पश्चिमी हिमालय के मध्य में स्थित हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है। चूंकि यहां की प्राक्-वैदिक,वैदिक,पौराणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि गौरवमयी रही है। आधुनिक गवेषणाओं में यह प्रदेश मानव सृष्टि का आदि स्थल रहा है। धार्मिक व संस्कृत साहित्य और लोक साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर यहां सैंधव-सरस्वती घाटी सभ्यता के साक्ष्य विद्यमान हैं। यहीं संसार के आदि ग्रंथ वेदों की रचना हुई। यहां की लोकभाषा व लोकसाहित्य में वैदिक संस्कृत के शब्दों की प्रचुरता है और सृष्टि के आरम्भ व विकास के अनेक संदर्भ निहित रहे हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार हिमाचल में लगभग 16000 मंदिर हैं। प्रदेश का शायद ही कोई गांव हो जहां किसी देवी व देवता का मंदिर न हो। यहां गांव में मुख्य मंदिर के साथ-साथ अधीनस्थ देवों के लघु मंदिर भी निर्मित हैं, जो अपनी स्थानीय शैली की विशिष्टता के लिये विख्यात हैं।
हिमाचल के मंदिरों को वास्तुशिल्प की दृष्टि से सात शैलियों में रखा जा सकता हैं। ढलवां छत्तीय शैली, कोट शैली,पिरामिड शैली,पैगोडा शैली व सतलुज-शिखर शैली स्थानीय शैलियों की श्रेणी में है। जबकि शिखर शैली व गुम्बद शैलियां उत्तर भारतीय शैलियां हैं।
ढलवां छत्तीय मंदिर यहां की प्राचीनतम् शैली है जिसे खश शैली भी कहां जाता है। इस शैली में एकल व बहु- धरातलीय व चौकीनुमा शैली के मंदिर आते हैं। हिमाचल के अधिकत्तर मंदिर इसी शैली से निर्मित हैं ऐसे मंदिर एक मंजिल से पांच मंजिला होते हैं। इन मंदिरों की दीवारें काठ-कुणी में निर्मित हैं। एक निश्चित अंतराल पर लकड़ी के स्तम्भों और पत्थरों को क्षैतिजीय आधार पर जोड़कर दीवारों का निर्माण किया जाता हैं। काष्ठ स्तम्भों को कोनों पर लकड़ी की कीलों से जोड़कर दीवार को सुदृढ़ आधार प्रदान किया जाता है। काष्ठकुणी (काठकुणी) की दीवारें जहां मंदिर के आंतरिक तापमान को संतुलित रखतीं हैं वहीं ये दीवारें सैंकड़ों वर्षों तक स्थिर रहतीं हैं और भूकम्प की स्थिति में भी अक्षुण्ण रहतीं हैं। काठकुणी के मंदिरों की दीवारों में सीमेंट व मिटी का प्रयोग नगण्य रहता है। ऐसे मंदिर सैंकड़ों वर्षों तक समय के थपेड़ों को सहकर अक्षुण्ण रहते हैं।
दूसरी पहाड़ी शैली कोट या भण्डार शैली है जो देवी-देवता के भण्डार घर को समर्पित है। इस शैली के मंदिरों की दीवारें भी काठ-कुणी से बनी होती है और शीर्ष मंजिल पर बरामदे के साथ ऊपर से ढलवां छत्त से आवृत होतीं हैं। पिरामिड शैली के मंदिर में एकल पिरामिड के शीर्ष पर कलश स्थापित होता है। ऐसे मंदिर पब्बर घाटी व किन्नौर में पाए जाते हैं। पैगोडा शैली के मंदिर कुल्लू व सुकेत में बहुतायत में पाये जाते हैं। इस शैली के मंदिरों के गर्भगृह के ऊपर दो से चार तलीय चौकोर या वृताकार छत्त होते हैं। कुल्लू का हिडिम्बा देवी मंदिर इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। पांचवीं पहाड़ी शैली सतलुज व पैगोडा शैली की मिश्रित शैली है जिसे पैनेलोप चैडवुड ने सतलुज-शिखर शैली का नाम दिया है। शेष शिखर शैली मैदानी भाग की नागर शैली का परिष्कृत रूप है। इस शैली के मंदिर हिमाचल में छठी से अठारहवीं शताब्दी के बीच निर्मित हुए हैं। यह शैली गुप्तोत्तर काल की शैली है जो पहाड़ों में विकसित हुई। अन्य बाहरी शैली में आधुनिक मंदिरों की शैली है जिसमें गुम्बद शैली उल्लेखनीय है जो मुगल शैली की विशेषता को लिये हुए है।
उपरोक्त पहाड़ी शैली के प्राचीन मंदिरों का समय-समय नवीनीकरण व सौंदर्यीकरण हो रहा है जिसमें मंदिर के वास्तुशिल्प,उत्कीर्णत्व व कला पक्ष को नई शैली में अंकित किया जा रहा है। वास्तव में मंदिरों का शिल्प व मूर्ति शिल्प इतिहास को अतीत के साथ जोड़ने का ईमानदार और सक्षम माध्यम रहा है। हमारे मंदिर हमारी आंचलिक व स्थानीय कला के ऐसे प्रतिनिधि हैं जिसके माध्यम से अमुक मंदिर स्मारक इतिहास के प्रमाणिक दस्तावेज के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत होता है। अत: कला के प्रतिनिधि हमारे मंदिर हिमालयी संस्कृति,इतिहास और कला के पोषक रहे हैं। चूंकि यहां के मंदिरों की वास्तु शैली यहां की पारिस्थिकी,मौसम और संसाधनों की उपलब्धता के मूलभूत कारकों से सुनिश्चित होती रही है। आज हिमाचल प्रदेश में काष्ठ मंदिरों का वास्तुशिल्प गरिमापूर्ण और विपुल कलात्मक पहलुओं से भरा पड़ा है। जब मंदिर के शहतीर पुराने पड़ जाते हैं या नमी व वर्षा से सड़ने लग जाते हैम तो मंदिर का नये सिरे से निर्माण की प्रक्रिया मंदिर कमेटियों द्वारा आरम्भ की जाती है। मंदिर के निर्माण के लिये हिमाचल प्रदेश भाषा एवम् संस्कृति विभाग से अनुदान भी आवश्यक औपचारिकताओं को पूर्ण कर अनुमोदित कर दिया जाता है। विभाग की ओर से मंदिर के इतिहास,कला और शैली का विवरण लेकर अनुदान तो प्राप्त कर लिया जाता है। परन्तु पुनर्निर्माण करते हुए मौलिक शैली की उपेक्षा कर नई शैली के मंदिर को बनाने की कसरत की जाती है। ऐसी स्थिति में मंदिर से जुड़ी मौलिकता की स्वभाविक ही हत्या कर ली जाती है। मंदिर हमारे स्मारक हैं और इतिहास के संवाहक। यदि मंदिर के मौलिक स्वरूप को विकृत कर आधुनिक शैली का समावेश किया जाता है,तो इतिहास व कला के वास्तविक स्वरूप का ही विलोप हो जाता है। भाषा व संस्कृति विभाग का कोई प्रतिनिधि का अधिकारी भी अनुदान प्राप्त मंदिर के नवनिर्माण या सौंदर्यीकरण वाले मंदिरों का पर्यवेक्षण नहीं करते। ऐसी स्थिति में मंदिर से जुड़े ऐतिहासिक व कलात्मक पक्ष की मृत्यु हो जाती है और अन्वेषण के लिये मंदिर के सारे स्रोत विलुप्त हो जाते हैं। दूसरी ओर मंदिर कमेटी मंदिर को विस्तार देकर रंग-रोगन व आधुनिक नक्काशी कर गौरवान्वित अनुभव करते हैं। ऐसे अबौद्धिक प्रयासों से हम अपनी कला व संस्कृति का ही गला घोंट लेते हैं जो ऐतिहासिक दृष्टि से आत्मघात से कम नहीं। चूंकि वैचारिक दृष्टि से हम विकासवादी बने यह बेहतर है। यदि हम सांस्कृतिक रूप से रूढ़िवादी न होकर बदलाव की मन:स्थिति के इनुसार कार्य करेंगे तो हमारी पहचान गुम हो जायेगी।
हमारे पुराने मंदिरों में विद्यमान द्वार स्तम्भों,छत्त और फलकों पर उत्कीर्णत्व वैभवपूर्ण है। सतलुज घाटी के अंतर्गत ममलेश्वर महादेव मंदिर,मण्डी सराज के छत्तरी में स्थित मगरू महादेव, करसोग उपमण्डल के अंतर्गत तेबनी महादेव,सुकेत की आदि राजधानी पांगणा में महामाया का कोट मंदिर, सुकेत के बखारी में माहूंनाग मंदिर, कुमारसैन में कोटेश्वर महादेव मंदिर,कुमारसैन के ओडी में कचेड़ी मंदिर, मानन में मानणेश्वर मंदिर,बाहरी सराज में बैहनी महादेव मंदिर,दलाश में जगेश्वर महादेव मंदिर आदि कोट व सतलुज शिखर शैली के उत्कृृष्ट मंदिर है। प्राय:देखा गया है कि मंदिर के सौंदर्यीकरण के प्रयोजन से काष्ठ द्वार,स्तम्भों व फलकों पर रंग-रोगन कर यहां की स्थापत्य कला व उत्कीर्णत्व को हानि पहुंची है।
सतलुज घाटी के उपरोक्त मंदिरों में इतिहास,धर्म व परम्पराओं का कलात्मक चित्रण ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। पांगणा का महामाया कोट मंदिर 1270 वर्ष की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। हालांकि मंदिर में मौलिक स्वरूप पर अभी तक किसी तरह का कृतिम कार्य को जोड़ा नही गया है। फिरभी हिमाचल के इस धरोहर मंदिर के अग्रभाग में सीमेंट का गुम्बद बनाकर मंदिर के पुरातन वैभव को विकृत कर दिया है। पांगणा में अवस्थित अम्बरनाथ मंदिर का सम्बन्ध पाण्डवों से रहा है। कुछ वर्ष पूर्व तक इस मंदिर का स्वरूप शिखर शैली में था। जबकि यहां प्राप्त उत्कीर्णित विशाल प्रस्तर स्तम्भ,भद्रमुख,विशाल नंदी का एकाश्म प्रस्तर विग्रह,लिंग व योनी विग्रह आदि यहां के स्थापत्य को गुप्तोत्तर काल और प्रतिहार काल से जोड़ते हैं। परन्तु वर्तमान में यहां कंकरीट का आधुनिक शैली के मंदिर का निर्माण हो रहा है जो इस मंदिर की ऐतिहासिकता के उपहरण के सदृश ही है। जबकि मंदिर के निर्माण में इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि अमुक स्मारक का क्षेत्रीय इतिहास और कला इतिहास में कितना अंहम स्थान है। मंदिर निर्माण में यह शास्त्रीय विधान,देव-सम्मति और परम्परा रही है कि मंदिर के परिमाप, आकार व शैली में नवनिर्माण के समय ऐसा परिवर्तन न हो जो मंदिर की मौलिकता को आच्छादित कर दे। परन्तु वरितमान में मंदिर निर्माण के समय पुरातन कलात्मक पक्ष को तिलांजलि देकर आधुनिक शैली में निर्माण को महत्व दिया जाता रहा है।
किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान वहां के मंदिरों,मेलों,पहरावे,खान-पान,
अभी हाल ही में कुमारसैन में कोटेश्वर महादेव के मंदिर का निर्माण हुआ। कोटेश्वर महादेव की यह कोठी अपने चौकीनुमा मंदिरों के लिये विख्यात थी। चूंकि चौकीनुमा मंदिर सुरक्षा की दृष्टि से सुरक्षित व अभेद्य माने जाते हैं। हिमाचल में चौकीनुमा मंदिर कुमारसैन के अतिरिक्त, सुकेत के देव दवाहड़ी का मंदिर व मण्डी के कुटवाची में महासु देव का मंदिर चौकीनुमा मंदिर के प्रमुख उदाहरण हैं। काटेश्वर महादेव के मंदिर के चार छत्तों का स्वरूप ढलवां था और काठकुणी की दीवारों का स्वरूप अतुलनीय था। परन्तु करोड़ों में बन रहे इस मंदिर की दीवारें कंकरीट की बनाईं गईं जो यहां के विशिष्ट स्थापत्य पर आघात रहा है। चौकीनुमा मंदिर के ढलवां छत्त पर पिरामिडों का अनावश्यक जुड़ाव मंदिर के पुरातन कला पक्ष पर किसी आघात से कम नहीं है।
अभी हाल ही में सुकेत के दक्षिण में तत्तापानी-करसोग सड़क पर चामोनाला में (चित्र संलग्न)देव शंकर का ढलवां छत्तीय मंदिर (देहरा) निर्मित हुआ है, जो सुकेत व सतलुज घाटी में स्थित मंदिरों की विशिष्ट शैली के पुरातन स्वरूप के अक्षरश: संरक्षित रखने का उद्धरणीय उदाहरण है। इस मंदिर को पूर्ववर्ती मंदिर की वास्तु शैली व कला का अनुकरण कर श्रेष्ठ स्वरूप प्रदान किया गया है। चामुनाला (कोट)का यह पुण्य स्थल सुकेत व मण्डी में प्रतिष्ठित शंकर देव का मूल स्थान है। चामुनाला (कोट) में निर्मित मंदिर की दीवारें पत्थर व काष्ठ स्तम्भों के संयोजन से काठकुणी में निर्मित हैं। दीवारों में पूर्ववत् मिट्टी व गारे का कोई प्रयोग नहीं हुआ है। ढलवां छत्तीय इस मंदिर का प्रदक्षिणा पथ उत्कीर्णित स्तम्भों पर आधारित है और गर्भगृह के द्वार को मौलिक देवगणों,परिचरों व शुभसूचकों से अलंकृत किया गया है। चामुनाला के देव शंकर मंदिर की निर्माण कमेटी के इतिहासबोध से हमें प्रेरणा लेने की आवश्यकता है कि किस प्रकार इतिहास को जीवित रखने के लिये स्थानीय जनता व निर्माण कमेटी ने मंदिर स्मारक का नवनिर्माण कर बौद्धिक परिपक्वता का परिचय दिया।
ऐसा ही प्रशंसनीय मंदिर व कोठी निर्माण कुमारसैन की जंजैली पंचायत के भड़ैवग गांव में मरेच्छ देव का हुआ। यहां कोठी को कोटनुमा पूर्वस्वरूप की शैली का अनुशीलन कर निर्मित किया गया। यहां देवता के मंदिर को पूर्ववत् सतलुज-शिखर शैली में निर्माण कर द्वार व स्तम्भों पर देवगणों की स्थानीय आकृतियों का अंकन कर प्रशंसनीय कार्य किया गया है। कुमारसैन कस्बे के समीप ढोलासेर में मरेच्छ देव दित्थु का भण्डार भी मौलिक शैली में यथावत् निर्मित इतिहास,परम्परा व कला का संरक्षण किया गया है।
इतिहास क्षेत्र की संस्कृति,परम्पराओं,धर्म व आस्था का समन्वित रूप है। सभ्यता का स्वरूप लौकिक होता है। सभ्यता भौतिक उन्नति से स्वरूप परिवर्तित करती है। जबकि संस्कृति का निर्माण सहस्राब्दियों के चिंतन व आचार-विचार का प्रतिफल है। अत: संस्कृति से ही सम्बन्धित क्षेत्र के चिंतन,आदर्श,संस्कार और मर्यादाओं का संरक्षण व पोषण होता है। संस्कृति ही इतिहास का श्रृंगार करती है और संरक्षण भी। कला भी संस्कृति का अभिन्न अंग है जो क्षेत्र की कोमल संवेदनाओं का प्रतिरूप है। अत: आवश्यक है कि प्रदेश की गौरवशाली कला व संस्कृति के संरक्षण के लिये सरकारी व विभागीय प्रयासों के साथ-साथ लोगों का इतिहास व संस्कृतिप्रेम व बोध आवश्यक हैं। तभी हिमाचल प्रदेश के पुरातन सांस्कृतिक इतिहास को आने वाली पीढ़ियां अंगीकार कर प्रेरणा प्राप्त कर चारित्रिक सामर्थ्य प्राप्त करेगीं
डॉ. हिमेन्द्र बाली
इतिहास और साहित्यकार
शिमला हि.प्र.



