रणजोध सिंह – नालागढ़
अंजस जैसे ही कार्यालय से लौट कर घर में दाखिल हुआ उसकी नव नवेली पत्नी समिता ने मुस्कुरा कर स्वागत करते हुए कहा, “चाय तैयार है माँ जी के कमरे में आ जाओ।” दरअसल अंजस शाम की चाय अपनी माँ के साथ ही पीता था। जैसे ही वह अपनी माता जी के कमरे में गया उसने देखा कि वह आँखों पर मोटा सा चश्मा चढ़ाकर स्वेटर बुन रही थी। अंजस ने चाय का कप माँ जी को थमाते हुए बड़े प्यार से कहा, “मम्मी जी, आप यह क्या कर रही हो?” “तुम्हारे लिए स्वेटर बुन रही हूं तुम्हें सलेटी रंग पसंद है ना।” माँ ने खिलखिलाते हुए कहा। उसने माँ से मीठा सा आग्रह किया, “मम्मी जी अब तुम्हारा यह बेटा कमाने लगा है तुम्हें अब मेरे लिए कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है, मैं चाहता हूं कि तुम बस आराम करो, कल से ये स्वैटर और सिलाईयां तुम्हारे हाथ में नजर नहीं आनी चाहिए।” “ठीक है बेटा।” यह कहकर माँ भी चाय पीने लगी|
दुसरे दिन जैसे ही अंजस कार्यालय से लौटा और चाय पीने के लिए माँ जी के कमरे में दाखिल हुआ, तो माँ बुरी तरह हाँफते हुए स्वैटर बुन रही थी। अंजस ने लगभग डांटते हुए बोला, ” मम्मी जी मैंने आपको कल भी स्वेटर बुनने के लिए मना किया था मगर आप हैं कि मानती ही नहीं, बाजार में इस तरह के बने-बनाये हजारों स्वेटर मिल जाते हैं अगर इस स्वेटर के चक्कर में तुम बीमार हो गई,…..तो !”
माँ मुस्कुराते हुए बड़ी आत्मीयता से बोली, “बेटा यह सच है कि बाजार में तुम्हें इससे कहीं ज्यादा सुंदर व शानदार स्वेटर मिल जाएंगे मगर क्या उनमें मेरे प्यार की गर्माइश भी होगी?” अंजस निरुतर था, उसका गला अवरुद्ध हो गया, वह मुँह से तो कुछ न कह सका मगर उसकी आंखों में बहते हुए अश्रु साफ-साफ बता रहे थे कि माँ के प्यार की कोई कीमत नहीं| उधर समिता भी से दरवाजे पर चाय की ट्रे लेकर खड़ी थी मगर उसकी आँखे भी नम थीं|



