आया बसंत सर्दी का हुआ अंत: बसंती बसंत पंचमी – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – जीरकपुर, मोहाली

माघ मास की पांचवीं तिथि के आते ही, चाहूं ओर हरियाली, फूल कलियों की महक, रंगबिरंगी तितलियों का इठलाना और भंवरों की गुंजन, ठंडी ठंडी बहती समीर, सभी प्रकृति में आए भारी परिवर्तन व मधुर संगीत के साथ कलकल करती नदियां व झरने बसंत के आगमन का एहसास दिलाने लगते हैं।

समस्त छ:ऋतुओं में बसंत ऋतु ही एक ऐसी ऋतु है, जिसमें मौसम खुलने लगता है,सर्दी घटनी शुरू होती है, न गर्मी का ही अनुभव होता है और न ही सर्दी का, अर्थात मौसम सुहावना हो जाता है। तभी तो बसंत ऋतु को सबसे बढ़िया व इसे ऋतुओं का राजा, ऋतुराज के नाम से जाना जाता है। इसी के आगमन में माघ के पांचवें दिन (बसंत) का भारी उत्सव के रूप में स्वागत किया जाता है और बसंत पंचमी वाले इस दिन भगवान विष्णु व काम देव की पूजा का विशेष महत्व रहता है।

बसंत के इस बसंती मौसम में जहां आकाश पीले और भांत भांत के रंगों की पतंगों से गुलज़ार हो जाता है, वहीं समस्त धरती, वन उपवन आदि भी हरियाली के साथ नई नई कोंपलों, फूलों कलियों व सरसों के फूलों से अपनी महक चहूं ओर बिखेरते हैं। सभी जीव जंतुओं में नई उमंग, जोश और उत्साह भरा दिखाई देता है। बसंत की पीली आभा में पीले रंग के पहनावे व पीली ही खान पान, जिनमें पीले चावलों के पकवान, पीले रंग का हलुआ, फिरनी, खीर व अन्य कई तरह की मिठाईयों (पीले रंग की) इस पर्व रूपी त्योहार को ओर भी निखार देती हैं।

एक पौराणिक कथा व उपनिषदों के अनुसार बताया जाता है कि जिस समय देव ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो उन्हें अपनी रचना से संतुष्टि नहीं हो हुई, क्योंकि श्रृष्टि की निर्मित किसी भी कृति में, किसी भी प्रकार की न तो गति थी और न ही किसी प्रकार ध्वनि। सब कुछ शांत और मौन को देखते हुए ही, देव ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल ले कर उसका छिड़काव किया और साथ में भगवान विष्णु की आराधना की। देव ब्रह्मा के इस तरह से पूजन के पश्चात ही, वहीं पर भगवान विष्णु जी प्रकट हो गए और उन्होंने देव ब्रह्मा की दुविधा को जान कर व उसके निवारण हेतु (भगवान विष्णु ने) देवी माता दुर्गा का आवाहन किया, जो उसी समय वहां प्रकट हो गईं। भगवान विष्णु ने देव ब्रह्मा की समस्या उनके समक्ष रख दी। उसी समय देवी माता दुर्गा के शरीर से एक सफेद रंग का तेज निकला और शीघ्र ही वह तेज रूपी पुंज दिव्य नारी के रूप में बदल गया। चतुर्भुजी उस नारी के एक हाथ में वीणा व दूसरा हाथ वरद हस्त मुद्रा में था व शेष दोनों हाथों में माला व पुस्तक ली हुई थी। जब उस दिव्य नारी ने अपनी वीणा से मधुर स्वर निकाल कर वादन किया, तो उसी समय सृष्टि के सभी जीव जंतुओं व पेड़ पौधों में एक नई चेतना जागृत हो उठी और सभी ओर पवन में सरसराहट, जल में झनझनाहट और पक्षी की चैचाहने की आवाजें आने लगी थीं। तभी से उस दिव्य देवी को वाणी की अधिष्ठात्री देवी “सरस्वती” कहा जाने लगा। इसके साथ ही साथ देवी मां दुर्गा ने देव ब्रह्मा से कहा कि तेज से उत्पन्न यह देवी आपकी पत्नी बनेगी। क्योंकि जिस प्रकार शिव और विष्णु की शक्तियां उनकी पत्नियां हैं, उसी प्रकार आपकी शक्ति देवी सरस्वती होगी।

देवी मां सरस्वती को विद्या और बुद्धि की देवी के नाम सी भी जाना जाता है, इसी लिए मां सरस्वती का पूजन सभी विद्यार्थियों, कला साधकों, गायकों व नृतकों द्वारा किया जाता है। इन्हें संगीत की देवी के साथ ही साथ देवी बाघेश्वरी भगवती, शारदा, वीणा वादनी और वाग्देवी भी कहा जाता है, तथा बसंत पंचमी को इनके प्रकट दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार ही कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने प्रसन्न हो कर इन्हें वरदान दिया था कि बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की आराधना की जाएगी।

बसंत पंचमी के महत्व के कई एक अन्य कारण भी हैं, अर्थात इस दिन वर्ष 1816 ईस्वी में नामधारी कूका संत राम सिंह जी का भी जन्म हुआ था। राजा भोज का जन्म भी बसंत वाले दिन ही हुआ था। इतना ही नहीं हिंदी के महान कवि सूर्यकांत निराला त्रिपाठी जी का जन्म भी बसंत के दिन 28/2/1899 को हुआ था। बसंत के दिन ही बालक हकीकत राय को 1734 ईस्वी में जबरन धर्म परिवर्तन के लिए कहा गया था, लेकिन बालक अपने धर्म पर टिका रहा इस्लाम को उसने मानने से इनकार कर दिया, फलस्वरूप उसे मृत्यु दंड दे दिया गया। विभाजन से पूर्व लाहौर में (बसंत के दिन) शहीद बालक हकीकत राय के इस शहीदी दिवस को मेले के रूप में मना कर याद किया जाता था। अभी भी पंजाब के कुछ एक शहरों में हकीकत राय के इस शहादत वाले दिन को उसकी याद में मेले के रूप मनाया जाता है।

कुछ भी हो बसंत के आने से मौसम में भारी परिवर्तन देखने को मिलता है और साथ में उत्साह, नया जोश व नई उमंगे उमड़ने लगती हैं। और प्रकृति भी बाहें फैलाए सभी के स्वागत में अग्रणी रहती है।

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