स्याहपोश क्रांतिकारी बाबा कांशी राम – डॉ . कमल के . प्यासा

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डॉ . कमल के . प्यासा , मण्डी

स्याहपोश जरनैल के नाम से जाना जाने वाला वीर क्रांतिकारी, समाजसेवी, धर्मसंर्पित, अल्पसंख्यकों का मसीहा, गीतकार, लेखक, कवि व एक सुलझा वक्ता बाबा काशी राम, का जन्म माता जवाहर देवी व पिता श्री लखनू के यहां जिला कांगड़ा के डाडासीबा में 11 जुलाई 1882 को हुआ था।

बालक काशी की स्कूली शिक्षा, उन्हीं के गांव डाडासीबा में ही हुई थी, क्योंकि पारिवारिक स्थिति ठीक न होने के कारण काशी आगे नहीं पढ़ पाए। दूसरे जब वह सात वर्ष के ही था तो उसकी शादी पांच वर्ष की लड़की सरस्वती से करवा दी गई। शादी के कुछ समय पश्चात ही काशी राम के पिता संसार से विधा हो गए और समस्त परिवार का भार काशी के कंधों पर आ गया। बेचारा घर का अकेला काशी क्या करता? आखिर रोजी रोटी की खोज में घर से निकल पड़ा और लाहौर पहुंच गया। लाहौर उन दिनों शिक्षा के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों, नौकरी, कारोबार व क्रांतिकारी कार्यों का विशेष केंद्र बना हुआ था और हमारे इस पहाड़ी क्षेत्र के भी निकट पड़ता था। भांत भांत के लोग व भांत भांत की विचार धारा तो थी ही यहां। जिसके साथ काशी राम का संपर्क भी कार्य की खोज के साथ बढ़ता गया और शीघ्र ही उसका संपर्क पंजाब के जाने माने क्रांतिकारियों से हो गया। जिनमें शामिल थे, लाला लाजपत राय, लाला हरदयाल, सरदार अजीत सिंह व मौलवी बर्कतुला खान आदि।

अब काशी राम भी, पंजाब व देश के अन्य करांतिकारियों की तरह अंग्रेजों के विरुद्ध सभा सम्मेलनों के साथ ही साथ दूसरी गुप्त गतिविधियों में खुल कर भाग लेने लगा था। जिनके फलस्वरूप उसका पीछा अंग्रेज गुप्तचर करने लगे थे। वह कई बारअंग्रेजों की पकड़ में भी आ गया, लेकिन अपने साथी क्रांतिकारियों के मदद से छूटता भी रहा। इसी मध्य उसका संपर्क उस समय के प्रसिद्ध लेखक गीतकार अंबा प्रसाद व उसके अन्य गायक सहयोगियों से हो गया और इसकी अपनी लेखन व गायन में रुचि होने के कारण ही अब अपने आप ही अपने द्वारा लिखे गीतों व कविताओं के माध्यम से क्रांतिकार संदेश को जन जन तक पहुंचाने लगा।धीरे धीरे काशी राम के क्रांतिकारी लेख, गीत व भजन पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से भी जब लोगों तक पहुंचने लगे तो काशी राम, अंग्रेजों की नजर में ओर भी खटकने लगे परिणाम स्वरूप उसे कई बार, लोगों को भड़काने का आरोप लगा कर उसे जेल मे भी डाला गया।

इस प्रकार बार बार जेल जाने से इसकी दाढ़ी व बाल लम्बे हो गए जिन्हें कटवाने का समय भी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण नहीं मिल पाता था। जिस कारण काशी राम, बाबे जैसे बन गए और फिर बाबा काशी राम कहलाने लगे।

अमृतसर में, ई0 संवत 1919 को जिस समय जलियांवाला बाग की घटना घटी थी, उस समय बाबा काशी राम वहीं थे। उस नरसंहार को देख कर इनके दिल पर गहरी चोट लगी थी और तब ये बुरी तरह से टूट गए थे, जिस पर आखिर में इन्होंने यह प्रण ले लिया, कि जब तक देश को अंग्रेजों से मुक्ति नहीं मिल जाती तब तक वह महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलते रहेंगे। इस तरह बाबा काशी राम जब तक जीवित रहे वह महात्मा गांधी के सिद्धांतों का अनुसरण करते रहे।

ईस्वी संवत् 1920 में, अंग्रेज गुप्तचरों को जब बाबा काशी राम द्वारा अपने ही क्षेत्र में की जाने वाली क्रांतिकारी गतिविधियों की जानकारी मिली तो इन्हें, इनके गांव से लाला लाजपत राय के साथ गिरफ्तार करके धर्मशाला जेल में डाल दिया गया। इस तरह कुल मिला कर क्रांतिकारी बाबा काशी राम 11 बार जेल की सजा पर रहे। ईस्वी संवत् 1929 में बाबा काशी राम ने लाहौर में होने वाली इंडियन नेशनल कांग्रेस की बैठक में अग्रणी क्रांतिकारी के रूप में भाग लिया था। फिर ईस्वी संवत् 1931 में जिस समय सरदार भगत सिंह, राज गुरु व सुख देव को अंग्रेजों द्वारा फांसी दी गई तो बाबा काशी राम को बहुत आघात पहुंचा था, जिस पर उन्होंने तभी से प्रण ले लिया था कि जब तक देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त नहीं हो जाता, मैं अपने शहीद साथियों की याद में शौक मानते हुए काले वस्त्र धारण करके अंग्रेज़ों की नीतियों का कट्टर विरोध करता रहूं गा और उन्होंने अपने प्रण को वैसे ही अपनी मृत्यु (15 अक्टूबर,1943) तक पूरा निभाया था। उनके उसी काले लिबास के कारण ही उन्हें स्याहपोश जरनैल (काले लिबास वाला जरनैल) के नाम से भी पुकारा जाता था।

अपने गांव डाडासीबा पहुंचने पर बाबा काशी राम, अपने उसी काले लिबास में ही जगह जगह जाते और अपनी कविताओं व गीतों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध (स्थानीय भाषा और शब्दों से) प्रचार करके लोगों में उत्साह पैदा करते हुए क्रांति की लो जलाते जाते थे। ईस्वी संवत् 1937 में इनके देश प्रेम और स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों को देखते हुए ही पंडित जवाहर लाल नेहरू ने (अपनी होशियारपुर की एक जनसभा में ) इनको पहाडी गांधी कह कर संबोधित किया था और तब से बाबा काशी राम पहाड़ी गांधी के नाम से जाने, जाने लगे थे। क्रांतिकारी प्रसिद्ध साहित्यकारा सरोजिनी नायडू ने इनकी मधुर वाणी से क्रांतिकारी व देश भक्ति के गीतों व भजनों को सुनते हुए बाबा काशी राम को पहाड़ी कोकिला कहा था।

इस तरह से देखा जाए तो पहाड़ी गांधी बाबा काशी राम मात्र वीर क्रांतिकारी साहित्यकार ही नहीं थे बल्कि वह तो एक महान संत, चिंतक ,समाज सुधारक,समाज सेवी व धर्मपरायण व्यक्तित्व के स्वामी भी थे तथा ऊंच नीच,छोटा बड़ा में बिल्कुल भी विश्वास नहीं रखते थे। और आर्थिक शोषण के घोर विरोधी थे। इनके लेखन से क्रांतिकारी विचारधारा के साथ ही साथ देशभक्ति, सामाजिक बुराइयों व उनके निदान,ऊंच नीच के भेदभाव, वर्ग जाति भेद, धार्मिक कुरीतियों व कमजोरों के शोषण की चर्चा के साथ इन सब पर सुन्दर ढंग से कटाक्ष करते हुए अपने भजनों में ऊपर वाले से सचेत रहने की कई तरह की शिक्षाएं दी हैं। पहाड़ी गांधी बाबा काशी राम जी को

उनकी इस पावन जयंती पर मेरा शत शत नमन।

 

काली पूजा – डॉ. कमल के. प्यासा

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