिला रहा है| इसके बाद तो मैं यदा-कदा उन्हें उनके डिपार्टमेंट में या माल के किसी न किसी रेस्टोरेंट में ढूंड ही लेता| हम लोग एक साथ चाय-कॉफ़ी पीते, वे मेरी थीसिस का महीन विश्लेषण करते, डांटते, गलतियां निकालते, गलतियां सुधारते और फिर दुबारा मिलने का वादा कर जुदा होते |

उन्होंने चाय-कॉफ़ी का बिल चुकाने का मौका मुझे कभी नहीं दिया और इस तरह बड़े ही खुशगवार मौसम में मेरी एम. फिल. हो गई| फिर गुरु-चेले की मुलाकात वर्ष 2012-13 में राजकीय महाविद्यालय नालागढ़ में हुई, जब उन्होंने उस कॉलेज के वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की| उस समय वे हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बन चुके थे और मैं राजकीय महाविद्यालय नालागढ़ में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत था| तीसरी घटना भी एक मीठी याद है जिसका सम्बन्ध यूनिवर्सिटी के योग डिपार्टमेंट से है|

यह विभाग एक वर्षीय ‘योग में डिप्लोमा’ प्रदान करता था जिसको हम लोग अपनी दूसरी डिग्री के साथ कर सकते थे| चूंकि योग मुझे बचपन से ही अकर्षित करता रहा है, अत: मैंने भी मैंने एम. फिल. के साथ-साथ योग में डिप्लोमा करने के लिए योग विभाग में भी दाखिला ले लिया| योग की कक्षाएं सुबह 7:00 बजे से 9:00 बजे तक अवालोज होस्टल में, जो चौड़ा मैदान के पास है, लगती थी| उन दिनों ये होस्टल चारों तरफ से बुराश के घने वृक्षों से घिरा हुआ था और बसंत के मौसम में जन्नत का पर्याय बन जाता था| योग विभाग में एडमिशन लेने के लिए कोई आयु सीमा नहीं थी| इसलिए किसी भी उम्र का व्यक्ति योग में डिप्लोमा कर सकता था| शिमला के अनेक प्रबुद्ध लोग इस डिप्लोमा करने को लालायित रहते थे| इस विभाग में मेरे कुछ सहपाठी तो इतनी ज्यादा आयु के थे कि उन्हें हम युवा लोग, अंकल कह कर संबोधित करते थे|

योग की कक्षा में प्रत्येक स्टूडेंट को अपने जूते कक्षा के बाहर उतार कर आना पड़ता था| प्रत्येक कक्षा का आरंभ ओम के उच्चारण से होता था तथा अंत भी ओम से ही होता था| आज भी जब योग डिपार्टमेंट को याद करता हूं तो मन एक बार हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी के योग डिपार्टमेंट का विद्यार्थी बनने को लालायित हो जाता है इसके विभागाध्यक्ष श्री राम चन्द्रन गुप्ता जी थे जिन्हें सभी लोग प्यार से दादा जी कहते थे| यद्यपि इस विभाग में दादाजी के अलावा और भी टीचर थे पर दादाजी आज भी मेरे मन-मस्तिष्क पर छाए हुए हैं इसका एक कारण तो शायद यह रहा होगा कि उस समय उनकी आयु 80 वर्ष के लगभग थी तथा पूरी यूनिवर्सिटी में केवल वही थे, जो रिटायरमेंट के बाद भी मानक-निदेशक के रूप में योग पढ़ा रहे थे|

योग के क्षेत्र में वह एक जानी-मानी हस्ती थे | डी. एस. मिन्हांस (डी.जी.पी. शिमला) टी. एस. तनवर (आई.एफ,एस) श्री सुरेश गुप्ता (आई.पी.एस.) जैसे नामी-गिरामी लोग दादा जी के शिष्य थे| एक बार योग के संबंध में हमें हि. प्रा. यूनिवर्सिटी की तरफ से भारत-दर्शन करने का मौक़ा मिला और हमने जहां-जहां पर यह बताया कि हम हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी से आए हैं और दादाजी के विद्यार्थी हैं, हमें रहने के लिए अकोमोडेशन भी मिल गई और खाने का इंतजाम भी हो गया| फिर चाहे वह दिल्ली हो, मुंबई हो, पूना हो, कन्याकुमारी हो या आंध्र प्रदेश का हैदराबाद| दादा जी से कुछ ऐसी प्रेरणा मिली कि जून 1989 में योग डिप्लोमा की परीक्षा में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया और कुछ समय बाद हि.प्र.यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में मुझे स्वर्ण-पदक प्रदान किया गया| इस दीक्षांत समारोह के मुख्य-अतिथि भारत के राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा थे|

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