आए बरस हिमाचल प्रदेश में 25 जनवरी को पूर्ण राज्य के उपलक्ष में राज्य स्थापना दिवस बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। ऊंचे ऊंचे हरे भरे पहाड़ों के कारण ही प्रदेश को हिमाचल के नाम से जाना जाता है, वैसे भी हिमाचल का शाब्दिक अर्थ हिम +आंचल को मिला कर बना है। जिसमें हिम का अर्थ बर्फ से व आंचल का अर्थ पल्लू या ओढ़नी से लिया जाता है। हां हमारा हिमाचल सर्दियों में बर्फ ओढ़े ही तो रहता है। फिर भी यदि इस पहाड़ी क्षेत्र के विकास की बात की जाए तो यह देश में दूसरा विकसित राज्य गिना जाता है। और सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी सबसे आगे ही है। यदि इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास पर दृष्टि डाले तो पता चलता है कि इस समस्त पहाड़ी क्षेत्र में राणों व ठाकुरों की हुकूमत चलती थी अर्थात उनकी अपनी छोटी छोटी ठकुराइयां हुआ करती थीं जिनमें उनकी ही मनमानी का बोलबाला रहता था।
बाद में विकास व आने जाने के साधन बन जाने से कुछ प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले शासकों के उठ खड़े होने से ये ठकुराइयां खत्म हो गईं और रियासतों का उदय होना शुरू हो गया। इस तरह स्वतंत्रता से पूर्व समस्त पहाड़ी क्षेत्र में लगभग 32 छोटी बड़ी रियासतें थीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 15 अप्रैल, 1948 को इन सभी रियासतों के पहाड़ी क्षेत्र को चीफ कमिश्नर प्रोविंस के रूप वाले अस्तित्व में लाया गया। जिसमें माहसू, मण्डी, चंबा और सिरमौर के क्षेत्र शामिल थे। इस प्रकार उस समय इस समस्त क्षेत्र का क्षेत्रफल 10451 वर्ग मील था। और उस समय की जनसंख्या 9,83,367 थी। प्रदेश के समस्त आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए 26 जनवरी, 1950 को हमारे इस प्रदेश को ग श्रेणी का दर्जा दिया गया तथा राज्य के प्रथम मुख्य मंत्री डॉक्टर वाई. एस. परमार को बना दिया गया था। प्रथम जुलाई 1954 में एक अन्य रियासत (बिलासपुर) जो कि पहले क्षेत्र में शामिल होने से आना कानी कर रही थी, वह भी शामिल हो गई और क्षेत्रफल व जनसंख्या में भी वृद्धि हो गई, साथ में एक जिला भी बढ़ गया।
वर्ष 1956 में प्रदेश से विधानसभा को समाप्त करके इधर टैरीटौरियल का गठन कर दिया गया। फिर प्रथम नवंबर 1956 को ही प्रदेश को केंद्र शासित राज्य बना दिया गया। बाद में वर्ष 1963 में भारत सरकार के टेरिटोरियल एक्ट के अंतर्गत प्रथम जुलाई 1963 को टेरिटोरियल काउंसिल को हिमाचल विधान सभा में बदल दिया गया और फिर दूसरी बार डॉक्टर वाई. एस. परमार को प्रदेश का मुख्य मंत्री नियुक्त कर दिया गया था। विकास के साथ साथ प्रदेश में ऐसे ही फेर बदल चलता रहा।
प्रथम नवंबर 1966 को जिस समय पंजाब का पुनर्गठन किया जा रहा था तो कुछ बचे हुए पहाड़ी क्षेत्र भी प्रदेश में शामिल कर दिए गए, जिनमें कांगड़ा व पंजाब के ऊना, हमीरपुर, कुल्लू, डलहौजी आदि के क्षेत्र आ जाते हैं। इन सब के आ जाने से प्रदेश का क्षेत्रफल बढ़ कर 55673 वर्ग किलो मीटर बन गया था। प्रदेश की बहुमुखी प्रगति के साथ ही साथ वर्ष 1970 में संसद द्वारा हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम पारित करके एक नए राज्य के रूप में हिमाचल प्रदेश को देश का 18 वां राज्य 25 जनवरी, 1971को घोषित कर दिया गया। इस विशेष व शुभ सूचना को जन जन तक पहुंचने के लिए राजधानी दिल्ली से स्व. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद शिमला आई थीं और रिज मैदान से हर्षित ध्वनि से सब को बधाई के साथ उन्होंने घोषणा की थी। उन्हीं की शुभकामनाओं से आज प्रदेश अपने 12 जिलों के साथ प्रगति के पथ पर अग्रसर है।प्रदेश की प्रगति में जल विद्युत परियोजनाएं, बागवानी, फरमा उद्योग, पर्यटन, कृषि उत्पाद और फलों की नगदी पैदावार अपनी अहम भूमिका निभा रही हैं। एक प्राप्त हुई नवीनतम जानकारी के अनुसार हमारे इस खुशहाल राज्य में 76 करोड़ रुपए से अधिक की विकास परियोजनाएं शुरू कर दी गई हैं। सीएमजीएसवाई IV के अनर्गत 2247 करोड़ रुपए सड़क योजनाओं के लिए मंजूर हो चुके हैं। इनके साथ ही साथ 74 शहरी स्थानीय निकास्य, जिनमें 8 नगर निगम शामिल हैं। इनसे शहरी बुनियादी ढांचों को बल मिलेगा। प्रदेश की साक्षरता दर भी तो 90 प्रतिशत से ऊपर ही है।
आया बसंत सर्दी का हुआ अंत: बसंती बसंत पंचमी – डॉ. कमल के. प्यासा



