प्रागैतिहासिक क्षेत्र के, बिलासपुर रियासत की स्थापना मध्य प्रदेश के चंदेल वंशी राजपूत राजा बीर चंद द्वारा सातवीं शताब्दी में ईस्वी सन 697 को, कहलूर नामक राज्य की स्थापना से गई थी और सुनहणी नामक स्थान को अपनी राजधानी बनाया था।
आगे 17वीं शताब्दी के 1650 ईस्वी को राजा दीप चंद द्वारा सतलुज नदी के किनारे, ब्यास गुफा के समीप बिलासपुर नामक नगर को बसा कर इसे राजधानी बना दिया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात वर्ष 1954 में बिलासपुर भी अन्य रियासतों की तरह भारत गणराज्य में शामिल हो गया और इसे भी जिले का दर्जा मिल गया। विकास के कार्यों के अंतर्गत वर्ष 1960 में जब समस्त पुराना बिलासपुर जलमग्न हो कर गोविन्दसागर में परावर्तित हुआ तो नया (आज का) बिलासपुर ऊपर की ओर बसाया गया। बिलासपुर के जलमग्न हो जाने के साथ ही साथ प्राचीन मंदिर और समस्त सांस्कृतिक विरासत भी पानी में समा गई। लेकिन आज भी कुछ बचे प्राचीन ऐतिहासिक अभिलेख अपना इतिहास समेटे कहीं न कहीं देखने को मिल ही जाते हैं। कुछ धातु (ताम्र) अभिलेखों की जानकारी निम्न प्रकार से इस आलेख के माध्यम से प्रस्तुत है:
बिलासपुर के धातु (ताम्र पट्ट) अभिलेख।
1.राजा बीर चंद ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख काल : 7वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : शारदा।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : कहलूर, बिलासपुर।
अभिलेख विवरण : बुंदेलखंड से आये चंदेल राजपूत राजा बीर चंद द्वारा 697 ईस्वी में इधर कहलूर राज्य की स्थापना की थी। जिससे इधर चंदेल राजपूतों का दबदबा स्थापित हो गया था और ये चंदेल राजपूत कहलूरिए कहलाने लगे थे।
बीर चंद ने अपना राज्य स्थापित करने के पश्चात ही दान पुण्य के काम करने शुरू कर दिए थे और मंदिरों के लिए भी भूमि अनुदान कई ब्राह्मणों के नाम कर दिया था। सामंतों को भी प्रशासन व्यवस्था ठीक से चलने के लिए आदेश दे रखे थे, जिसकी जानकारी इसी शारदा लिपि में उत्कीर्ण अभिलेख से हो जाती है।
2.राजा उद्धरण चंद ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख काल : 890 – 930 ईस्वी (9वीं -10वीं शताब्दी)
अभिलेख लिपि : टांकरी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : कहलूर, बिलासपुर।
अभिलेख विवरण : राजा उद्धरण चंद के टांकरी उत्कीर्ण इस अभिलेख में भूमि अनुदान, मंदिर निर्माण के साथ साथ उनके द्वारा कहलूर किले के निर्माण की भी जानकारी प्राप्त होती है।
3.राजा ज्ञान चंद ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख काल : 1518 – 1555 ईस्वी (16 वीं शताब्दी)।
अभिलेख लिपि : टांकरी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : कहलूर, बिलासपुर।
अभिलेख विवरण : राजा ज्ञान चंद (1518-1555 ईस्वी) के टांकरी लिपि उत्कीर्ण के इस ताम्र पट्ट अभिलेख में भूमि दान के अतिरिक्त, कोट कहलूर किले पर सरहिंद के कासिम खान के आक्रमण का भी उल्लेख है। कोट कहलूर का यह किला आज भी नैना देवी मंदिर की पहाड़ी पर देखा जा सकता है।
4.राजा कहल चंद ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख काल : 894 – 902 ईस्वी (9वीं -10वीं शताब्दी)
अभिलेख लिपि : ब्राह्मी, भाषा संस्कृत।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : कहलूर, बिलासपुर।
अभिलेख विवरण : राजा कहल चंद के ताम्रपट अभिलेख से भी ब्राह्मणों को भूमि अनुदान व कोट कहलूर के किले के निर्माण की जानकारी मिलती है। इसके साथ ही साथ धार्मिक कार्यों के लिए, मंदिरों के लिए भूमि दान, गांव दान व वंशावली का उल्लेख भी मिलता है। अंत में ताम्र पट्ट अभिलेख में यह भी निर्देश दिया गया है कि दान की गई भूमि पर दान करता का अधिकार भी रहेगा।
5.राजा महान चंद ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख काल : 8115 ईस्वी (19वीं शताब्दी) ।
अभिलेख लिपि : टांकरी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : बिलासपुर।
अभिलेख विवरण : राजा महान चंद, (1772-1824 ईस्वी), के शासन काल में बड़ी ही राजनीतिक स्थिरता की जानकारी प्राप्त होती है। इस टांकरी उत्कीर्ण अभिलेख से एंग्लो गोरखा युद्ध के पश्चात 1815 ईस्वी में गोरखों के ही अत्याचारों के परिणाम स्वरूप राजा महान चंद को ब्रिटिश सुरक्षा लेनी पड़ी, ताम्र पट्ट के अनुसार 6 मार्च, 1815 को अंग्रेजों द्वारा गोरखों को खदेड़ देने के पश्चात राजा महान चंद को सत्ता फिर से सौंप दी गई। महान चंद ने नालागढ़ व कांगड़ा के साथ युद्ध भी लड़े लेकिन सिखों ने राजा से धार कोट छीन ही लिया। इस तरह ताम्र पट्ट से भूमि दान, युद्ध व संधियों आदि की जानकारी भी मिल जाती है।
6.राजा खड़क चंद ताम्र पट्ट अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : ताम्र धातु पट्ट अभिलेख।
अभिलेख काल : 19वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : टांकरी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : बिलासपुर।
अभिलेख विवरण : बिलासपुर के राजा खड़क चंद (1824-1839 ईस्वी), कम उम्र के एक कमजोर, लापरवाह व अयोग्य शासक के रूप में प्रसिद्ध हैं। खड़क चंद की बाल बुद्धि के कारण ही व अपने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को ठीक नहीं रख पाया। यदि दान पुण्य व धार्मिक अनुष्ठान लगा तो उसने आगे पीछे कुछ नहीं देखा, कर भी माफ़ कर दिये और खजाना खाली हो गया। बिना सोचे विचारे किए आदेशों से विवाद खड़े हो गये। खड़क चंद की अदूरदर्शिता के साथ उसकी विलासिता ही उसे ले डूबी। यही सब कुछ उसके ताम्र पट्ट अभिलेख से भी पता चलता है।




